भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 1040
१०३०* मत्स्यपुराण *

| मेरुमन्दरकैलासकुम्भसिंहमृगास्तथा ।<br>विमानच्छन्दकस्तद्वच्चतुरस्रस्तथैव च ॥ २८<br>अष्टास्रः षोडशास्रश्च वर्तुलः सर्वभद्रकः ।<br>सिंहास्यो नन्दनश्चैव नन्दिवर्धनकस्तथा ॥ २९<br>हंसो वृषः सुवर्णेशः पद्मकॊऽथ समुद्गकः ।<br>प्रासादा नामतः प्रोक्ता विभागं शृणुत द्विजाः ॥ ३० | मेरु, मन्दर, कैलास, कुम्भ, सिंह, मृग, विमान, छन्दक, चतुरस्र, अष्टास्र, षोडशास्र, वर्तुल, सर्वभद्रक, सिंहास्य, नन्दन, नन्दिवर्धन, हंस, वृष, सुवर्णेश, पद्मक और समुद्गक—ये प्रासादोंके नाम हैं। द्विजो! अब इनके विभागोंको सुनिये॥ २९—३०॥ | | शतशृङ्गश्चतुर्द्वारो भूमिकाषोडशोच्छ्रितः ।<br>नानाविचित्रशिखरो मेरुः प्रासाद उच्यते ॥ ३१ | सौ शृङ्ग तथा चार द्वारवाला, सोलह खण्डोंमें ऊँचा, अनेकों विचित्र शिखरोंसे युक्त प्रासाद 'मेरु' कहलाता है। | | मन्दरो द्वादशप्रोक्तः कैलासो नवभूमिकः ।<br>विमानच्छन्दकस्तद्वदनेकमुखराननः ॥ ३२ | इसी प्रकार 'बारह खण्डोंवाला' मन्दर तथा नव खण्डोंवाला 'कैलास' कहा गया है। 'विमान' और 'छन्दक' भी उन्हींकी भाँति अनेक शिखरों और मुखोंसे युक्त तथा आठ खण्डोंवाले होते हैं। | | स चाष्टभूमिकस्तद्वत् सप्तभिर्नन्दिवर्धनः ।<br>विषाणकसमायुक्तो नन्दनः स उदाहृतः ॥ ३३ | सात खण्डोंवाला 'नन्दिवर्धन' होता है। जो विषाणकसे संयुक्त रहता है, उसे 'नन्दन' कहा जाता है। | | षोडशास्रसमायुक्तो नानारूपसमन्वितः ।<br>अनेकशेखरस्तद्वत् सर्वतोभद्र उच्यते ॥ ३४ | जो प्रासाद सोलह पहलोंवाला, विविध रूपोंसे सुशोभित और अनेक शिखरोंसे संबलित होता है, उसे 'सर्वतोभद्र' कहते हैं। इसे चित्रशालासे संयुक्त तथा पाँच खण्डोंवाला जानना चाहिये। | | चित्रशालासमोपेतो विज्ञेयः पञ्चभूमिकः ।<br>वलभीच्छन्दकस्तद्वदनेकमुखराननः ॥ ३५ | प्रासादके बलभी (बुर्ज) तथा छन्दकको भी उसी प्रकार अनेक शिखरों और मुखोंसे युक्त बनाना चाहिये। | | वृषस्योच्छ्रायतस्तुल्यो मण्डलश्चास्रवर्जितः ।<br>सिंहः सिंहाकृतिर्ज्ञेयो गजो गजसमस्तथा ॥ ३६ | ऊँचाईमें वृषभके समान तथा मण्डलमें बिना पहलके सिंहप्रासादको सिंहकी आकृतिका तथा गजको गजके समान ही जानना चाहिये। | | कुम्भः कुम्भाकृतिस्तद्वद् भूमिकानवकोच्छ्रयः ।<br>अङ्गुलीपुटसंस्थानः पञ्चाण्डकविभूषितः ॥ ३७ | कुम्भ आकृतिमें कुम्भकी भाँति और ऊँचाईमें नौ खण्डका हो। जिसकी स्थिति अंगुलीपुटकी भाँति हो, जो पाँच अण्डोंसे विभूषित और चारों ओरसे सोलह पहलवाला हो, उसे | | षोडशास्रः समंताच्च विज्ञेयः स समुद्गकः ।<br>पार्श्वयोश्चन्द्रशालेऽस्य उच्छ्रायो भूमिकाद्वयम् ॥ ३८ | 'समुद्गक' जानना चाहिये। इसके दोनों पार्श्वोंमें चन्द्रशालाएँ हों और ऊँचाई दो खण्डोंसे युक्त हो। | | तथैव पद्मकः प्रोक्त उच्छ्रायो भूमिकात्रयम् ।<br>षोडशास्रः स विज्ञेयो विचित्रशिखरः शुभः ॥ ३९ | उसी प्रकारकी बनावट 'पद्मक' की भी होनी चाहिये, केवल ऊँचाईमें यह तीन खण्डोंवाला हो। इसे विचित्र शिखरोंसे युक्त, शुभदायक और सोलह पहलोंवाला जानना चाहिये। | | मृगराजस्तु विख्यातश्चन्द्रशालविभूषितः ।<br>प्राग्ग्रीवेण विशालेन भूमिकासु षडुन्नतः ॥ ४०<br>अनेकश्चन्द्रशालश्च गजः प्रासाद इष्यते । | 'मृगराज' प्रासाद वह है, जो चन्द्रशालासे विभूषित, प्राग्ग्रीवसे युक्त और छः खण्डों (मंजिलों)-तक ऊँचा हो। अनेक चन्द्रशालाओंसे युक्त प्रासाद 'गज' कहलाता है॥ ३१—४० १/२॥ |