भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २६८ *१०२७
वायव्यां पापराक्षस्यै मत्स्यमांसं सुरासवम्।<br>पायसं चापि दातव्यं स्वनाम्ना सर्वतः क्रमात्॥ ३०<br>नमस्कारान्तयुक्तेन प्रणवाद्येन संयुतः।<br>ततः सर्वौषधीस्नानं यजमानस्य कारयेत्॥ ३१<br>द्विजान् सुपूजयेद् भक्त्या ये चान्ये गृहमागताः।<br>एतद्वास्तूपशमनं कृत्वा कर्म समारभेत्॥ ३२<br>प्रासादभवनोद्यानप्रारम्भे विनिवर्त्तने।<br>पुरवेश्मप्रवेशेषु सर्वदोषापनुत्तये॥ ३३<br>रक्षोघ्नपावमानेन सूक्तेन भवनादिकम्।<br>नृत्यमङ्गलवाद्येन कुर्याद् ब्राह्मणवाचनम्॥ ३४<br>अनेन विधिना यस्तु प्रतिसंवत्सरं बुधः।<br>गृहे वायतन कुर्यान्न स दुःखमवाप्नुयात्॥ ३५<br>न च व्याधिभयं तस्य न च बन्धुधनक्षयः।<br>जीवेद् वर्षशतं स्वर्गे कल्पमेकं च तिष्ठति॥ ३६वायव्यकोणमें पापा नामकी राक्षसीके लिये खीर देना चाहिये। बलि देते समय क्रमशः सभी जगह आदिमें प्रणव और अन्तमें नमस्कारसहित अपने नामका उच्चारण कर लेना चाहिये। तदनन्तर यजमानको सर्वौषधिसे युक्त जलसे स्नान कराना चाहिये॥ २३—३१॥<br>यजमानको भक्तिपूर्वक अपने गृहपर आये हुए ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार वास्तुकी शान्ति करनेके बाद गृहनिर्माण कार्य प्रारम्भ करना चाहिये। प्रासाद, भवन, उद्यानके प्रारम्भ करते समय अथवा उनके उद्यापनके समय तथा पुर या गृहमें प्रवेश करते समय सभी दोषोंके विनाशार्थ रक्षोघ्न और पावमान सूक्तोंके पाठ करानेके बाद नृत्य, माङ्गलिक गीत और वाद्योंके साथ ब्राह्मणोंद्वारा वेदपाठ कराना चाहिये। जो बुद्धिमान् पुरुष प्रतिवर्ष गृह अथवा मन्दिरके कार्यमें उपर्युक्त विधिका पालन करता है, वह दुःखका भागी नहीं होता। उसे न तो व्याधिका भय होता है, न उसके बन्धुजनों तथा सम्पत्तिका विनाश ही होता है, प्रत्युत वह इस लोकमें सौ वर्षतक जीवित रहता है और स्वर्गमें एक कल्पपर्यन्त निवास करता है॥ ३२—३६॥
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इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुदोषोपशमनं नामाष्टषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तुदोष-शमन नामक दो सौ अड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६८॥

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