भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 1045
* अध्याय २७१ *१०३५

दो सौ एकहत्तरवाँ अध्याय

राजवंशानुकीर्तन *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>पूरोर्वशस्त्वया सूत सभविष्यो निवेदितः।<br>सूर्यवंशे नृपा ये तु भविष्यन्ति हि तान् वद॥ १<br>तथैव यादवे वंशे राजानः कीर्तिवर्धनाः।<br>कलौ युगे भविष्यन्ति तानपीह वदस्व नः॥ २<br>वंशान्ते ज्ञातयो याश्च राज्यं प्राप्स्यन्ति सुव्रताः।<br>ब्रूहि संक्षेपतस्तासां यथाभव्यमनुक्रमात्॥ ३**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! आप पिछली कथाके प्रसङ्गमें पूरुवंशी राजाओंके वंशका भविष्यसहित वर्णन हमलोगोंको सुना चुके हैं। अब आगे कलियुगमें जो सूर्यवंशी राजा होंगे, उनका वर्णन कीजिये। इसी प्रकार जो कीर्तिशाली यदुवंशी राजा होंगे, उन्हें भी बताइये तथा इन वंशोंके अन्त हो जानेपर जो अन्य शुभ व्रत-परायण जातियाँ राज्य करेंगी, उनका भी संक्षेपमें वर्णन कीजिये। इसीके साथ-साथ क्रमशः यह भी बताइये कि भविष्यमें कौन-सी विशेष घटनाएँ घटित होंगी?॥ १—३॥
सूत उवाच<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि हीक्ष्वाकूणां महात्मनाम्।<br>बृहद्बलस्य दायादो वीरो राजा बृहत्क्षयः।<br>उरुक्षयः सुतस्तस्य वत्सव्यूहो उरुक्षयात्॥ ४<br>वत्सव्यूहात् प्रतिव्योमस्तस्य पुत्रो दिवाकरः।<br>तस्यैव मध्यदेशे तु अयोध्या नगरी शुभा॥ ५<br>दिवाकरस्य भविता सहदेवो महायशाः।<br>सहदेवस्य दायादो बृहदश्वो महामनाः॥ ६<br>तस्य भानुरथो भाव्यः प्रतीपाश्वश्च तत्सुतः।<br>प्रतीपाश्वसुतश्चापि सुप्रतीको भविष्यति॥ ७<br>मरुदेवः सुतस्तस्य सुनक्षत्रस्ततोऽभवत्।<br>किंनराश्वः सुनक्षत्राद् भविष्यति परंतपः॥ ८<br>किंनराश्वादन्तरिक्षो भविष्यति महामनाः।<br>सुषेणश्चान्तरिक्षाच्च सुमित्रश्चाप्यमित्रजित्॥ ९<br>सुमित्रजो बृहद्राजो धर्मी तस्य सुतः स्मृतः।<br>पुत्रः कृतञ्जयो नाम धर्मिणः स भविष्यति॥ १०<br>कृतञ्जयसुतो विद्वान् भविष्यति रणञ्जयः।<br>भविता सञ्जयश्चापि वीरो राजा रणञ्जयात्॥ ११<br>सञ्जयस्य सुतः शाक्यः शाक्याच्छुद्धोदनोऽभवत्।<br>शुद्धोदनस्य भविता सिद्धार्थो राहुलः सुतः॥ १२**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसके बाद मैं इक्ष्वाकुवंशी महात्मा राजाओंका वर्णन कर रहा हूँ। सूर्यवंशी राजा बृहद्बलका पुत्र वीरवर राजा बृहत्क्षय होगा तथा बृहत्क्षयका पुत्र उरुक्षय और उरुक्षयका पुत्र वत्सव्यूह होगा। वत्सव्यूहका पुत्र प्रतिव्योम तथा उसका पुत्र दिवाकर होगा। उसीकी राजधानी मध्य देशमें अयोध्या नामक सुन्दर नगरी होगी। दिवाकरका पुत्र महायशस्वी सहदेव होगा तथा सहदेवका पुत्र महामना बृहदश्व होगा। उस बृहदश्वका पुत्र भानुरथ तथा भानुरथका पुत्र प्रतीपाश्व होगा। प्रतीपाश्वका पुत्र सुप्रतीक होगा और उसका पुत्र मरुदेव होगा। मरुदेवका पुत्र सुनक्षत्र उत्पन्न होगा। सुनक्षत्रका पुत्र शत्रुओंको संतप्त करनेवाला किंनराश्व होगा और किंनराश्वका पुत्र महामना अन्तरिक्ष होगा। अन्तरिक्षका पुत्र सुषेण तथा उसका पुत्र शत्रुओंको जीतनेवाला सुमित्र होगा। (प्रथम) सुमित्रका पुत्र बृहद्राज और बृहद्राजका पुत्र धर्मी तथा धर्मीका पुत्र कृतञ्जय होगा। कृतञ्जयका पुत्र विद्वान् रणञ्जय और रणञ्जयका पुत्र वीरराजा सञ्जय उत्पन्न होगा। सञ्जयका पुत्र शाक्य तथा शाक्यका पुत्र राजा शुद्धोदन होगा। शुद्धोदनका पुत्र सिद्धार्थ तथा सिद्धार्थका

* सभी पुराणोंकी अनेक छपी तथा हस्तलिखित प्रतियोंको एकत्र कर तथा पाठका संशोधनकर विल्सन्, स्मिथ, पार्जीटर आदिने इनका सुन्दर अनुवाद भी प्रस्तुत किया है और पीछे वही मिल, एलिफिंस्टन, स्मिथ, कैम्ब्रिज आदिके भारतके प्राचीन इतिहासोंका आधार बना।