भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1053
* अध्याय २७३ *१०४३
सप्तर्षीणामुपर्येतत् स्मृतं वै दिव्यसंज्ञया ।<br>समा दिव्याः स्मृताः षष्टिर्दिव्याब्दानि तु सप्तभिः ॥ ४१<br><br>एभिः प्रवर्तते कालो दिव्यः सप्तर्षिभिस्तु वै।<br>सप्तर्षीणां च यौ पूर्वौ दृश्येते ह्युदितौ निशि ॥ ४२<br><br>तयोर्मध्ये तु नक्षत्रं दृश्यते यत्समं दिवि।<br>तेन सप्तर्षयो ज्ञेया युक्ता व्योम्नि शतं समाः ॥ ४३<br><br>नक्षत्राणामृषीणां च योगस्यैतन्निदर्शनम्।<br>सप्तर्षयो मघायुक्ताः काले पारिक्षिते शतम् ॥ ४४<br><br>ब्राह्मणास्तु चतुर्विंशा भविष्यन्ति शतं समाः।<br>ततः प्रभृत्ययं सर्वो लोको व्यापत्स्यते भृशम् ॥ ४५<br><br>अनृतोपहता लुब्धा धर्मतः कामतोऽर्थतः।<br>श्रौतस्मार्तेऽतिशिथिले नष्टवर्णाश्रमे तथा ॥ ४६<br><br>संकरं दुर्बलात्मानः प्रतिपत्स्यन्ति मोहिताः।<br>ब्राह्मणाः शूद्रयोनिस्थाः शूद्रा वै मन्त्रयोनयः ॥ ४७<br><br>उपस्थास्यन्ति तान् विप्रास्तदर्थमभिलिप्सवः।<br>क्रमेणैव च दृश्यन्ते स्ववर्णान्तरदायकम् ॥ ४८उन सप्तर्षियोंके ऊपर यह दिव्य नामसे कहा गया है। इसका परिमाण सड़सठ दिव्य वर्षोंका है। इस प्रकार इन सप्तर्षियोंका दिव्य काल प्रवृत्त होता है। रात्रिके समय सप्तर्षियोंके जो दो प्रारम्भिक पूर्व दिशामें जिस नक्षत्रके सामने उदित होते हैं, सभी सप्तर्षि उसी नक्षत्रमें स्थित माने जाते हैं। पुनः सौ वर्षोंके बाद आकाशमें उनका दूसरे नक्षत्रके साथ मिलन होता है। नक्षत्रों और उन सप्तर्षियोंके संयोगकी यही गति बतायी जाती है। ये सप्तर्षिगण राजा परीक्षित्के राज्यकालमें मघा नक्षत्रमें स्थित थे। उनके चौबीस सौ वर्ष बाद राज्य करनेवाले शुङ्गवंशीय ब्राह्मण राजा होंगे। उसके बाद यह सारा लोक अत्यन्त पतित हो जायगा। उस समय सारी प्रजाएँ मिथ्या व्यवहारमें लीन, लोभी, धर्म, अर्थ एवं कामसे हीन, वैदिक एवं स्मार्त नियमोंके पालनसे विमुख, वर्णाश्रम-धर्मकी मर्यादासे विहीन और दुर्बलात्मा हो जायँगी। वे मोहित होकर वर्णसंकर संतान उत्पन्न करेंगी। ब्राह्मण शूद्रयोनिमें स्थित हो जायँगे और शूद्र मन्त्रोंके ज्ञाता हो जायँगे। उन्हीं मन्त्रोंको जाननेकी अभिलाषासे ब्राह्मण उन मन्त्रज्ञ शूद्रोंकी उपासना करेंगे। क्रमशः सभी लोग अपने वर्ण-धर्मको छोड़कर अन्य वर्णमें सम्मिलित हो जायँगे ॥ ३८-४८ ॥
क्षयमेव गमिष्यन्ति क्षीणशेषा युगक्षये।<br>यस्मिन् कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्नेव तदाहनि ॥ ४९<br><br>प्रतिपन्नं कलियुगं प्रमाणं तस्य मे शृणु।<br>चतुःशतसहस्त्रं तु वर्षाणां वै स्मृतं बुधैः ॥ ५०<br><br>चत्वार्यष्टसहस्राणि संख्यातं मानुषेण तु।<br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु तदा संध्या प्रवर्तते ॥ ५१<br><br>निःशेषे तु तदा तस्मिन् कृतं वै प्रतिपत्स्यते।<br>ऐलश्चेक्ष्वाकुवंशश्च सहदेवः प्रकीर्तितः ॥ ५२<br><br>इक्ष्वाकोः संस्मृतं क्षत्रं सुमित्रान्तं भविष्यति।<br>ऐलं क्षत्रं समाक्रान्तं सोमवंशविदो विदुः ॥ ५३<br><br>एते विवस्वतः पुत्राः कीर्तिताः कीर्तिवर्धनाः।<br>अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताश्च येः ॥ ५४<br><br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्तथा शूद्राश्च वै स्मृताः।<br>वैवस्वतेऽन्तरे तस्मिन्निति वंशः समाप्यते ॥ ५५फिर नष्ट होनेसे बची हुई प्रजाएँ युगान्तके समय विनष्ट हो जायँगी। जिस दिन श्रीकृष्ण स्वर्ग (गोलोक) गये, उसी दिन कलियुगका प्रारम्भ हुआ। इसका प्रमाण मुझसे सुनिये। बुद्धिमान् लोग उस कलियुगका प्रमाण मानववर्षके अनुसार चार लाख बत्तीस हजार और दिव्यमानके अनुसार एक हजार वर्ष मानते हैं। उसके बाद उसकी संध्या (तथा संध्यांश) प्रवृत्त होती है। उस कलियुगके समाप्त होनेपर कृतयुगका प्रारम्भ होता है। सहदेव ऐल और इक्ष्वाकुवंशीय—दोनों कहा जाता है। इक्ष्वाकुका वंश राजा सुमित्रतक बतलाया जाता है। सोमवंशके ज्ञाता लोग ऐलवंशको चन्द्रवंशमें संक्रान्त मानते हैं। ये ही विवस्वान्‌के भी कीर्तिशाली पुत्र कहे गये हैं, जो भूत, वर्तमान तथा भविष्यकालमें होनेवाले हैं। उस वैवस्वत मन्वन्तरमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—इन सभी वर्णोंके लोग होते हैं। इस प्रकार अब यहाँ यह वंश-वर्णन समाप्त हो जाता है ॥ ४९–५५ ॥