भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 1061, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1061
* अध्याय २७४ *१०५१

| ॐ अनन्ताय नमः। <br><br> एहोहि विश्वाधिपते मुनीन्द्र <br> लोकेन सार्धं पितृदेवताभिः। <br> सर्वस्य धातास्यमितप्रभाव <br> विशाध्वरं नो भगवन् नमस्ते॥ ५१ <br><br> ॐ ब्रह्मणे नमः। <br><br> त्रैलोक्ये यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च। <br> ब्रह्मविष्णुशिवैः सार्धं रक्षां कुर्वन्तु तानि मे॥ ५२ <br> देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः। <br> ऋषयो मदनो गावो देवमातर एव च॥ ५३ <br> सर्वे ममाध्वरे रक्षां प्रकुर्वन्तु मुदान्विताः। <br> इत्यावाह्य सुरान् दद्याद् ऋत्विग्भ्यो हेमभूषणम्॥ ५४ <br> कुण्डलानि च हैमानि सूत्राणि कटकानि च। <br> अङ्गुलीयपवित्राणि वासांसि शयनानि च॥ ५५ <br> द्विगुणं गुरवे दद्याद् भूषणाच्छादनानि च। <br> जपेयुः शान्तिकाध्यायं जापकाः सर्वतोदिशम्॥ ५६ <br> तत्रोषितास्तु ते सर्वे कृत्वैवमधिवासनम्। <br> आदावन्ते च मध्ये च कुर्याद् ब्राह्मणवाचनम्॥ ५७ <br> ततो मङ्गलशब्देन स्नापितो वेदपुङ्गवैः। <br> त्रिःप्रदक्षिणामावृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ ५८ <br> शुक्लमाल्याम्बरो भूत्वा तां तुलामभिमन्त्रयेत्। <br> नमस्ते सर्वदेवानां शक्तिस्त्वं सत्यमास्थिता॥ ५९ <br> साक्षिभूता जगद्धात्री निर्मिता विश्वयोनिना। <br> एकतः सर्वसत्यानि तथानृतशतानि च॥ ६० <br> धर्माधर्मकृतां मध्ये स्थापितासि जगद्धिते। <br> त्वं तुले सर्वभूतानां प्रमाणमिह कीर्तिता॥ ६१ <br> मां तोलयन्ती संसारादुद्धरस्व नमोऽस्तु ते। <br> योऽसौ तत्त्वाधिपो देवः पुरुषः पञ्चविंशकः॥ ६२ <br> स एकोऽधिष्ठितो देवि त्वयि तस्मान्नमो नमः। <br> नमो नमस्ते गोविन्द तुलापुरुषसंज्ञक॥ ६३ <br> त्वं हरे तारयस्वास्मानस्मात् संसारकर्दमात्। <br> पुण्यकालं समासाद्य कृत्वैवमधिवासनम्॥ ६४ | और हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। 'ॐ अनन्तको नमस्कार है'—ऐसा कहकर अनन्तका आवाहन करना चाहिये। विश्वाधिपति! आप समस्त जगत्के विधाता हैं। मुनीन्द्र! आप पितर, देवता एवं लोकपालोंके साथ यहाँ आइये, अवश्य आइये। अमित प्रभावशाली! आप हमारे यज्ञमें प्रविष्ट होइये। भगवन्! आपको प्रणाम है। 'ॐ ब्रह्माको नमस्कार है'—ऐसा कहकर ब्रह्माका आवाहन करना चाहिये। त्रिलोकीमें जितने स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सभी ब्रह्मा, विष्णु और शिवके साथ मेरी रक्षा करें। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, ऋषिगण, कामदेव, गौएँ, देव-माताएँ—ये सभी हर्षपूर्वक मेरे यज्ञकी रक्षा करें॥ ४५—५३ १/२॥ <br><br> इस प्रकार देवताओंका आवाहन कर ऋत्विजोंको सुवर्णका आभूषण, कुण्डल, जंजीर, कङ्कण, पवित्र अँगूठी, वस्त्र तथा शय्याका दान करना चाहिये। ये भूषण और वस्त्र गुरुके लिये दूना देना चाहिये। उस समय सभी दिशाओंमें जापक शान्तिकाध्यायका जप करते रहें। उन सभी ब्राह्मणोंको वहाँ उपस्थित रहना चाहिये और इस प्रकार अधिवासन कर प्रत्येक कार्यके प्रारम्भ, मध्य तथा अन्तमें स्वस्तिवाचन करना चाहिये। तत्पश्चात् माङ्गलिक शब्दोंका उच्चारण करते हुए वेदज्ञोंद्वारा अभिषिक्त यजमान श्वेत वस्त्र धारणकर अञ्जलिमें पुष्प ले उस तुलाकी तीन बार प्रदक्षिणा कर उसे इस प्रकार अभिमन्त्रित करे। तुले! तुम सभी देवताओंकी शक्तिस्वरूपा हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम सत्यकी आश्रयभूता, साक्षिस्वरूपा, जगत्को धारण करनेवाली और विश्वयोनि ब्रह्माद्वारा निर्मित की गयी हो, जगत्की कल्याणकारिणी! तुम्हारी एक तुलापर सभी सत्य हैं, दूसरीपर सौ असत्य हैं। धर्मात्मा और पापियोंके बीच तुम्हारी स्थापना हुई है। तुम भूतलपर सभी जीवोंके लिये प्रमाणरूप बतलायी गयी हो। मुझे तोलती हुई तुम इस संसारसे मेरा उद्धार कर दो, तुम्हें नमस्कार है। देवि! जो ये तत्त्वोंके अधीश्वर पचीसवें पुरुष भगवान् हैं, वे एकमात्र तुम्हींमें अधिष्ठित हैं, इसलिये तुम्हें बारंबार प्रणाम है। तुला-पुरुष नामधारी गोविन्द! आपको बारंबार अभिवादन है। हरे! आप इस संसाररूपी पङ्कसे हमारा उद्धार कीजिये। इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुष पुण्यकालमें अधिवासन |

मत्स्य महापुराण · पृष्ठ 1061, कुल 1098 में से · BharatKosha