भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०५० * मत्स्यपुराण *


| ॐ अग्नये नमः।<br>एह्येहि वैवस्वत धर्मराज सर्वौमरैरर्चित दिव्यमूर्ते।<br>शुभाशुभानन्दशुचामधीश शिवाय नः पाहि मखं नमस्ते॥ ४४<br>ॐ यमाय नमः। | 'ॐ अग्निको नमस्कार है।'—ऐसा कहकर अग्निका आवाहन करना चाहिये। सूर्यपुत्र धर्मराज! आप सभी देवताओंद्वारा पूजित, दिव्य शरीरधारी और शुभ एवं अशुभ तथा आनन्द एवं शोकके अधीश्वर हैं, हमारे कल्याणके लिये हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको अभिवादन है। 'ॐ यमराजको नमस्कार है।'—ऐसा कहकर यमका आवाहन करना चाहिये॥ ३६—४४॥ | | एह्येहि रक्षोगणनायकस्त्वं सर्वैस्तु वेतालपिशाचसंघैः।<br>ममाध्वरं पाहि शुभादिनाथ लोकेश्वरस्त्वं भगवन् नमस्ते॥ ४५<br>ॐ निर्ऋतये नमः। | भगवन्! आप लोकोंके अधीश्वर तथा राक्षसमूहके नायक हैं। शुभादिनाथ! आप वेतालों और पिशाचोंके विशाल समूहके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको प्रणाम है। ॐ निर्ऋतिको नमस्कार है, ऐसा कहकर निर्ऋतिका आवाहन करना चाहिये। | | एह्येहि यादोगणवारिधीनां गणेन पर्जन्यमहाप्सरोभिः।<br>विद्याधरेन्द्रामरगीयमान पाहि त्वमस्मान् भगवन् नमस्ते॥ ४६<br>ॐ वरुणाय नमः। | भगवन्! विद्याधर और इन्द्र आदि देवता आपका गुण-गान करते हैं, आप समस्त जलचरों, समुद्रों, बादलों और अप्सराओंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये और हमारी रक्षा कीजिये। आपको अभिवादन है। 'ॐ वरुणको नमस्कार है।' ऐसा कहकर वरुणका आवाहन करना चाहिये। | | एह्येहि यज्ञे मम रक्षणाय मृगाधिरूढः सह सिद्धसंघैः।<br>प्राणाधिपः कालकवेः सहायो गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥ ४७<br>ॐ वायवे नमः। | भगवन्! आप कालाग्निके सहायक और प्राणोंके अधीश्वर हैं, आप मृग (हिरन)-पर आरूढ़ हो सिद्ध-समूहोंके साथ मेरी रक्षा करनेके लिये यज्ञमें पधारिये, अवश्य पधारिये और मेरी पूजा स्वीकार कीजिये। आपको नमस्कार है। 'ॐ वायुको नमस्कार है।'—ऐसा कहकर वायुका आवाहन करना चाहिये। | | एह्येहि यज्ञेश्वर यज्ञरक्षां विधत्स्व नक्षत्रगणेन सार्धम्।<br>सर्वौषधीभिः पितृभिः सहैव गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥ ४८<br>ॐ सोमाय नमः। | यज्ञेश्वर! आप नक्षत्रगणों, सभी ओषधियों तथा पितरोंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। भगवन्! आप मेरी पूजा स्वीकार कीजिये, आपको प्रणाम है। 'ॐ सोमको नमस्कार है'—ऐसा कहकर सोमका आवाहन करना चाहिये। | | एह्येहि विश्वेश्वर नस्त्रिशूल-कपालखट्वाङ्गधरेण सार्धम्।<br>लोकेश यज्ञेश्वर यज्ञसिद्धयै गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते॥ ४९<br>ॐ ईशानाय नमः। | यज्ञोंके स्वामी विश्वेश्वर! आप त्रिशूल, कपाल, खट्वाङ्ग धारण करनेवाले अपने गणोंके साथ हमारे यज्ञमें सिद्धि प्रदान करनेके लिये उपस्थित होइये, अवश्य आइये और लोकेश! मेरी पूजा ग्रहण कीजिये। भगवन्! आपको अभिवादन है। 'ॐ ईशानको नमस्कार है।'—ऐसा कहकर ईशानका आवाहन करना चाहिये। | | एह्येहि पातालधराधरेन्द्र नागाङ्गनाकिन्नरगीयमान ।<br>यक्षोरगेन्द्रामरलोकसार्ध-मनन्त रक्षाध्वरमस्मदीयम्॥ ५० | अनन्त! आप पाताल एवं पृथ्वीको धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ हैं तथा नागाङ्गनाएँ और किंनर आपका गुण-गान करते हैं, आप यक्षों, नागेन्द्रों और देवगणोंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये |