मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1036, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ें| १०२६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| गन्धौदनं च गन्धर्वे भृङ्गराजस्य भृङ्गिकाम्।<br>मृगाय यावकं दद्यात् पितृभ्यः कृसरा मता ॥ १४<br>दौवारिके दन्तकाष्ठं पैष्टं कृष्णाबलिं तथा।<br>सुग्रीवेऽपूपकं दद्यात् पुष्पदन्ताय पायसम्॥ १५<br>कुशस्तम्बेन संयुक्तं तथा पद्मं च वारुणे।<br>विष्टं हिरण्मयं दद्यादसुराय सुरा मता ॥ १६<br>घृतौदनं न शेषाय यवान्नं पापयक्ष्मणे।<br>घृतलड्डूकांस्तु रोगाय नागे पुष्पफलानि च॥ १७<br>सर्पिर्मुख्याय दातव्यं मुद्गौदनमतः परम्<br>भल्लाटस्थानके दद्यात् सोमाय घृतपायसम् ॥ १८<br>भगाय शालिकं पिष्टमदित्यै पोलिकास्तथा।<br>दित्यै तु पूरिका दद्यादित्येवं बाह्यतो बलिः॥ १९<br>क्षीरं यमाय दातव्यमापवत्साय वै दधि।<br>सावित्रे लड्डुकान् दद्यात् समरीचं कुशौदनम्॥ २०<br>सवितुर्गुरुपूपांश्च जयाय घृतचन्दनम्।<br>विवस्वते पुनर्दद्याद् रक्तचन्दनपायसम् ॥ २१<br>हरितालौदनं दद्यादिन्द्राय घृतसंयुतम्।<br>घृतौदनं च मित्राय रुद्राय घृतपायसम् ॥ २२ | गन्धर्वको सुगन्ध और ओदन, भृङ्गराजको भृङ्गिका, मृगको जौका सत्तू और पितरोंको खिचड़ी देना चाहिये। दौवारिकको दन्तकाष्ठ तथा आटेकी कृष्ण बलि, सुग्रीवको पूआ तथा पुष्पदन्तको खीर प्रदान करे। वरुणको कुश-समूहसे संयुक्त पद्म और सुवर्णमय पिष्टक देना चाहिये। असुरके लिये मदिरा मानी गयी है। शेषको घृत-संयुक्त ओदन, पापयक्ष्माको जौका अन्न, रोगको घीका बना हुआ लड्डू, नागको पुष्प और फल, मुख्य (वासुकि)-को घी तथा भल्लाटके स्थानपर मूंग और ओदन तथा सोमके लिये घृत और खीर देना चाहिये। भगके लिये साठीके चावलका पिष्टक, अदितिके लिये पोलिक और दितिके लिये पूरीकी बलि देनी चाहिये। यह वास्तुके बाहरी भागकी बलि है। यमको दूध और आपवत्सको दही देनेका विधान है। सावित्रीको लड्डू तथा मरीचके साथ कुशमिश्रित ओदन प्रदान करे। सविताको गुड-मिश्रित पूआ, जयको घृत और चन्दन तथा विवस्वान्को लाल-चन्दन और खीर दे। इन्द्रको घृतसमेत हरितालयुक्त ओदन, मित्रको घृतमिश्रित ओदन तथा रुद्रको घृत और खीर दे॥ १२–२२॥ | | आमं पक्वं तथा मांसं देयं स्याद् राजयक्ष्मणे।<br>पृथ्वीधराय मांसानि कूष्माण्डानि च दापयेत्॥ २३<br>शर्करापायसं दद्यादर्यम्णे पुनरेव हि।<br>पञ्चगव्यं यवांश्चैव तिलाक्षतमयं चरुम्॥ २४<br>भक्ष्यं भोज्यं च विविधं ब्रह्मणे विनिवेदयेत्।<br>एवं सम्पूजिता देवाः शान्तिं कुर्वन्ति ते सदा॥ २५ | राजयक्ष्माको पके हुए तथा कच्चे फलका गूदा देना चाहिये। पृथ्वीधरको मांसखण्ड और कुम्हड़े दे। अर्यमाके लिये शक्कर और खीर, पञ्चगव्य, जौ, तिल, अक्षत तथा चरु दे। ब्रह्माके लिये विविध प्रकारके भक्ष्य और भोज्य पदार्थ देने चाहिये। इस प्रकार पूजित देवगण सर्वदा शान्ति प्रदान करते हैं। | | सर्वेभ्यः काञ्चनं दद्याद् ब्रह्मणे गां पयस्विनीम्।<br>राक्षसीनां बलिर्देयो अपि याहग् यथा शृणु॥ २६ | अन्य उपस्थित ब्राह्मणोंके लिये सुवर्णका तथा ब्रह्मास्थानीय ब्राह्मणको दूध देनेवाली गौका दान करना चाहिये। अब राक्षसियोंके लिये जिस प्रकारकी बलि दी जानी चाहिये, उसे सुनिये। | | मांसौदनं घृतं पद्मकैसरं रुधिरान्वितम्।<br>ईशानभागमाश्रित्य चरक्यै विनिवेदयेत्॥ २७ | फलका गूदायुक्त ओदन, घृत, पद्मकैसर—इन्हें ईशानकोणकी ओर चरकी नामकी राक्षसीको निवेदित करना चाहिये। | | मांसौदनं च रुधिरं हरिद्रौदनमेव च।<br>आग्नेयीं दिशमाश्रित्य विदार्यै विनिवेदयेत् ॥ २८ | फलका गूदा-मिश्रित ओदन तथा हरिद्रायुक्त ओदन—इन्हें अग्निकोणकी ओर विदारी नाम्नी राक्षसीके लिये निवेदित करना चाहिये। | | दध्योदनं सरुधिरमस्थिखण्डैश्च संयुक्तम्।<br>पीतरक्तं बलिं दद्यात् पूतनायै सरक्षसे ॥ २९ | दही, ओदन, हड्डियोंके टुकड़े तथा पीले और लाल रंगकी बलि राक्षससहित पूतना नामकी राक्षसीको नैर्ऋत्यकोणमें देनी चाहिये। |