मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| १०४६ | * मत्स्यपुराण * |
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दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय
षोडश दानान्तर्गत तुलादानका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ऋषय ऊचुः<br>न्यायेनार्जनमर्थानां वर्धनं चाभिरक्षणम्।<br>सत्पात्रप्रतिपत्तिश्च सर्वशास्त्रेषु पठ्यते॥ १<br>कृतकृत्यो भवेत् केन मनस्वी धनवान् बुधः।<br>महादानेन दत्तेन तन्मो विस्तरतो वद॥ २ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी ! सभी शास्त्रोंमें न्यायपूर्वक धनार्जन, उसकी वृद्धि और रक्षा करना तथा उसे सत्पात्रको दान करना आदि बातें पढ़ी जाती हैं, किंतु मनस्वी बुद्धिमान् धनी पुरुष किस महादानके करनेसे कृतार्थ हो सकता है, आप मुझे इसे विस्तारपूर्वक बताइये॥ १-२॥ |
| सूत उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानानुकीर्तनम्।<br>दानधर्मेऽपि यन्नोक्तं विष्णुना प्रभविष्णुना॥ ३<br>तदहं सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>सर्वपापक्षयकरं नृणां दुःस्वप्ननाशनम्॥ ४<br>यत्तत्षोडशधा प्रोक्तं वासुदेवेन भूतले।<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं सर्वपापहरं शुभम्॥ ५<br>पूजितं देवताभिश्च ब्रह्मविष्णुशिवादिभिः।<br>आद्यं तु सर्वदानानां तुलापुरुषसंज्ञकम्॥ ६<br>हिरण्यगर्भदानं च ब्रह्माण्डं तदनन्तरम्।<br>कल्पपादपदानं च गोसहस्त्रं च पञ्चमम्॥ ७<br>हिरण्यकामधेनुश्च हिरण्याश्वस्तथैव च।<br>हिरण्याश्वरथस्तद्वद्धेमहस्तिरथस्तथा ॥ ८<br>पञ्चलाङ्गलकं तद्वद् धरादानं तथैव च।<br>द्वादशं विश्वचक्रं तु ततः कल्पलतात्मकम्॥ ९<br>सप्तसागरदानं च रत्नधेनुस्तथैव च।<br>महाभूतघटस्तद्वत् षोडशं परिकीर्तितम्॥ १० | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो ! अब इसके बाद मैं आपलोगोंको महादानकी विधि बतला रहा हूँ। जिसे महातेजस्वी विष्णुने भी (विष्णुधर्मोत्तरपुराणके) दान-धर्म-प्रकरणमें नहीं बतलाया है, उस सर्वश्रेष्ठ महादानका वर्णन मैं कर रहा हूँ। वह मनुष्योंके सभी पापोंको नष्ट करनेवाला तथा दुःस्वप्नोंका विनाशक है। उस दानको पृथ्वीतलपर भगवान् वासुदेवने सोलह प्रकारका बतलाया है। वे सभी पुण्यप्रद, पवित्र, दीर्घ आयु प्रदान करनेवाले, सभी पापोंके विनाशक, मङ्गलकारी तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवताओंद्धारा पूजित हैं। उन सभी दानोंमें सबसे प्रथम तुलापुरुषका दान है। तत्पश्चात् (दूसरा) हिरण्यगर्भदान, (तीसरा) ब्रह्माण्डदान, (चौथा) कल्पवृक्षदान, पाँचवाँ एक हजार गो-दान, फिर सुवर्ण-निर्मित कामधेनुका दान, स्वर्णमय अश्वका दान, हिरण्याश्वरथ-दान, हेम-हस्ति-रथ-दान, पञ्चलाङ्गलक-दान, धरादान, (बारहवाँ) विश्वचक्र-दान, कल्पलता-दान, सप्तसागर-दान, रत्नधेनु-दान तथा (सोलहवाँ) महाभूतघट-दान—ये सोलह दान कहे गये हैं॥ ३—१०॥ |
| सर्वाण्येतानि कृतवान् पुरा शम्बरसूदनः।<br>वासुदेवस्तु भगवानम्बरीषोऽथ भार्गवः॥ ११<br>कार्तवीर्यार्जुनो नाम प्रह्लादः पृथुरेव च।<br>कुर्यु रन्ये महीपालाः केचिच्च भरतादयः॥ १२<br>यस्माद् विघ्नसहस्रेण महादानानि सर्वदा।<br>रक्षन्ते देवताः सर्वा एकैकमपि भूतले॥ १३ | प्राचीनकालमें इन सभी दानोंको शम्बरासुरके शत्रु भगवान् वासुदेवने किया था। उसके बाद अम्बरीष, भार्गव (परशुराम), कार्तवीर्यार्जुन, प्रह्लाद, पृथु तथा भरत आदि अन्यान्य राजाओंने किया था। चूँकि इस पृथ्वीतलपर इन सब दानोंमें एक-एक दानकी सर्वदा सभी देवता हजारों विघ्नोंसे रक्षा करते हैं; इनमेंसे भूतलपर यदि |