मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २७५ * | १०५३ |
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| यो दीयमानमपि पश्यति भक्तियुक्तः<br> कालान्तरे स्मरति वाचयतीह लोके।<br>यो वा शृणोति पठतीन्द्रसमानरूपः<br> प्राप्नोति धाम स पुरन्दरदेवजुष्टम्॥ ७८ | जो मनुष्य इस तुलापुरुषके दानको दिये जाते हुए देखता है, दूसरे अवसरपर उसका स्मरण करता है, लोकमें पढ़कर उसकी विधिको सुनाता है अथवा जो इसकी विधिको सुनता या पढ़ता है, वह भी इन्द्रके समान स्वरूप धारणकर पुरंदर प्रभृति देवगणोंद्वारा सेवित स्वर्गलोकको प्राप्त करता है॥ ६७-७८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने तुलापुरुषदानं नाम चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-अनुकीर्तन-प्रसङ्गमें तुलापुरुष-दान नामक दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७४॥
दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय
हिरण्यगर्भदानकी विधि
| मत्स्य उवाच | |
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| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>नाम्ना हिरण्यगर्भाख्यं महापातकनाशनम्॥ १ | मत्स्यभगवान्ने कहा— अब इसके बाद मैं हिरण्यगर्भ नामक सर्वश्रेष्ठ महादानकी विधि बतलाता हूँ, जो महापातकोंका विनाश करनेवाला है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह किसी पुण्य दिनके आनेपर तुलापुरुषदानकी भाँति इस दानमें भी ऋत्विज्, मण्डप, पूजनसामग्री, भूषण, वस्त्र आच्छादन आदिका संग्रह करे। फिर उपवासपूर्वक लोकपालोंका आवाहन, पुण्याहवाचन और अधिवासन करके ब्राह्मणोंद्वारा स्वर्णमय माङ्गलिक कलशको मण्डपमें मँगवाये। वह कलश सुवर्ण-कमलके गर्भकी भाँति सुन्दर और बहत्तर अंगुल ऊँचा हो। उसकी चौड़ाई ऊँचाईकी अपेक्षा तिहाईकी होनी चाहिये। वह घृत और दुग्धसे भरा हुआ हो। उसके समीप दस अस्त्र, रत्न, छूरिका, सूई, सुवर्णका नाल, सूर्यमूर्त्तिसहित पिटारी, नाभिको ढकनेके लिये वस्त्र, स्वर्णका यज्ञोपवीत, स्वर्णका दण्ड तथा कमण्डलु स्थापित करे। इसके ऊपरसे चारों ओर एक अंगुलसे अधिक मोटा कमलके आकारका ढक्कन होना चाहिये। मोतियोंकी लड़ियोंसे सुशोभित तथा पद्मरागमणिसे युक्त वह कलश वेदिकाके मध्यभागमें द्रोण-परिमित तिलके ऊपर स्थापित होना चाहिये॥ १-८॥ |
| पुण्यं दिनमथासाद्य तुलापुरुषदानवत्।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम्॥ २ | |
| कुर्यादुपोषितस्तद्वल्लोकेशावाहनं बुधः।<br>पुण्याहवाचनं कृत्वा तद्वत् कृत्वाधिवासनम्॥ ३ | |
| ब्राह्मणेरानयेत् कुम्भं तपनीयमयं शुभम्।<br>द्विसप्तत्यङ्गुलोच्छ्रायं हेमपङ्कजगर्भrawt/हेमपङ्कजगर्भवत्॥ ४ | |
| त्रिभागहीनविस्तारमाज्यक्षीराभिपूरितम् ।<br>दशास्त्राणि च रत्नानि दात्रीं सूचीं तथैव च॥ ५ | |
| हेमनालं सपिटकं बहिरादित्यसंयुतम्।<br>तथैवावरणं नाभेरुषवीतं च काञ्चनम्॥ ६ | |
| पार्श्वतः स्थापयेत् तद्वद्धेमदण्डकमण्डलू।<br>पद्माकारं पिधानं स्यात् समन्तादङ्गुलाधिकम्॥ ७ | |
| मुक्तावलीसमोपेतं पद्मरागसमन्वितम्।<br>तिलद्रोणोपरिगतं वेदिमध्ये व्यवस्थितम्॥ ८ | |
| ततो मङ्गलशब्देन ब्रह्मघोषरवेण च।<br>सर्वौषध्युदकस्नानं स्नापितो वेदपुङ्गवैः॥ ९ | तत्पश्चात् यजमान माङ्गलिक शब्द एवं वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा वेदध्वनिके साथ सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान |