मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१०३२ * मत्स्यपुराण *
| गृहे तु रक्तमुकुटा उत्पलाङ्कुशधारिणी।<br>वरदाभयदा चापि पूजनीया सभर्तृका ॥ ५५<br><br>तपोवनस्थामितरां तां तु सम्पूजयेद् बुधः।<br>देव्या विनायकस्तद्वद् वलभीच्छन्दके शुभः ॥ ५६ | हैं। गृहमें लाल मुकुट धारण करनेवाली, चार हाथोंमें क्रमशः कमल, अङ्कुश, वरदमुद्रा एवं अभयमुद्रासे युक्त देवीका पतिसहित पूजन करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको दूसरी जो तपोवनमें स्थित रहनेवाली देवी हैं, उनकी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये। देवीके साथ विनायक (गणेशजी) वलभी और छन्दक प्रासादमें शुभदायक होते हैं॥ ५१—५६॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे प्रासादानुकीर्तनं नामैकोनसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६९॥ इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें प्रासादानुकीर्तन नामक दो सौ उनहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६९॥
दो सौ सत्तरवाँ अध्याय
प्रासाद-संलग्न मण्डपोंके नाम, स्वरूप, भेद और उनके निर्माणकी विधि
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
|---|---|
| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि मण्डपानां तु लक्षणम्।<br>मण्डपप्रवरान् वक्ष्ये प्रासादस्यानुरूपतः ॥ १<br>विविधा मण्डपाः कार्या ज्येष्ठमध्यकनीयसः।<br>नामतस्तान् प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमः ॥ २<br>पुष्पकः पुष्पभद्रश्च सुव्रतोऽमृतनन्दनः।<br>कौसल्यो बुद्धिसंकीर्णो गजभद्रो जयावहः ॥ ३<br>श्रीवत्सो विजयश्चैव वास्तुकीर्तिः श्रुतिञ्जयः।<br>यज्ञभद्रो विशालश्च सुश्लिष्टः शत्रुमर्दनः ॥ ४<br>भागपञ्चो नन्दनश्च मानवो मानभद्रकः।<br>सुग्रीवो हरितश्चैव कर्णिकारः शतर्धिकः ॥ ५<br>सिंहश्च श्यामभद्रश्च सुभद्रश्च तथैव च।<br>सप्तविंशतिराख्याता लक्षणं शृणुत द्विजाः ॥ ६<br>स्तम्भा यत्र चतुःषष्टिः पुष्पकः समुदाहृतः।<br>द्विषष्टिः पुष्पभद्रस्तु षष्टिः सुव्रत उच्यते ॥ ७<br>अष्टपञ्चाशकस्तम्भः कथ्यतेऽमृतनन्दनः।<br>कौसल्यः षट् च पञ्चाशच्चतुष्पञ्चाशता पुनः ॥ ८<br>नाम्ना तु बुद्धिसंकीर्णो द्विहीनो गजभद्रकः।<br>जयावहस्तु पञ्चाशच्छ्रीवत्सस्तद् विहीनकः ॥ ९<br>विजयस्तद्द्विहीनः स्याद् वास्तुकीर्तिस्तथैव च।<br>द्वाभ्यामेव प्रहीयेत ततः श्रुतिञ्जयोऽपरः ॥ १० | श्रेष्ठ ऋषिगण! अब मैं प्रासादोंके अनुरूप मण्डपोंका लक्षण बतला रहा हूँ। इस प्रसङ्गमें श्रेष्ठ मण्डपोंका भी वर्णन करूँगा। ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ-भेदोंसे विविध मण्डपोंकी रचना करनी चाहिये। मैं उन सभीका आनुपूर्वी नाम-निर्देशपूर्वक वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। द्विजगण! पुष्पक, पुष्पभद्र, सुव्रत, अमृतनन्दन, कौसल्य, बुद्धिसंकीर्ण, गजभद्र, जयावह, श्रीवत्स, विजय, वास्तुकीर्ति, श्रुतिञ्जय, यज्ञभद्र, विशाल, सुश्लिष्ट, शत्रुमर्दन, भागपञ्च, नन्दन, मानव, मानभद्रक, सुग्रीव, हरित, कर्णिकार, शतर्धिक, सिंह, श्यामभद्र तथा सुभद्र—ये सत्ताईस प्रकारके मण्डप कहे गये हैं। अब आपलोग इनके लक्षणोंको सुनिये। जिस मण्डपमें चौंसठ स्तम्भ लगे हों, उस मण्डपको ‘पुष्पक’ कहते हैं। इसी प्रकार बासठ स्तम्भवालेको ‘पुष्पभद्र’ और साठ स्तम्भवालेको ‘सुव्रत’ कहा गया है। अट्ठावन स्तम्भवाला मण्डप ‘अमृतनन्दन’ कहा जाता है। छप्पन स्तम्भोंवाले मण्डपको ‘कौसल्य’, चौवन स्तम्भवालेको बुद्धिसंकीर्ण, उससे दो स्तम्भ कम अर्थात् बावन स्तम्भवालेको ‘गजभद्रक’, पचास स्तम्भवालेको ‘जयावह’, अड़तालीस स्तम्भोंवाले मण्डपको ‘श्रीवत्स’ तथा छियालीस स्तम्भोंवालेको ‘विजय’ कहते हैं। उसी प्रकार छियालीस स्तम्भोंवाला मण्डप ‘वास्तुकीर्ति’ कहलाता है। चौवालीस स्तम्भोंवाले मण्डपको ‘श्रुतिञ्जय’ कहते हैं॥ १—१०॥ |