मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१०३६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रसेनजित् ततो भाव्यः क्षुद्रको भविता ततः।<br>क्षुद्रकात् कुलको भाव्यः कुलकात् सुरथः स्मृतः॥ १३<br>सुमित्रः सुरथाज्जातो ह्यन्त्यस्तु भविता नृपः।<br>एते चैक्ष्वाकवः प्रोक्ता भविष्या ये कलौ युगे॥ १४<br>बृहद्बलान्वये जाता भविष्याः कुलवर्धनाः।<br>अत्रानुवंशश्लोकोऽयं विप्रैर्गीतः पुरातनैः॥ १५<br>शूराश्च कृतविद्याश्च सत्यसंधा जितेन्द्रियाः।<br>निःशेषाः कथिताश्चैव नृपा ये वै पुरातनाः॥ १६<br>इक्ष्वाकूणामयं वंशः सुमित्रान्तो भविष्यति।<br>सुमित्रं प्राप्य राजानं संस्थां प्राप्स्यति वै कलौ॥ १७<br>इत्येवं भानवो वंशः प्रागेव समुदाहृतः।<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि मागधा ये बृहद्रथाः॥ १८ | पुत्र राहुल होगा। उससे प्रसेनजित उत्पन्न होगा और उससे क्षुद्रककी उत्पत्ति होगी। क्षुद्रकसे कुलक और कुलकसे सुरथ उत्पन्न होगा। सुरथसे सुमित्र (द्वितीय) पैदा होगा, जो इस वंशका अन्तिम राजा होगा। ये इक्ष्वाकुवंशी राजा हैं, जो कलियुगमें उत्पन्न होंगे। ये सभी राजा शूर, विद्वान्, जितेन्द्रिय एवं कुलकी वृद्धि करनेवाले राजा बृहद्बलके वंशमें उत्पन्न होंगे। प्राचीनकालिक ब्राह्मणोंने इस वंशपरम्पराको सूचित करनेवाला इस भावका एक श्लोक कहा है—'इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंका यह वंश राजा सुमित्रके राज्यकालतक होगा। कलियुगमें यह वंश राजा सुमित्रको प्राप्त कर विश्राम करेगा।' इस प्रकार यह सूर्यवंश पहले ही कहा जा चुका है॥ ४—१७ १/२॥ |
| जरासंधस्य ये वंशे सहदेवान्वये नृपाः।<br>अतीता वर्तमानाश्च भविष्यांश्च तथा पुनः॥ १९ | अब इसके बाद मैं बृहद्रथके वंशवाले मगधके राजाओंका, जो जरासंधके पुत्र सहदेवके वंशमें भूत, वर्तमान तथा भविष्यकालमें उत्पन्न होंगे, वर्णन कर रहा हूँ। |
| संग्रामे भारते वृत्ते सहदेवे निपातिते।<br>सोमाधिस्तस्य दायादो राजाभूच्च गिरिव्रजे॥ २० | महाभारत-युद्धमें सहदेवके मारे जानेपर उनका पुत्र सोमाधि गिरिव्रजमें राजा हुआ। |
| पञ्चाशतं तथाष्टौ च समा राज्यमकारयत्।<br>श्रुतश्रवाश्चतुःषष्टिं समास्तस्यान्वयेऽभवत्॥ २१ | उसने अठ्ठावन वर्षोंतक राज्य किया। उसीके वंशमें श्रुतश्रवा नामक राजा हुआ, जो चौंसठ वर्षोंतक राज्य करता रहा। |
| अयुतायुस्तु षट्त्रिंशत् समा राज्यमकारयत्।<br>चत्वारिंशत् समास्तस्य निरमित्रो दिवं गतः॥ २२ | उसके बाद उसका पुत्र अयुतायु राजा हुआ, जिसने छत्तीस वर्षोंतक राज्य किया। उसका पुत्र निरमित्र हुआ, जो चालीस वर्षोंतक राज्य कर स्वर्गवासी हो गया। |
| पञ्चाशतं समाः षट् च सुक्षत्रः प्राप्तवान् महीम्।<br>बृहत्कर्मा त्रयोविंशदब्दं राज्यमकारयत्॥ २३ | उसके बाद राजा सुक्षत्र उत्पन्न हुआ, जिसने छप्पन वर्षोंतक राज्य किया। तदनन्तर बृहत्कर्माने तेईस वर्षोंतक राज्य किया। |
| सेनाजित् सम्प्रयातश्च भुक्त्वा पञ्चाशतं महीम्।<br>श्रुतञ्जयस्तु वर्षाणि चत्वारिंशद् भविष्यति॥ २४ | उसके बाद राजा सेनाजित्ने पचास वर्षोंतक पृथ्वीका पालनकर स्वर्गकी राह ली। तदनन्तर श्रुतञ्जय नामक राजा होगा, जो चालीस वर्षोंतक राज्य करेगा। |
| अष्टाविंशतिवर्षाणि महीं प्राप्स्यति वै विभुः।<br>अष्टपञ्चाशतं षट् च राज्ये स्थास्यति वै शुचिः॥ २५ | उसके बाद विभु अट्ठाईस वर्षोंतक पृथ्वीपर शासक होगा। तत्पश्चात् राजा शुचि चौंसठ वर्षोंतक राज्यपर स्थित रहेगा। |
| अष्टाविंशत् समा राजा क्षेमो भोक्ष्यति वै महीम्।<br>सुव्रतस्तु चतुःषष्टिं राज्यं प्राप्स्यति वीर्यवान्॥ २६ | उसके बाद राजा क्षेम अट्ठाईस वर्षोंतक पृथ्वीका उपभोग करेगा। तदुपरान्त पराक्रमी सुव्रत चौंसठ वर्षोंके लिये राज्य प्राप्त करेगा। |
| पञ्चत्रिंशतिवर्षाणि सुनेत्रो भोक्ष्यते महीम्।<br>भोक्ष्यते निर्वृतिश्चेमामष्टपञ्चाशतं समाः॥ २७ | उसके उपरान्त सुनेत्र पचीस वर्षोंतक पृथ्वीका उपभोग करेगा। तदनन्तर निवृत्ति अट्ठावन वर्षोंतक पृथ्वीका उपभोग करेगा। |
| अष्टाविंशत् समा राज्यं त्रिनेत्रो भोक्ष्यते ततः।<br>चत्वारिंशत् तथाष्टौ च द्युमत्सेनो भविष्यति॥ २८ | उसके बाद राजा त्रिनेत्र अट्ठाईस वर्षतक राज्यका भोग करेगा। तदनन्तर अड़तालीस वर्षतक द्युमत्सेन राजा |