मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| शुक्लमाल्याम्बरधरः सर्वाभरणभूषितः।<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ १०<br>नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यकवचाय च।<br>सप्तलोकसुराध्यक्ष जगद्धात्रे नमो नमः॥ ११<br>भूर्लोकप्रमुखा लोकास्तव गर्भे व्यवस्थिताः।<br>ब्रह्मादयस्तथा देवा नमस्ते विश्वधारिणे॥ १२<br>नमस्ते भुवनाधार नमस्ते भुवनाश्रय।<br>नमो हिरण्यगर्भाय गर्भे यस्य पितामहः॥ १३<br>यतस्त्वमेव भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः।<br>तस्मान्मामुद्धराशेषदुःखसंसारसागरात् ॥ १४<br>एवमामन्त्र्य तन्मध्यमाविश्यास्त उदङ्मुखः।<br>मुष्टिभ्यां परिसंगृह्य धर्मराजचतुर्मुखौ ॥ १५<br>जानुमध्ये शिरः कृत्वा तिष्ठेदुच्छ्वासपञ्चकम्।<br>गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तोन्नयनं तथा॥ १६<br>कुर्युर्हिरण्यगर्भस्य ततस्ते द्विजपुङ्गवाः।<br>गीतमङ्गलघोषेण गुरुरुत्थापयेत् ततः॥ १७ | करे; फिर श्वेत वस्त्र और माला धारण कर सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत हो अञ्जलिमें पुष्प लेकर इस मन्त्रका उच्चारण करे—'सातों लोकों तथा देवताओंके स्वामी! आप हिरण्यगर्भ, हिरण्यकवच और जगत्के विधाता हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। भू-लोक आदि सभी लोक तथा ब्रह्मा आदि देवगण आपके गर्भमें स्थित हैं, अतः आप विश्वधारीको प्रणाम है। भुवनोंके आधार! आपको अभिवादन है। भुवनोंके आश्रय! आपको नमस्कार है। जिनके गर्भमें पितामह स्थित हैं, उन हिरण्यगर्भको प्रणाम है। देव! चूँकि आप ही भूतात्मा होकर प्रत्येक प्राणीमें स्थित हैं, इसलिये सम्पूर्ण दुःखोंसे परिपूर्ण इस संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये।' इस प्रकार आमन्त्रित कर मण्डपके मध्यभागमें प्रविष्ट हो उत्तराभिमुख बैठे; फिर अपनी मुट्ठियोंसे धर्मराज तथा चतुर्मुख ब्रह्माको पकड़कर अपने घुटनोंके बीचमें सिर कर पाँच बार श्वास लेता हुआ उसी प्रकार स्थित रहे, तबतक श्रेष्ठ ब्राह्मण उस हिरण्यगर्भका गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन संस्कार करायें। तब आचार्य गीत एवं माङ्गलिक शब्दोंके साथ यजमानको ऊपर उठाये॥ ९—१७॥ | | जातकर्मादिकाः कुर्युः क्रियाः षोडश चापराः।<br>सूच्यादिकं च गुरवे दद्यान्मन्त्रमिमं जपेत् ॥ १८<br>नमो हिरण्यगर्भाय विश्वगर्भाय वै नमः।<br>चराचरस्य जगतो गृहभूताय वै नमः॥ १९<br>यथाहं जनितः पूर्वं मर्त्यधर्मा सुरोत्तम।<br>त्वद्गर्भसम्भवादेष दिव्यदेहो भवाम्यहम्॥ २०<br>चतुर्भिः कलशैरभूयस्ततस्ते द्विजपुङ्गवाः।<br>स्नापयेयुः प्रसन्नाङ्गाः सर्वाभरणभूषिताः॥ २१<br>देवस्य त्वेति मन्त्रेण स्थितस्य कनकासने।<br>अद्य जातस्य तेऽङ्गानि अभिषेक्ष्यामहे वयम्॥ २२<br>दिव्येनानेन वपुषा चिरं जीव सुखी भव।<br>ततो हिरण्यगर्भं तं तेभ्यो दद्याद्विचक्षणः॥ २३<br>ते पूज्याः सर्वभावेन बहवो वा तदाज्ञया।<br>तत्रोपकरणं सर्वं गुरवे विनिवेदयेत्॥ २४<br>पादुकोपानहच्छत्रचामरासनभाजनम् ।<br>ग्रामं वा विषयं वापि यदन्यदपि सम्भवेत् ॥ २५ | तत्पश्चात् जातकर्म आदि अन्य सोलहों क्रियाओंको करना चाहिये। फिर यजमान उन सूची आदि सामग्रियोंको गुरुको दान कर दे और इस मन्त्रका पाठ करे—'हिरण्यगर्भको नमस्कार है। विश्वगर्भको प्रणाम है। आप चराचर जगत्के गृहभूत हैं, आपको अभिवादन है। सुरोत्तम! जिस प्रकार मैं पहले जन्म-मरण-युक्त प्राणीके रूपमें जन्म ले चुका हूँ, वही मैं आपके गर्भसे उत्पन्न होनेके कारण दिव्य शरीरवाला हो जाऊँ।' इसके बाद सभी आभूषणोंसे विभूषित प्रसन्न शरीरवाले वे द्विजवर 'देवस्य त्वा०' इस मन्त्रका पाठ करते हुए चार कलशोंद्वारा स्वर्णमय आसनपर आसीन यजमानको स्नान करवायें और कहें कि 'आज उत्पन्न हुए तुम्हारे इन अङ्गोंका हम लोग अभिषेक कर रहे हैं। अब तुम इस दिव्य शरीरसे चिरकालतक जीवित रहो और आनन्दका उपभोग करो।' तदनन्तर विचक्षण यजमान उस हिरण्यगर्भको उन ब्राह्मणोंको दान कर दे और उन ब्राह्मणोंकी सब तरहसे पूजा करे। फिर उनकी आज्ञासे अन्यान्य ब्राह्मणोंकी भी पूजा करनी चाहिये। वहाँकी सभी सामग्रियोंको—पादुका, जूता, छाता, चमर, आसन, पात्र, ग्राम, देश अथवा अन्य जो कुछ भी सम्भव |