भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1054
१०४४* मत्स्यपुराण *

| देवापिः पौरवो राजा ऐक्ष्वाको यश्च ते मतः।<br>महायोगबलोपेतौ कलापग्राममाश्रितौ॥ ५६<br>एतौ क्षत्रप्रणेतारौ नवविंशे चतुर्युगे।<br>सुवर्चा मनुपुत्रस्तु ऐक्ष्वाकाद्यो भविष्यति॥ ५७<br>नवविंशे युगेऽसौ वै वंशस्यादिर्भविष्यति।<br>देवापिपुत्रः सत्यस्तु ऐलानां भविता नृपः॥ ५८<br>क्षत्रप्रवर्तकावेतौ भविष्ये तु चतुर्युगे।<br>एवं सर्वेषु विज्ञेयं संतानार्थं तु लक्षणम्॥ ५९<br>क्षीणे कलियुगे चैव तिष्ठन्तीति कृते युगे।<br>सप्तर्षयस्तु तैः सार्धं मध्ये त्रेतायुगे पुनः॥ ६०<br>बीजार्थं वै भविष्यन्ति ब्रह्मक्षत्रस्तु वै पुनः।<br>एवमेवं तु सर्वेषु तिष्यान्तेष्वन्तरेषु च॥ ६०<br>सप्तर्षयो नृपैः सार्धं सन्तानार्थं युगे युगे।<br>एवं क्षत्रस्य चोत्सेधः सम्बन्धो वै द्विजैः स्मृतः॥ ६१<br>मन्वन्तराणां संताने संतानाश्च श्रुतौ स्मृताः।<br>अतिक्रान्तयुगाश्चैव ब्रह्मक्षत्रस्य सम्भवाः॥ ६२<br>यथा प्रशान्तिस्तेषां वै प्रकृतीनां तथा क्षयः।<br>सप्तर्षयो विदुस्तेषां दीर्घायुष्ट्वं क्षयोदयौ॥ ६३ | पुरुवंशीय राजा देवापि और इक्ष्वाकुवंशीय राजा (सहदेव), जिसे तुम मानते हो—ये दोनों महान् योगबलसे सम्पन्न होंगे, जो कलाप ग्राममें निवास करते हैं। उन्तीसवीं चतुर्युगीमें ये दोनों राजा क्षत्रिय जातिके नेता होंगे। मनुका पुत्र सुवर्चा इक्ष्वाकुवंशीय राजाओंमें प्रथम होगा। वही उन्तीसवें युगमें अपने वंशका मूल पुरुष होगा तथा देवापिका पुत्र सत्य ऐलवंशीयोंका राजा होगा। भविष्यकालीन चतुर्युगमें ये दोनों क्षात्रधर्मके प्रवर्तक होंगे। इसी प्रकार सभी वंशोंमें सन्ततिके लक्षणोंको जानना चाहिये। कलियुगके क्षीण हो जानेपर कृतयुगमें सप्तर्षि उन राजाओंके साथ स्थित रहते हैं। पुनः त्रेताके मध्यमें वे ब्राह्मण और क्षत्रियके बीजके कारण होते हैं। इसी प्रकार सभी कलियुगों एवं अन्य युगोंमें होता है। प्रत्येक युगमें सप्तर्षि राजाओंके साथ प्रजाओंकी उत्पत्तिके लिये अवस्थित रहते हैं। इसी प्रकार ब्राह्मणोंद्वारा क्षत्रियोंकी उत्पत्तिका सम्बन्ध कहा जाता है। मन्वन्तरोंके विस्तारमें ब्राह्मण और क्षत्रियसे उत्पन्न हुई संतान युगको अतिक्रान्त कर जाती है, ऐसा श्रुतियोंमें कहा गया है। वे सप्तर्षि उन संततियोंकी जिस प्रकार प्रशान्ति होती है तथा जिस प्रकार क्षय-दीर्घायुकी प्राप्ति, उन्नति और अवनति होती है, वह सब जानते हैं॥ ५६—६३॥ | | एतेन क्रमयोगेन ऐला इक्ष्वाकवो नृपाः।<br>उत्पद्यमानास्त्रेतायां क्षीयमाणाः कलौ युगे॥ ६४<br>अनुयान्ति युगाख्यां तु यावन्मन्वन्तरक्षयम्।<br>जामदग्न्येन रामेण क्षत्रे निरवशेषिते॥ ६५<br>रिक्तेयं वसुधा सर्वा क्षत्रियैर्वसुधाधिपैः।<br>द्विवंशकरणं सर्वं कीर्त्तयिष्ये निबोध मे॥ ६६<br>ऐलं चैक्ष्वाकुवंशं च प्रकृतिं परिचक्षते।<br>राजानः श्रेणिबद्धाश्च तथान्ये क्षत्रिया भुवि॥ ६७<br>ऐलवंशास्तु भूयांसो न तथैक्ष्वाकवो नृपाः।<br>एषामेकशतं पूर्णं कुलानामभिरोचते॥ ६८<br>तावदेव तु भोजानां विस्ताराद् द्विगुणं स्मृतम्।<br>भोजानां द्विगुणं क्षत्रं चतुर्धा तद् यथातथम्॥ ६९<br>ते ह्यतीताः सनामानो ब्रुवतस्तान् निबोध मे।<br>शतं वै प्रतिविन्ध्यानां शतं नागाः शतं हयाः॥ ७० | इस प्रकारके क्रमयोगसे चन्द्रवंशी और इक्ष्वाकुवंशीय राजा त्रेतामें उत्पन्न होकर कलियुगमें विनष्ट हो जाते हैं। एक मन्वन्तरके विनाशक युग संज्ञा कही जाती है। जमदग्निके पुत्र परशुरामद्वारा क्षत्रियोंका संहार हो जानेपर यह सारी पृथ्वी क्षत्रिय राजाओंसे शून्य हो गयी थी। अब मैं राजाओंके सूर्य-चन्द्र—इन दो वंशोंकी उत्पत्ति बता रहा हूँ, उसे मुझसे सुनिये। ऐल और इक्ष्वाकुवंश—क्षत्रियोंकी मूल प्रकृति कहे गये हैं। इन राजाओंके वंशज तथा अन्य क्षत्रियगण पृथ्वीपर प्रचुर परिमाणमें अवस्थित हैं। इनमें ऐलवंशीय राजा तो बहुत हैं, किंतु इक्ष्वाकुवंशीय उतने नहीं हैं। इनके कुलोंकी संख्या पूरी एक सौ बतलायी जाती है। इसी प्रकार भोजवंशीय राजाओंका विस्तार इनसे दूना है। भोजवंशीय राजाओंसे दूने अन्य क्षत्रियगण हैं। वे चार प्रकारके हैं और बीत चुके हैं। मैं उनका नामसहित यथार्थ रूपसे वर्णन कर रहा हूँ, उसे मुझसे सुनिये। इनमें प्रतिविन्ध्योंकी संख्या सौ, नागोंकी संख्या सौ, हयोंकी संख्या सौ |