भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1032
१०२२* मत्स्यपुराण *

| देवप्रतिष्ठाविधिरेष तुभ्यं निवेदितः पापविनाशहेतोः।<br>यस्माद् बुधैः पूर्वमनन्तमुक्तमनेकविद्याधरदेवपूज्यम् ॥ ६९ | ऋषिवृन्द! मैंने पापोंके विनाशार्थ आपलोगोंसे देव-प्रतिमाकी प्रतिष्ठाकी यह विधि वर्णन की है; क्योंकि पण्डितोंने इस विषयको पूर्वकालमें अनेक विद्याधर तथा देवताओं द्वारा पूज्य और अनन्त बतलाया है॥५८-६९॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रतिष्ठानुकीर्तनं नाम षट्षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मूर्तिप्रतिष्ठा नामक दो सौ छाछठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६६॥


दो सौ सड़सठवाँ अध्याय

देव (प्रतिमा)-प्रतिष्ठाके अङ्गभूत अभिषेक-स्नानका निरूपण

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि देवस्नपनमुत्तमम्।<br>अघस्यापि समासेन शृणु त्वं विधिमुत्तमम्॥ १ऋषियो! अब मैं देवप्रतिमाके अभिषेक तथा अर्घ्यकी उत्तम विधि संक्षेपमें बतला रहा हूँ, सुनिये।
दध्यक्षतकुशाग्राणि क्षीरं दूर्वांस्तथा मधु।<br>यवाः सिद्धार्थकास्तद्वदष्टाङ्गोऽर्घः फलैः सह॥ २दधि, अक्षत, कुशका अग्रभाग, दुग्ध, दूर्वा, मधु, यव और सरसों—इन आठ वस्तुओं तथा फलोंके मिलानेसे अर्घ बनता है।
गजाश्वरथ्यावल्मीकवराहोत्खातमण्डलात् ।<br>अग्न्यागारात् तथा तीर्थाद् व्रजाद् गोमण्डलादपि॥ ३हाथीशाला, अश्वशाला, चौराहा, विमौट, शूकरद्वारा खोदे गये गड्ढे, अग्निकुण्ड, तीर्थस्थान एवं गोशालाकी मिट्टीको मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण 'उद्धृतासि वराहेण' (तै० आ०) आदि मन्त्रको उच्चारण करते हुए कलशमें डाले।
कुम्भे तु मृत्तिकां दद्यादुद्धृतासीति मन्त्रवित्।<br>शं नो देवीत्यपां मन्त्रमापो हिष्ठेति वै तथा॥ ४तत्पश्चात् 'शं नो देवी०', (वाजस० सं० ३६।१०) 'आपो हि ष्ठा०' इन दो मन्त्रोंका उच्चारण कर जल छोड़े।
सावित्र्याऽऽदाय गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम्।<br>आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णेति वै दधि॥ ५तत्पश्चात् गायत्रीमन्त्रका उच्चारण करते हुए उस घड़ेमें गोमूत्र, फिर 'गन्धद्वारां०' (ऋक्परि० श्रीसू० ८) इस मन्त्रसे गोबर, 'आप्यायस्व०' (वाजस० सं० १२।१४४) मन्त्रसे दुग्ध, 'दधिक्राव्णः०' (वाजस० २३।३२) मन्त्रसे दही और
तेजोऽसीति घृतं तद्वद् देवस्य त्वेति चोदकम्।<br>कुशमिश्रं क्षिपेद् विद्वान् पञ्चगव्यं भवेत् ततः॥ ६'तेजोऽसि०' (वाजस० २२।१) मन्त्रसे घृत, 'देवस्य त्वा सवितुः०' (वाजस० सं०१।१९)-से जलको छोड़कर सबको मिश्रितकर कुशद्वारा चलावे तो वह पञ्चगव्य होता है।
स्नाप्याथ पञ्चगव्येन दध्ना शुद्धेन वै ततः।<br>दधिक्राव्णेति मन्त्रेण कर्तव्यमभिमन्त्रणम्॥ ७इस पञ्चगव्यद्वारा प्रतिमाको स्नान करानेके उपरान्त शुद्ध दहीद्वारा 'दधिक्राव्णः०' (वाजस० सं०२३।३२) इस मन्त्रसे अभिषेक-संस्कार करना चाहिये।
आप्यायस्वेति पयसा तेजोऽसीति घृतेन च।<br>मधुवातेति मधुना ततः पुष्पोदकेन च॥ ८फिर 'आप्यायस्व०' (वाजस० सं० १२।११४) इस मन्त्रका उच्चारण कर दुग्धसे, 'तेजोऽसि शुक्क्र०' (वाजस० सं०२२।१) इस मन्त्रद्वारा घृतसे, 'मधुवाता०' (वाजस० सं०) इस मन्त्रद्वारा मधुसे तथा पुष्पमिश्रित जलसे और
सरस्वत्यै भैषज्येन कार्यं तस्याभिमन्त्रणम्।<br>हिरण्याक्षेति मन्त्रेण स्नापयेद् रत्नवारिणा॥ ९'सरस्वत्यै०' (वाजस० सं०) इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए ओषधियोंसे प्रतिमाका संस्कार करना चाहिये। फिर 'हिरण्याक्ष०' इस मन्त्रसे रत्नमिश्रित