मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय २६९ * | १०३१ |
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| पर्यस्तगृहराजो वै गरुडो नाम नामतः॥ ४१<br>सप्तभूम्युच्छ्रयस्तद्वच्चन्द्रशालात्रयान्वितः ।<br>भूमिकाषडशीतिस्तु बाह्यतः सर्वतो भवेत्॥ ४२<br>तथान्यो गरुडस्तद्वदुच्छ्रयाद् दशभूमिकः।<br>भूमिका षोडशास्तस्तु भूमिद्वयमथाधिकः ॥ ४३<br>पद्मतुल्यप्रमाणेण श्रीवृक्षक इति स्मृतः।<br>पञ्चाण्डको द्विभूमिश्च गर्भे हस्तचतुष्टयम् ॥ ४४<br>वृषो भवति नाम्नायं प्रासादः सर्वकामिकः।<br>सप्तकाः पञ्चकाश्चैव प्रासादा वै मयोदिताः ॥ ४५<br>सिंहास्येन समा ज्ञेया ये चान्ये तत्प्रमाणकाः।<br>चन्द्रशालैः समोपेताः सर्वे प्राग्ग्रीवसंयुताः।<br>ऐष्टका दारवाश्चैव शैला वा स्युः सतोरणाः ॥ ४६<br>मेरुः पञ्चाशद्धस्तः स्यान्मन्दरः पञ्चहीनकः।<br>चत्वारिंशत् तु कैलासश्चतुस्त्रिंशद् विमानकः ॥ ४७<br>नन्दिवर्धनकस्तद्वद् द्वात्रिंशत् समुदाहृतः।<br>त्रिंशता नन्दनः प्रोक्तः सर्वतोभद्रकस्तथा ॥ ४८<br>वर्तुलः पद्मकश्चैव विंशद्धस्त उदाहृतः।<br>गजः सिंहश्च कुम्भश्च वलभीच्छन्दकस्तथा ॥ ४९<br>एते षोडशहस्ताः स्युश्चत्वारो देववल्लभाः।<br>कैलासो मृगराजश्च विमानच्छन्दको मतः॥ ५०<br>एते द्वादशहस्ताः स्युरेतेषामिह मन्मतम्। | 'गरुड़' नामक प्रासाद पीछेकी ओर बहुत फैला हुआ, तीन चन्द्रशालाओंसे विभूषित और सात खण्ड ऊँचा होता है। उसके बाहर चारों ओर छियासी खण्ड होते हैं। एक अन्य प्रकारका भी गरुड़ प्रासाद होता है, जो ऊँचाईमें दस खण्ड ऊँचा होता है। 'पद्मक' सोलह पहलोंवाला तथा पूर्वकथित प्रासाद गरुड़से दो खण्ड अधिक ऊँचा होना चाहिये। पद्मके समान ही 'श्रीवृक्षक' प्रासादका परिमाण कहा जाता है। (प्रकोष्ठ) जिसमें पाँच अण्डक, दो खण्ड तथा मध्यभागमें चार हाथका विस्तार होता है, वह 'वृष' नामक प्रासाद सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला होता है। मैंने पाँच-सात प्रकारके प्रासादोंका वर्णन किया है। अतः अन्य प्रासादोंको, जिनका वर्णन नहीं किया गया, सिंहास्यके प्रमाणानुसार ही जान लेना चाहिये। वे सभी चन्द्रशालाओंसे संयुक्त तथा प्राग्ग्रीवसे संवलित रहेंगे। इन्हें ईंट, लकड़ी या पत्थरके तोरणसहित बनवाना चाहिये। 'मेरु' प्रासाद पचास हाथ, 'मन्दर' उससे पाँच हाथ न्यून अर्थात् पैंतालीस हाथ, 'कैलास' चालीस हाथ और विमान चौंतीस हाथका होता है। उसी प्रकार 'नन्दिवर्धन' बत्तीस हाथ तथा 'नन्दन' और 'सर्वतोभद्र' तीस हाथोंके कहे गये हैं। 'वर्तुल' और 'पद्मक' का परिमाण बीस हाथका कहा गया है। गज, सिंह, कुम्भ, वलभी तथा छन्दक—ये सोलह हाथके होते हैं। 'कैलास', 'मृगराज', 'विमान' और 'छन्दक'—ये बारह हाथके माने गये हैं। ये चारों देवताओंको अत्यन्त प्रिय हैं॥ ४१—५० १/२ ॥ | | गरुडोऽष्टकरो ज्ञेयो हंसो दश उदाहृतः॥ ५१<br>एवमेते प्रमाणेन कर्तव्याः शुभलक्षणाः।<br>यक्षराक्षसनागानां मातृहस्तात् प्रशस्यते॥ ५२<br>तथा मेर्वादयः सप्त ज्येष्ठलिङ्गे शुभावहाः।<br>श्रीवृक्षकादयश्चाष्टौ मध्यमस्य प्रकीर्तिताः ॥ ५३<br>तथा हंसादयः पञ्च कनिष्ठे शुभदा मताः।<br>वलभ्यच्छन्दके गौरी जटामुकुटधारिणी ॥ ५४<br>वरदाभयदा तद्वत् साक्षसूत्रकमण्डलुः। | 'प्रासाद 'गरुड़' आठ हाथोंका तथा 'हंस' दस हाथोंका कहा गया है। इस प्रकार उपर्युक्त प्रमाणके अनुसार इन शुभ लक्षणसम्पन्न प्रासादोंकी रचना करनी चाहिये। यक्ष, राक्षस और नागोंके प्रासाद मातृहस्तके प्रमाणसे प्रशस्त माने गये हैं। मेरु आदि सात प्रासाद ज्येष्ठ लिङ्गके लिये शुभदायक हैं। 'श्रीवृक्षक' आदि आठ मध्यम लिङ्गके लिये शुभदायक कहे गये हैं। इसी प्रकार हंस आदि पाँच कनिष्ठ लिङ्गके लिये शुभदायक माने गये हैं। वलभी और छन्दक प्रासादमें गौरवर्णा, जटा-मुकुटधारिणी एवं क्रमशः चार हाथोंमें—वरमुद्रा, अभयमुद्रा, अक्षसूत्र और कमण्डलु धारण करनेवाली देवी शुभदायिनी |