मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २६६ * | १०२१ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| स्थापिते तु ततो देवे यजमानोऽथ मूर्त्तिपम्।<br>आचार्यं पूजयेद् भक्त्या वस्त्रालङ्कारभूषणैः॥ ५४<br>दीनान्धकृपणांस्तद्वद् ये चान्ये समुपस्थिताः।<br>ततस्तु मधुना देवं प्रथमेऽहनि लेपयेत्॥ ५५<br>हरिद्रयाथ सिद्धार्थैर्द्वितीयेऽहनि तत्त्वतः।<br>चन्दनेन यवैस्तद्वत् तृतीयेऽहनि लेपयेत्॥ ५६<br>मनःशिलाप्रियङ्गुभ्यां चतुर्थेऽहनि लेपयेत्।<br>सौभाग्यशुभदं यस्माल्लेपनं व्याधिनाशनम्॥ ५७<br>परं प्रीतिकरं नृणामेतद् वेदविदो विदुः। | इस प्रकार देवके स्थापित हो जानेपर यजमान मूर्तिकी प्रतिष्ठा करानेवाले आचार्यकी वस्त्र, अलंकार एवं आभूषणोंसे भक्तिपूर्वक पूजा करे। इसी प्रकार दीन, अन्धे, कृपण तथा अन्य जो कोई वहाँ उपस्थित हों, उन सबको भी संतुष्ट करना चाहिये। तदनन्तर प्रथम दिन मधुसे प्रतिमाका लेपन करना चाहिये। इसी तरह दूसरे दिन हल्दी तथा सरसोंसे, तीसरे दिन चन्दन और जौसे, चौथे दिन मैनसिल तथा प्रियङ्गु (मेंहदी)-से लेप करना चाहिये; क्योंकि यह लेप सौभाग्य और मङ्गलदायक, व्याधिनाशक तथा मनुष्योंके लिये परम प्रीतिकारक है, ऐसा वेदवेत्ताओंने कहा है॥ ४४-५७ १/२ ॥ |
| कृष्णाञ्जनं तिलं तद्वत् पञ्चमेऽपि निवेदयेत्॥ ५८<br>षष्ठे तु सघृतं दद्याच्चन्दनं पद्मकेसरम्।<br>रोचनागुरुपुष्पं तु सप्तमेऽहनि दापयेत्॥ ५९<br>यत्र सद्योऽधिवासः स्यात् तत्र सर्वं निवेदयेत्।<br>स्थितं न चालयेद् देवमन्यथा दोषभाग् भवेत्॥ ६०<br>पूरयेत् सिकताभिस्तु निश्छिद्रं सर्वतो भवेत्।<br>लोकपालस्य दिग्भागे यस्य संचलते विभुः॥ ६१ | इसी प्रकार पाँचवें दिन काला अंजन और तिल, छठे दिन घृतसहित चन्दन एवं पद्मकेसर, सातवें दिन रोचना, अगुरु तथा पुष्प देना चाहिये। जिस मूर्तिकी स्थापनामें तुरंत ही अधिवासन हो जाय, वहाँ इन सबको एक साथ ही निवेदित कर देना चाहिये। अवस्थित हो जानेपर प्रतिमाको अपने स्थानसे विचलित नहीं करना चाहिये; अन्यथा दोषभागी होना पड़ता है। छिद्रोंको बालूसे भरकर सब ओर छिद्ररहित कर देना चाहिये। स्थापनाके बाद जिस लोकपालकी दिशाकी ओर प्रतिमा अपने-आप झुकती है, उस लोकपालके लिये शान्ति कराकर क्रमशः ये दक्षिणाएँ देनी चाहिये। |
| तस्य लोकपतेः शान्तिर्देयाश्चैवाश्र दक्षिणाः।<br>इन्द्राय वारणं दद्यात् काञ्चनं चाल्पवित्तवान्॥ ६२<br>अग्नेः सुवर्णमेव स्याद् यमस्य महिषं तथा।<br>अजं च काञ्चनं दद्यान्नैर्ऋतं राक्षसं प्रति॥ ६३<br>वरुणं प्रति मुक्तानि सशुक्तीनि प्रदापयेत्।<br>रीतिकं वायवे दद्याद् वस्त्रयुग्मेन साम्प्रतम्॥ ६४<br>सोमाय धेनुर्दातव्या रजतं वृषभं शिवे।<br>यस्यां यस्यां सञ्चलनं शान्तिः स्यात् तत्र तत्र तु॥ ६५<br>अन्यथा तु भवेद् घोरं भयं कुलविनाशनम्।<br>अचलं कारयेत् तस्मात् सिकताभिः सुरेश्वरम्॥ ६६<br>अन्नं वस्त्रं च दातव्यं पुण्याहजयमङ्गलम्।<br>त्रिपञ्च सप्तदश वा दिनानि स्यान्महोत्सवः॥ ६७<br>चतुर्थेऽह्नि महास्नानं चतुर्थीकर्म कारयेत्।<br>दक्षिणा च पुनस्तद्वद् देया तत्रातिभक्तितः॥ ६८ | इन्द्रके लिये हाथी देना चाहिये। यदि थोड़ी सम्पत्तिवाला हो तो सुवर्ण दे। अग्निके लिये सुवर्णकी, यमराजके लिये महिषकी, राक्षसराज निर्ऋतिके लिये बकरा तथा सुवर्णकी, वरुणके लिये सुतुहियोंसहित मोतियोंकी, वायुके लिये दो वस्त्रोंसहित पीतलकी, चन्द्रमाके लिये गौकी और शिवके लिये चाँदी-निर्मित वृषभकी दक्षिणा देनी चाहिये। जिस-जिस दिशामें संचलन हो, उस-उस दिशाकी शान्ति करानी चाहिये, अन्यथा कुलविनाशक भयंकर भय उत्पन्न होता है। अतः प्रतिमाको बालूसे भरकर अचल कर देना चाहिये। उक्त पुण्य दिनमें अन्न तथा वस्त्रका दान करना चाहिये। साथ ही पुण्याहवाचन, जय-जयकार एवं माङ्गलिक शब्दोंका उच्चारण करवाना चाहिये। यह महोत्सव तीन, पाँच, सात या दस दिनोंतक होना चाहिये। प्रतिष्ठाके चौथे दिन महास्नान तथा चतुर्थीकर्म कराना चाहिये। उस अवसरपर भी अत्यन्त भक्तिपूर्वक पर्याप्त दक्षिणा देनी चाहिये। |