भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1055
* अध्याय २७३ *१०४५

| शतमेकं धार्तराष्ट्रा ह्यशीतिर्जनमेजयाः ।<br>शतं वै ब्रह्मदत्तानां वीराणां कुरवः शतम् ॥ ७१<br>ततः शतं च पाञ्चालाः शतं काशिकुशादयः ।<br>तथापरे सहस्रे द्वे ये नीपाः शशबिन्दवः ॥ ७२ | और धार्तराष्ट्रोंकी संख्या सौ है। जनमेजयोंकी संख्या अस्सी है। वीरवर ब्रह्मदत्तोंकी संख्या सौ, कुरुओंकी संख्या सौ, पाञ्चालोंकी संख्या सौ और काशि-कुशादिकी संख्या सौ है। इनके अतिरिक्त जो नीप और शशबिन्दु हैं, उनकी संख्या दो हजार है॥ ६४—७२॥ | | इष्टवन्तश्च ते सर्वे सर्वे नियतदक्षिणाः ।<br>एवं राजर्षयोऽतीताः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ७३<br>मनोर्वैवस्वतस्यासन् वर्तमानेऽन्तरे विभोः ।<br>तेषां तु निधनोत्पत्तौ लोकसंस्थितयः स्थिताः ॥ ७४<br>न शक्यो विस्तरस्तेषां सन्तानस्य परस्परम् ।<br>तत्पूर्वापरयोगेन वक्तुं वर्षशतैरपि ॥ ७५<br>अष्टाविंशसमाख्याता गता वैवस्वतेऽन्तरे ।<br>एते देवगणैः सार्धं शिष्टा ये तान् निबोधत ॥ ७६<br>चत्वारिंशत् त्रयश्चैव भविष्यास्ते महात्मनः ।<br>अवशिष्टा युगाख्यास्ते ततो वैवस्वतो ह्ययम् ॥ ७७<br>एतद्वः कीर्तितं सम्यक् समासव्यासयोगतः ।<br>पुनर्वक्तुं बहुत्वात् तु न शक्यं विस्तरेण तु ॥ ७८<br>उक्ता राजर्षयो ये तु अतीतास्ते युगैः सह ।<br>ये ते ययातिवंश्यानां ये च वंशा विशाम्पते ॥ ७९<br>कीर्तिता द्युतिमन्तस्ते य एतान् धारयेन्नरः ।<br>लभते स वरान् पञ्च दुर्लभानिह लौकिकान् ॥ ८०<br>आयुः कीर्तिं धनं स्वर्गं पुत्रांश्चाभिजायते ।<br>धारणाच्छ्रवणाच्चैव परं स्वर्गस्य धीमतः ॥ ८१ | वे सभी यज्ञ करनेवाले तथा अत्यधिक दक्षिणा प्रदान करनेवाले थे। इस प्रकार सैकड़ों-हजारों राजर्षिगण बीत चुके हैं, जो प्रभावशाली वैवस्वत मनुके वर्तमान अन्तरमें जन्म ग्रहण कर चुके हैं। उनके मरण और उत्पत्तिमें अब लोककी स्थिति ही प्रमाणभूत है। उनकी संतानका विस्तार तो परस्पर पूर्वापर-सम्बन्धसे सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं बताया जा सकता। इस वैवस्वत मन्वन्तरमें वे नृपतिगण अपने वंशदेवताओंके साथ अट्ठाईस पीढ़ी तक बीत चुके हैं। जो शेष हैं, उन्हें सुनिये। वे महात्मा राजा तैंतालीस होंगे। उन अवशिष्ट वैवस्वत महात्माओंकी संज्ञा उनके युगोंके साथ है। इस प्रकार मैंने इन वंशोंका विस्तार और संक्षेपसे वर्णन कर दिया। उनकी संख्या बहुत होनेके कारण मैं विस्तारपूर्वक बतलानेमें असमर्थ हूँ। राजन्! मैंने जिन ययातिवंशीय राजाओंके वंशधर राजर्षियोंकी चर्चा की है, वे सभी युगोंके साथ समाप्त हो चुके हैं। वे सभी कान्तिमान् एवं यशस्वी थे। जो मनुष्य उनके नामोंको स्मरण रखता है, वह इस लोकमें पाँच दुर्लभ लौकिक वरदानोंको प्राप्त कर लेता है, अर्थात् वह आयु, कीर्ति, धन, स्वर्ग और पुत्रसे सम्पन्न होकर उत्पन्न होता है तथा उस बुद्धिमान्‌को इनके स्मरण एवं श्रवण करनेसे परमस्वर्गकी प्राप्ति होती है॥ ७३—८१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भविष्यराजानुकीर्तनं नाम त्रिसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें भविष्यकालिक राजाओंका वर्णन नामक दो सौ तिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २७३ ॥