भारतकोश
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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
* अध्याय २७५ *१०५३

| यो दीयमानमपि पश्यति भक्तियुक्तः<br>  कालान्तरे स्मरति वाचयतीह लोके।<br>यो वा शृणोति पठतीन्द्रसमानरूपः<br>  प्राप्नोति धाम स पुरन्दरदेवजुष्टम्॥ ७८ | जो मनुष्य इस तुलापुरुषके दानको दिये जाते हुए देखता है, दूसरे अवसरपर उसका स्मरण करता है, लोकमें पढ़कर उसकी विधिको सुनाता है अथवा जो इसकी विधिको सुनता या पढ़ता है, वह भी इन्द्रके समान स्वरूप धारणकर पुरंदर प्रभृति देवगणोंद्वारा सेवित स्वर्गलोकको प्राप्त करता है॥ ६७-७८॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने तुलापुरुषदानं नाम चतुःसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-अनुकीर्तन-प्रसङ्गमें तुलापुरुष-दान नामक दो सौ चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७४॥


दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय

हिरण्यगर्भदानकी विधि

मत्स्य उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>नाम्ना हिरण्यगर्भाख्यं महापातकनाशनम्॥ १मत्स्यभगवान्‌ने कहा— अब इसके बाद मैं हिरण्यगर्भ नामक सर्वश्रेष्ठ महादानकी विधि बतलाता हूँ, जो महापातकोंका विनाश करनेवाला है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह किसी पुण्य दिनके आनेपर तुलापुरुषदानकी भाँति इस दानमें भी ऋत्विज्, मण्डप, पूजनसामग्री, भूषण, वस्त्र आच्छादन आदिका संग्रह करे। फिर उपवासपूर्वक लोकपालोंका आवाहन, पुण्याहवाचन और अधिवासन करके ब्राह्मणोंद्वारा स्वर्णमय माङ्गलिक कलशको मण्डपमें मँगवाये। वह कलश सुवर्ण-कमलके गर्भकी भाँति सुन्दर और बहत्तर अंगुल ऊँचा हो। उसकी चौड़ाई ऊँचाईकी अपेक्षा तिहाईकी होनी चाहिये। वह घृत और दुग्धसे भरा हुआ हो। उसके समीप दस अस्त्र, रत्न, छूरिका, सूई, सुवर्णका नाल, सूर्यमूर्त्तिसहित पिटारी, नाभिको ढकनेके लिये वस्त्र, स्वर्णका यज्ञोपवीत, स्वर्णका दण्ड तथा कमण्डलु स्थापित करे। इसके ऊपरसे चारों ओर एक अंगुलसे अधिक मोटा कमलके आकारका ढक्कन होना चाहिये। मोतियोंकी लड़ियोंसे सुशोभित तथा पद्मरागमणिसे युक्त वह कलश वेदिकाके मध्यभागमें द्रोण-परिमित तिलके ऊपर स्थापित होना चाहिये॥ १-८॥
पुण्यं दिनमथासाद्य तुलापुरुषदानवत्।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम्॥ २
कुर्यादुपोषितस्तद्वल्लोकेशावाहनं बुधः।<br>पुण्याहवाचनं कृत्वा तद्वत् कृत्वाधिवासनम्॥ ३
ब्राह्मणेरानयेत् कुम्भं तपनीयमयं शुभम्।<br>द्विसप्तत्यङ्गुलोच्छ्रायं हेमपङ्कजगर्भrawt/हेमपङ्कजगर्भवत्॥ ४
त्रिभागहीनविस्तारमाज्यक्षीराभिपूरितम् ।<br>दशास्त्राणि च रत्नानि दात्रीं सूचीं तथैव च॥ ५
हेमनालं सपिटकं बहिरादित्यसंयुतम्।<br>तथैवावरणं नाभेरुषवीतं च काञ्चनम्॥ ६
पार्श्वतः स्थापयेत् तद्वद्धेमदण्डकमण्डलू।<br>पद्माकारं पिधानं स्यात् समन्तादङ्गुलाधिकम्॥ ७
मुक्तावलीसमोपेतं पद्मरागसमन्वितम्।<br>तिलद्रोणोपरिगतं वेदिमध्ये व्यवस्थितम्॥ ८
ततो मङ्गलशब्देन ब्रह्मघोषरवेण च।<br>सर्वौषध्युदकस्नानं स्नापितो वेदपुङ्गवैः॥ ९तत्पश्चात् यजमान माङ्गलिक शब्द एवं वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा वेदध्वनिके साथ सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान
१०५४* मत्स्यपुराण *

| शुक्लमाल्याम्बरधरः सर्वाभरणभूषितः।<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ १०<br>नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यकवचाय च।<br>सप्तलोकसुराध्यक्ष जगद्धात्रे नमो नमः॥ ११<br>भूर्लोकप्रमुखा लोकास्तव गर्भे व्यवस्थिताः।<br>ब्रह्मादयस्तथा देवा नमस्ते विश्वधारिणे॥ १२<br>नमस्ते भुवनाधार नमस्ते भुवनाश्रय।<br>नमो हिरण्यगर्भाय गर्भे यस्य पितामहः॥ १३<br>यतस्त्वमेव भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः।<br>तस्मान्मामुद्धराशेषदुःखसंसारसागरात् ॥ १४<br>एवमामन्त्र्य तन्मध्यमाविश्यास्त उदङ्मुखः।<br>मुष्टिभ्यां परिसंगृह्य धर्मराजचतुर्मुखौ ॥ १५<br>जानुमध्ये शिरः कृत्वा तिष्ठेदुच्छ्वासपञ्चकम्।<br>गर्भाधानं पुंसवनं सीमन्तोन्नयनं तथा॥ १६<br>कुर्युर्हिरण्यगर्भस्य ततस्ते द्विजपुङ्गवाः।<br>गीतमङ्गलघोषेण गुरुरुत्थापयेत् ततः॥ १७ | करे; फिर श्वेत वस्त्र और माला धारण कर सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत हो अञ्जलिमें पुष्प लेकर इस मन्त्रका उच्चारण करे—'सातों लोकों तथा देवताओंके स्वामी! आप हिरण्यगर्भ, हिरण्यकवच और जगत्‌के विधाता हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। भू-लोक आदि सभी लोक तथा ब्रह्मा आदि देवगण आपके गर्भमें स्थित हैं, अतः आप विश्वधारीको प्रणाम है। भुवनोंके आधार! आपको अभिवादन है। भुवनोंके आश्रय! आपको नमस्कार है। जिनके गर्भमें पितामह स्थित हैं, उन हिरण्यगर्भको प्रणाम है। देव! चूँकि आप ही भूतात्मा होकर प्रत्येक प्राणीमें स्थित हैं, इसलिये सम्पूर्ण दुःखोंसे परिपूर्ण इस संसार-सागरसे मेरा उद्धार कीजिये।' इस प्रकार आमन्त्रित कर मण्डपके मध्यभागमें प्रविष्ट हो उत्तराभिमुख बैठे; फिर अपनी मुट्ठियोंसे धर्मराज तथा चतुर्मुख ब्रह्माको पकड़कर अपने घुटनोंके बीचमें सिर कर पाँच बार श्वास लेता हुआ उसी प्रकार स्थित रहे, तबतक श्रेष्ठ ब्राह्मण उस हिरण्यगर्भका गर्भाधान, पुंसवन और सीमन्तोन्नयन संस्कार करायें। तब आचार्य गीत एवं माङ्गलिक शब्दोंके साथ यजमानको ऊपर उठाये॥ ९—१७॥ | | जातकर्मादिकाः कुर्युः क्रियाः षोडश चापराः।<br>सूच्यादिकं च गुरवे दद्यान्मन्त्रमिमं जपेत् ॥ १८<br>नमो हिरण्यगर्भाय विश्वगर्भाय वै नमः।<br>चराचरस्य जगतो गृहभूताय वै नमः॥ १९<br>यथाहं जनितः पूर्वं मर्त्यधर्मा सुरोत्तम।<br>त्वद्गर्भसम्भवादेष दिव्यदेहो भवाम्यहम्॥ २०<br>चतुर्भिः कलशैरभूयस्ततस्ते द्विजपुङ्गवाः।<br>स्नापयेयुः प्रसन्नाङ्गाः सर्वाभरणभूषिताः॥ २१<br>देवस्य त्वेति मन्त्रेण स्थितस्य कनकासने।<br>अद्य जातस्य तेऽङ्गानि अभिषेक्ष्यामहे वयम्॥ २२<br>दिव्येनानेन वपुषा चिरं जीव सुखी भव।<br>ततो हिरण्यगर्भं तं तेभ्यो दद्याद्विचक्षणः॥ २३<br>ते पूज्याः सर्वभावेन बहवो वा तदाज्ञया।<br>तत्रोपकरणं सर्वं गुरवे विनिवेदयेत्॥ २४<br>पादुकोपानहच्छत्रचामरासनभाजनम् ।<br>ग्रामं वा विषयं वापि यदन्यदपि सम्भवेत् ॥ २५ | तत्पश्चात् जातकर्म आदि अन्य सोलहों क्रियाओंको करना चाहिये। फिर यजमान उन सूची आदि सामग्रियोंको गुरुको दान कर दे और इस मन्त्रका पाठ करे—'हिरण्यगर्भको नमस्कार है। विश्वगर्भको प्रणाम है। आप चराचर जगत्‌के गृहभूत हैं, आपको अभिवादन है। सुरोत्तम! जिस प्रकार मैं पहले जन्म-मरण-युक्त प्राणीके रूपमें जन्म ले चुका हूँ, वही मैं आपके गर्भसे उत्पन्न होनेके कारण दिव्य शरीरवाला हो जाऊँ।' इसके बाद सभी आभूषणोंसे विभूषित प्रसन्न शरीरवाले वे द्विजवर 'देवस्य त्वा०' इस मन्त्रका पाठ करते हुए चार कलशोंद्वारा स्वर्णमय आसनपर आसीन यजमानको स्नान करवायें और कहें कि 'आज उत्पन्न हुए तुम्हारे इन अङ्गोंका हम लोग अभिषेक कर रहे हैं। अब तुम इस दिव्य शरीरसे चिरकालतक जीवित रहो और आनन्दका उपभोग करो।' तदनन्तर विचक्षण यजमान उस हिरण्यगर्भको उन ब्राह्मणोंको दान कर दे और उन ब्राह्मणोंकी सब तरहसे पूजा करे। फिर उनकी आज्ञासे अन्यान्य ब्राह्मणोंकी भी पूजा करनी चाहिये। वहाँकी सभी सामग्रियोंको—पादुका, जूता, छाता, चमर, आसन, पात्र, ग्राम, देश अथवा अन्य जो कुछ भी सम्भव |

* अध्याय २७६ *१०५५
अनेन विधिना यस्तु पुण्येऽहनि निवेदयेत् ।<br>हिरण्यगर्भदानं स ब्रह्मलोके महीयते ॥ २६<br>पुरेषु लोकपालानां प्रतिमन्वन्तरं वसेत् ।<br>कल्पकोटिशतं यावद् ब्रह्मलोके महीयते ॥ २७<br>कलिकलुषविमुक्तः पूजितः सिद्धसाध्यै-<br>रमरचमरमालावीज्यमानोऽप्सरोभिः ।<br>पितृशतमथ बन्धून् पुत्रपौत्रान् प्रपौत्रा-<br>नपि नरकनिमग्नांस्तारयेदेक एव ॥ २८<br>इति पठति य इत्थं यः शृणोतीह सम्यङ्-<br>मधुरिपुरिव लोके पूज्यते सोऽपि सिद्धैः ।<br>मतिमपि च जनानां यो ददाति प्रियार्थं<br>विबुधपतिजनानां नायकः स्यादमोघम् ॥ २९हो—गुरूको समर्पित कर देना चाहिये। जो मनुष्य इस प्रकारकी विधिसे पुण्यदिनको इस हिरण्यगर्भ नामक महादानको करता है, वह ब्रह्मलोकमें पूजित होता है, प्रत्येक मन्वन्तरमें लोकपालोंके पुरोंमें निवास करता है तथा सौ कोटि कल्पपर्यन्त ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। कलियुगके पापोंसे मुक्त हुआ वह अकेले ही सिद्धों और साध्योंद्वारा पूजित तथा अप्सराओं‌द्वारा देवताओंके योग्य चमरोंसे वीजित होकर नरकमें पड़े हुए सैकड़ों पितरों, बन्धुओं, पुत्रों, पौत्रों तथा प्रपौत्रोंतकको तार देता है। इस प्रकार मर्त्यलोकमें जो मनुष्य इसे पढ़ता है अथवा भलीभाँति सुनता है, वह भी विष्णुभगवान्‌की तरह सिद्धगणोंद्वारा पूजित होता है तथा जो हितैषिताकी दृष्टिसे लोगोंको दान करनेकी सूझ देता है, वह देवपतियोंका नायक होता है और उस पदसे कभी च्युत नहीं होता॥ १८—२९॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हिरण्यगर्भप्रदानविधिर्नाम पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानानुकीर्तनमें हिरण्यगर्भदान-विधि नामक दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७५॥


दो सौ छिहत्तरवाँ अध्याय

ब्रह्माण्डदानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्‌ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि ब्रह्माण्डविधिमुत्तमम् ।<br>यच्छ्रेष्ठं सर्वदानानां महापातकनाशनम् ॥ १<br>पुण्यं दिनमथासाद्य तुलापुरुषदानवत् ।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ २<br>लोकेशावाहनं कुर्यादधिवासनकं तथा ।<br>कुर्याद् विंशपलादूर्ध्वमासहस्त्राच्च शक्तितः ॥ ३<br>कलशद्वयसंयुक्तं ब्रह्माण्डं काञ्चनं बुधः ।<br>दिग्गजाष्टकसंयुक्तं षड्वेदाङ्गसमन्वितम् ॥ ४<br>लोकपालाष्टकोपेतं मध्यस्थितचतुर्मुखम् ।<br>शिवाच्युतार्कशिखरमुमालक्ष्मीसमन्वितम् ॥ ५अब मैं सर्वश्रेष्ठ ब्रह्माण्डदानकी विधि बतला रहा हूँ, जो सभी दानोंमें श्रेष्ठ और महापापोंका विनाश करनेवाला है। पुण्यदिनके आनेपर तुलापुरुष-दानके समान इसमें भी ऋत्विज्, मण्डप, पूजनकी सामग्री, भूषण तथा आच्छादन आदिको एकत्र करना चाहिये। इसी प्रकार लोकपालोंका आवाहन और अधिवासन भी करना चाहिये। इसके पहले बुद्धिमान् पुरुषको अपनी शक्तिके अनुसार बीस पलसे ऊपर एक हजार पलतक दो कलशोंसे संयुक्त सोनेके ब्रह्माण्डकी* रचना करवानी चाहिये। वह ब्रह्माण्ड आठों दिग्गजोंसे संयुक्त, छहों वेदाङ्गोंसे सम्पन्न तथा आठों लोकपालोंसे युक्त हो। उसके मध्यभागमें चतुर्मुख ब्रह्मा तथा शिखरपर शिव, विष्णु और सूर्य स्थित हों, वह उमा तथा लक्ष्मीसे

* ब्रह्माण्ड-निर्माण एवं दानकी ससंकल्प पूरी विधि दानसागर, दानमयूख-चन्द्रिका-कल्पतरु आदिमें है। अधिक जाननेकी इच्छा रखनेवाले सज्जनोंको इसे वहीं देखना चाहिये।

१०५६ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वस्वादित्यमरुद्गर्भं महारत्नसमन्वितम्।<br>वितस्तेरङ्गुलशतं यावदायामविस्तरम्॥ ६<br><br>कौशेयवस्त्रसंवीतं तिलद्रोणोपरि न्यसेत्।<br>तथाष्टादश धान्यानि समन्तात् परिकल्पयेत्॥ ७<br><br>पूर्वेणानन्तशयनं प्रद्युम्नं पूर्वदक्षिणे।<br>प्रकृतिं दक्षिणे देशे सङ्कर्षणमतः परम्॥ ८<br><br>पश्चिमे चतुरो वेदाननिरुद्धमतः परम्।<br>अग्निमुत्तरतो हैमं वासुदेवमतः परम्॥ ९<br><br>समन्ताद् गुडपीठस्थानर्चयेत् काञ्चनान् बुधः।<br>स्थापयेद् वस्त्रसंवीतान् पूर्णकुम्भान् दशैव तु॥ १०युक्त हो। उसके गर्भमें वसुगण, आदित्यगण और मरुद्गण होने चाहिये तथा वह बहुमूल्य रत्नोंसे सुशोभित भी हो। उसकी लम्बाई-चौड़ाई एक बीतेसे लेकर सौ अंगुलतक होनी चाहिये। उसे रेशमी वस्त्रसे परिवेष्टित कर एक द्रोण तिलपर स्थापित करना चाहिये। उसके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्नोंको रखना चाहिये। उसकी पूर्व दिशामें अनन्तशायीको, (दक्षिण-पूर्वके) अग्निकोणमें प्रद्युम्नको, दक्षिण दिशामें प्रकृतिको, (दक्षिण-पश्चिमके) नैर्ऋत्यकोणमें संकर्षणको, पश्चिम दिशामें चारों वेदोंको, (पश्चिम-उत्तर) वायव्यकोणमें अनिरुद्धको, उत्तर दिशामें अग्निको, (उत्तर-पूर्वके) ईशानकोणमें सुवर्ण-निर्मित वासुदेवको स्थापित करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष इन सभी देवताओंकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनवाकर चारों ओर गुडके आसनपर स्थितकर उनकी पूजा करे। फिर जलसे भरे हुए दस कुम्भोंको वस्त्रसे परिवेष्टित कर स्थापित करे॥ १—१०॥
दशैव धेनवो देयाः सहेमाम्बरदोहनाः।<br>पादुकोपानहच्छत्रचामरासनदर्पणैः ।<br>भक्ष्यभोज्यान्नदीपेक्षुफलमाल्यानुलेपनैः ॥ ११<br><br>होमाधिवासनान्ते च स्नापितो वेदपुङ्गवैः।<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं त्रिः कृत्वाथ प्रदक्षिणम्॥ १२तदनन्तर पादुका, जूता, छत्र, चमर, आसन, दर्पण, भक्ष्य-भोज्य, अन्न, दीप, ईख, फल, माला और चन्दनसहित सुवर्ण, वस्त्र और कांसदोहनीके साथ दस गौएँ दान करनी चाहिये। हवन एवं अधिवासनके समाप्त होनेपर वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा स्नान कराये जानेके बाद यजमान तीन बार प्रदक्षिणा कर इस मन्त्रका उच्चारण करे—
नमोऽस्तु विश्वेश्वर विश्वधाम<br>जगत्सवित्रे भगवन् नमस्ते।<br>सप्तर्षिलोकामरभूतलेश<br>गर्भेण सार्धं वितराभिरक्षाम् ॥ १३<br><br>ये दुःखितास्ते सुखिनो भवन्तु<br>प्रयान्तु पापानि चराचराणाम्।<br>त्वद्दानशस्त्राहतपातकानां<br>ब्रह्माण्डदोषाः प्रलयं व्रजन्तु॥ १४<br><br>एवं प्रणम्यामरविश्वगर्भं<br>दद्याद् द्विजेभ्यो दशधा विभज्य।<br>भागद्वयं तत्र गुरोः प्रकल्प्य<br>समं भजेच्छेषमनुक्रमेण॥ १५'विश्वेश्वर! आपको नमस्कार है। विश्वधाम! आप जगत्‌को उत्पन्न करनेवाले हैं, आपको प्रणाम है। भगवन्! आप सप्तर्षिलोक, देवता और भूतलेके स्वामी हैं, आप गर्भके साथ चारों ओरसे हमारी रक्षा कीजिये। जो दुःखी हैं, वे सुखी हो जायँ, चराचर जीवोंके पापपुञ्ज नष्ट हो जायँ, आपके दानरूप शस्त्रसे नष्ट हुए पापोंवाले लोगोंके ब्रह्माण्ड-दोष नष्ट हो जायँ।' इस प्रकार अमरगणों एवं विश्वको गर्भमें धारण करनेवाले उस ब्रह्माण्डको प्रणाम करनेके बाद उसे दस भागोंमें विभक्त कर ब्राह्मणोंको दान कर दे। उनमेंसे दो भाग गुरुको दे और शेष भागोंको क्रमशः समानरूपसे ब्राह्मणोंको दे।
* अध्याय २७७ *१०५७
स्वल्पे च होमं गुरुरेक एव<br>कुर्यादतैकाग्निविधानयुक्त्या ।<br>स एव सम्पूज्यतमोऽल्पवित्ते<br>यथोक्तवस्त्राभरणादिकेन ॥ १६<br>इत्थं य एतदखिलं पुरुषोऽत्र कुर्याद्<br>ब्रह्माण्डदानमधिगम्य महद्विमानम्।<br>निर्धूतकल्मषविशुद्धतनुर्मुरारे-<br>रानन्दकृत्पदमुपैति सहाप्सरोभिः॥ १७<br>संतारयेत् पितृपितामहपुत्रपौत्र-<br>बन्धुप्रियातिथिकलत्रशताष्टकं सः।<br>ब्रह्माण्डदानशकलीकृतपातकोघ-<br>मानन्दयेच्च जननीकुलमप्यशेषम्॥ १८<br>इति पठति शृणोति वा य एतत्<br>सुरभवनेषु गृहेषु धार्मिकाणाम्।<br>मतिमपि च ददाति मोदतेऽसाव-<br>मरपतेर्भवने सहाप्सरोभिः॥ १९॥स्वल्प हवनमें एक गुरुको ही एकाग्निकी विधिसे नियुक्त करना चाहिये और अल्प वित्त होनेपर यथोक्त वस्त्र-आभूषणादिसे उन्हींकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार जो मनुष्य इस लोकमें इस ब्रह्माण्डदानकी क्रियाको सम्पन्न करता है, वह पापोंके नष्ट हो जानेसे शुद्ध शरीर हो अप्सराओंके साथ महान् विमानपर आरूढ़ हो मुरारिके आनन्ददायक पदको प्राप्त करता है। इस प्रकार करनेसे वह अपने सैकड़ों पिता, पितामह, पुत्र, पौत्र, बन्धु, प्रियजन, अतिथि और स्त्रीको तार देता है। साथ ही जिसका पापसमूह ब्रह्माण्ड-दानसे चूर्ण हो गया है उस सम्पूर्ण मातृकुलको भी आनन्दित करता है। इसे जो मनुष्य देव-मन्दिरों अथवा धार्मिकोंके गृहोंमें पढ़ता अथवा सुनता या ऐसा करनेकी मति ही देता है, वह इन्द्रके भवनमें अप्सराओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है॥ १६–१९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने ब्रह्माण्डप्रदानविधिर्नाम षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णनप्रसङ्गमें ब्रह्माण्ड-दान-विधि नामक दो सौ छिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७६ ॥


दो सौ सतहत्तरवाँ अध्याय

कल्पपादप-दान-विधि

मत्स्य उवाच<br><br>कल्पपादपदानाख्यमतः परमनुत्तमम्।<br>महादानं प्रवक्ष्यामि सर्वपातकनाशनम्॥ १<br>पुण्यं दिनमथासाद्य तुलापुरुषदानवत्।<br>पुण्याहवाचनं कृत्वा लोकेशावाहनं तथा॥ २<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ।<br>काञ्चनं कारयेद् वृक्षं नानाफलसमन्वितम्॥ ३<br>नानाविहगवस्त्राणि भूषणानि च कारयेत्।<br>शक्तितस्त्रिपलादूर्ध्वमासहस्त्रं प्रकल्पयेत्॥ ४**मत्स्यभगवान्ने कहा—**इसके बाद मैं सभी पातकोंको नष्ट करनेवाले अत्युत्तम कल्पपादप-दान नामक महादानका वर्णन कर रहा हूँ। पुण्य दिन प्राप्त होनेपर तुलापुरुष-दानके समान ही पुण्याहवाचन तथा लोकपालोंका आवाहन कर ऋत्विज् मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण, आच्छादन आदि सम्पन्न कर कल्पवृक्ष-दानका समारम्भ करे। इसके लिये विविध प्रकारके फलोंसे सुशोभित एक सुवर्णमय कल्पवृक्ष बनवाये। उसपर विविध प्रकारके पक्षी, वस्त्र तथा आभूषण भी बनवाये। इस वृक्षको यथाशक्ति तीन पलसे लेकर एक हजार पलतकका बनवाना चाहिये।

१०५८ * मत्स्यपुराण *

मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अर्धक्लृप्तसुवर्णस्य कारयेत् कल्पपादपम्।<br>गुडप्रस्थोपरिष्टाच्च सितवस्त्रयुगान्वितम्॥ ५<br>ब्रह्मविष्णुशिवोपेतं पञ्चशाखं सभास्करम्।<br>कामदेवमधस्ताच्च सकलत्रं प्रकल्पयेत्॥ ६<br>संतानं पूर्वतस्तद्वत् तुरीयांशेन कल्पयेत्।<br>मन्दारं दक्षिणे पार्श्वे श्रिया सार्धं घृतोपरि॥ ७<br>पश्चिमे पारिजातं तु सावित्र्या सह जीरके।<br>सुरभीसंयुतं तद्वत् तिलेषु हरिचन्दनम्॥ ८<br>तुरीयांशेन कुर्वीत सौम्येन फलसंयुतम्।<br>कौशेयवस्त्रसंवीतानिक्षुमाल्यफलान्वितान् ॥ ९<br>तथाष्टौ पूर्णकलशान् पादुकाशनभाजनम्।<br>दीपिकोपानहच्छत्रचामरासनसंयुतम् ॥ १०<br>फलमाल्ययुतं तद्वदुपरिष्टाद्वितानकम्।<br>तथाष्टादश धान्यानि समंतात् परिकल्पयेत्॥ ११<br>होमाधिवासनान्ते च स्नापितो वेदपुङ्गवैः।<br>त्रिः प्रदक्षिणमावृत्य मन्त्रमेतमुदीरयेत्॥ १२इसमेंसे आधे सोनेका कल्पपादप बनवाना चाहिये और उसे एक प्रस्थ गुड़के ऊपर दो श्वेत वस्त्रोंसे संयुत कर स्थापित करना चाहिये। वह कल्पवृक्ष ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्यके चित्रोंसे संयुक्त पाँच शाखाओंवाला हो। उसके निचले भागमें स्त्रीसहित कामदेवके चित्रकी रचना करनी चाहिये। उसकी पूर्व दिशामें चतुर्थांशसे संतान नामक देववृक्षकी, दक्षिण दिशामें घृतके ऊपर श्रीदेवीके साथ मन्दार नामक देववृक्षकी, पश्चिम दिशामें जीराके ऊपर सावित्रीके साथ पारिजात वृक्षकी तथा उत्तर दिशामें तिलोंके ऊपर गौके साथ फलसंयुक्त हरिचन्दन वृक्षकी स्थापना करनी चाहिये। पुनः रेशमी वस्त्रसे वेष्टित, ईख, पुष्पमाला और फलोंसे संयुक्त आठ पूर्ण कलशोंको स्थापित करे, उनके निकट पादुका, भोजन-पात्र, दीप, जूता, छत्र, चामर, आसन, फल और पुष्प भी रखना चाहिये। उनके ऊपर वितान भी लगाया जाय। उनके चारों ओर अठारह प्रकारके धान्य रखे जायें। इस प्रकार हवन एवं अधिवासनकी समाप्ति होनेपर वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा स्नान कराये जानेपर यजमान तीन प्रदक्षिणा करके इस मन्त्रका उच्चारण करे॥ १—१२ ॥
नमस्ते कल्पवृक्षाय चिन्तितार्थप्रदायिने।<br>विश्वम्भराय देवाय नमस्ते विश्वमूर्तये॥ १३<br><br>यस्मात् त्वमेव विश्वात्मा ब्रह्मा स्थाणुर्दिवाकरः।<br>मूर्तामूर्तपरं बीजमतः पाहि सनातन॥ १४<br><br>त्वमेवामृतसर्वस्वमनन्तः पुरुषोऽव्ययः।<br>संतानाद्यैरुपेतस्तत् पाहि संसारसागरात्॥ १५'आप अभिलषित पदार्थको प्रदान करनेवाले कल्पवृक्ष हैं, आपको नमस्कार है। देव! आप विश्वका भरण-पोषण करनेवाले विश्वमूर्ति हैं, आपको प्रणाम है। सनातन! चूँकि आप विश्वात्मा, ब्रह्मा, शिव, दिवाकर, मूर्त-अमूर्त तथा इस चराचर विश्वके परम कारणरूप हैं, अतः मेरी रक्षा कीजिये। आप ही अमृतसर्वस्व, अनन्त, अव्यय, पुरुषोत्तम और संतान आदि दिव्य वृक्षोंसे युक्त हैं, अतः आप इस संसार-सागरसे मेरी रक्षा कीजिये।'
एवमामन्त्र्य तं दद्याद् गुरवे कल्पपादपम्।<br>चतुर्भ्यश्चाथ ऋत्विग्भ्यः संतानादीन् प्रकल्पयेत्॥ १६<br><br>स्वल्पे त्वेकाग्निवत् कुर्याद् गुरवे चाभिपूजनम्।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत न च विस्मयवान् भवेत्॥ १७इस प्रकार आमन्त्रित कर उस कल्पवृक्षको गुरुको समर्पित कर दे और संतान आदि वृक्षोंको चार ऋत्विजोंको दे दे। स्वल्प सामग्रियोंके होनेपर एकाग्निपूजनकी भाँति एक गुरुकी ही पूजा करनी चाहिये। इस दानमें न तो कृपणता करनी चाहिये और न विस्मय ही करना चाहिये।
अनेन विधिना यस्तु प्रदद्यात् कल्पपादपम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ १८<br><br>अप्सरोभिः परिवृतः सिद्धचारणकिन्नरैः।<br>भूतान् भव्यांश्च मनुजांस्तारयेद् गोत्रसंयुतान्॥ १९जो मनुष्य इस विधिसे कल्पपादपका दान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है। वह सिद्ध, चारण, किन्नर और अप्सराओंसे घिरा हुआ अपने सगोत्रीय भूत तथा भविष्यकालमें होनेवाले पुरुषोंको तार देता है।
* अध्याय २७८ *१०५९
स्तूयमानो दिवः पृष्ठे पुत्रपौत्रप्रपौत्रकैः।<br>विमानेनार्कवर्णेन विष्णुलोकं स गच्छति॥ २०<br>दिवि कल्पशतं तिष्ठेद् राजराजो भवेत् ततः।<br>नारायणबलोपेतो नारायणपरायणः।<br>नारायणकथासक्तो नारायणपुरं व्रजेत्॥ २१<br>यो वा पठेत् सकलकल्पतरुप्रदानं<br>यो वा शृणोति पुरुषोऽल्पधनः स्मरेद् वा।<br>सोऽपीन्द्रलोकमधिगम्य सहाप्सरोभि-<br>र्मन्वन्तरं वसति पापविमुक्तदेहः॥ २२वह स्वर्गलोकमें पुत्र, पौत्र और प्रपौत्रोंद्वारा स्तुति किया जाता हुआ सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर चढ़कर विष्णुलोकको जाता है और वहाँ सौ कल्पोंतक निवास करता है। तदनन्तर वह पुनः मृत्युलोकमें राजाधिराज होता है। यहाँ वह नारायणके पराक्रमसे संयुक्त हो नारायणकी भक्तिमें निरत और उन्हींकी कथाओंमें आसक्त रहता है, जिससे पुनः वैकुण्ठलोकको प्राप्त करता है। जो मनुष्य इस कल्पपादप-दानकी समग्र विधिको पढ़ता या सुनता है अथवा जो अल्पवित्तशाली पुरुष केवल स्मरण करता है, वह भी पापमुक्त होकर इन्द्रलोकमें जाकर अप्सराओंके साथ मन्वन्तरपर्यन्त निवास करता है॥ १३—२२॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने कल्पपादपप्रदानविधिर्नाम सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-अनुकीर्तन-प्रसङ्गमें कल्पपादप-प्रदान-विधि नामक दो सौ सतहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७७॥


दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय

गोसहस्र-दानकी विधि

मत्स्य उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>गोसहस्रप्रदानाख्यं सर्वपापहरं परम्॥ १<br>पुण्यां तिथिं समासाद्य युगमन्वन्तरादिकाम्।<br>पयोव्रतं त्रिरात्रं स्यादेकरात्रमथापि वा॥ २<br>लोकेशावाहनं कुर्यात् तुलापुरुषदानवत्।<br>पुण्याहवाचनं कुर्याद्धोमः कार्यस्तथैव च॥ ३<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम्।<br>वृक्षं लक्षणसंयुक्तं वेदिमध्येऽधिवासयेत्॥ ४<br>गोसहस्रं बहिः कुर्याद् वस्त्रमाल्यविभूषणम्।<br>सुवर्णशृङ्गाभरणं रौप्यपादसमन्वितम्॥ ५<br>अन्तः प्रवेश्य दशकं वस्त्रमाल्यैश्च पूजयेत्।<br>सुवर्णघण्टिकायुक्तं कांस्यदोहनकान्वितम्॥ ६<br>सुवर्णतिलकोपेतं हेमपट्टैरलङ्कृतम्।<br>कौशेयवस्त्रसंवीतं माल्यगन्धसमन्वितम्॥ ७**मत्स्यभगवान्ने कहा—**इसके बाद मैं सभी पापोंको दूर करनेवाले अत्युत्तम गोसहस्र-दान नामक महादानकी विधि बता रहा हूँ। किसी युगादि या मन्वादि पुण्य तिथिके आनेपर त्रिरात्र अथवा एकरात्र पयोव्रत करे। फिर तुलापुरुष-दानकी तरह लोकपालोंका आवाहन, पुण्याहवाचन तथा हवन करना चाहिये। पुनः उसी प्रकार ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण, आच्छादन आदिको भी एकत्र करे। तत्पश्चात् पूर्वनिर्दिष्ट लक्षणोंसे संयुक्त नन्दिकेश्वर (एक वृषभ)-को वेदीके मध्यभागमें स्थापित करे। वेदीके बाहर चारों ओर एक हजार गौओंको, जिनके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों तथा जो वस्त्र और पुष्पमालासे विभूषित हों, स्थापित करे। पुनः वेदीके भीतर ऐसी दस गौओंको प्रविष्ट करे, जिनके गलेमें सोनेकी घंटी पड़ी हो, जो कांसदोहनीसे युक्त, स्वर्णमय तिलकसे सुशोभित, स्वर्णपत्रोंसे अलंकृत, रेशमी वस्त्रसे आच्छादित, पुष्पमाला और चन्दनसे

१०६० * मत्स्यपुराण *


| हेमरत्नमयैः शृङ्गैश्चामरैरुपशोभितम्।<br>पादुकोपानहच्छत्रभाजनासनसंयुतम् ॥ ८<br>गवां दशकमध्ये स्यात् काञ्चनो नन्दिकेश्वरः।<br>कौशेयवस्त्रसंवीतो नानाभरणभूषितः ॥ ९<br>लवणद्रोणशिखरे माल्येक्षुफलसंयुतः।<br>कुर्यात् पलशतादूर्ध्वं सर्वमेतदशेषतः ॥ १०<br>शक्तितः पलसाहस्रत्रितयं यावदेव तु।<br>गोशतेऽपि दशांशेन सर्वमेतत् समाचरेत् ॥ ११ | युक्त, स्वर्ण एवं रत्नमय शिखरोंवाले चामरोंसे सुशोभित तथा पादुका, जूता, पात्र और आसनीसे संयुक्त हों। प्रति दस गौओंके बीच रेशमी वस्त्रसे परिवेष्टित, विविध अलंकारोंसे विभूषित तथा पुष्पमाला, ईख और फलोंसे संयुक्त सुवर्णमय साँड़को नन्दीके रूपमें एक द्रोण लवणके ऊपर स्थापित करना चाहिये। इन सब सामग्रियोंका निर्माण सौ पल सुवर्णसे ऊपर तीन हजार पलतक अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार करना चाहिये। सौ गौओंके दानमें भी इन सबका दशांशरूपसे व्यय करना चाहिये॥ १—११॥ | | पुण्यकालं समासाद्य गीतमङ्गलनिःस्वनैः।<br>सर्वौषध्युदकस्नानस्नापितो वेदपुङ्गवैः ॥ १२<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं गृहीतकुसुमाञ्जलिः।<br>नमोऽस्तु विश्वमूर्तिभ्यो विश्वमातृभ्य एव च ॥ १३<br>लोकाधिवासिनीभ्यश्च रोहिणीभ्यो नमो नमः।<br>गवामङ्गेषु तिष्ठन्ति भुवनान्येकविंशतिः ॥ १४<br>ब्रह्मादयस्तथा देवा रोहिण्यः पान्तु मातरः।<br>गावो मे अग्रतः सन्तु गावः पृष्ठत एव च ॥ १५<br>गावः शिरसि मे नित्यं गवां मध्ये वसाम्यहम्।<br>यस्मात् त्वं वृषरूपेण धर्म एव सनातनः ॥ १६<br>अष्टमूर्तेरधिष्ठानमतः पाहि सनातन।<br>इत्यामन्त्र्य ततो दद्याद् गुरवे नन्दिकेश्वरम् ॥ १७<br>सर्वोपकरणोपेतं गोयुतं च विचक्षणः।<br>ऋत्विग्भ्यो धेनुमेकैकां दशैकाद् विनिवेदयेत् ॥ १८<br>गवां च शतमेकैकं तदर्धं वाथ विंशतिम्।<br>दश पञ्चाथ वा दद्यादन्येभ्यस्तदनुज्ञया ॥ १९<br>नैका बहुभ्यो दातव्या यतो दोषकरी भवेत्।<br>बह्व्यश्चैकस्य दातव्या धीमताऽऽरोग्यवृद्धये ॥ २०<br>पयोव्रतः पुनस्तिष्ठेदेकाहं गोसहस्रदः।<br>श्रावयेच्छृणुयाद् वापि महादानानुकीर्तनम् ॥ २१ | तदनन्तर पुण्यकाल आनेपर गीत एवं माङ्गलिक शब्दोंके साथ वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान कराया हुआ यजमान अञ्जलिमें पुष्प लेकर इस मन्त्रका उच्चारण करे—‘विश्वमूर्तिस्वरूपा विश्वमाताओंको नमस्कार है। लोकोंको धारण करनेवाली रोहिणीरूपा गौओंको बारम्बार प्रणाम है। गौओंके अङ्गोंमें इक्कीस भुवन तथा ब्रह्मादि देवताओंका निवास है, वे रोहिणीस्वरूपा* माताएँ मेरी रक्षा करें। गौएँ मेरे अग्रभागमें रहें, गौएँ मेरे पृष्ठभागमें रहें, गौएँ नित्य मेरे सिरपर वर्तमान रहें और मैं गौओंके मध्यमें निवास करूँ। सनातन! चूँकि तुम्हीं वृषरूपसे सनातन धर्म और भगवान् शिवके वाहन हो, अतः मेरी रक्षा करो!’ इस प्रकार आमन्त्रित कर बुद्धिमान् यजमान सभी सामग्रियोंके साथ एक गौ और नन्दिकेश्वरको गुरुको दान कर दे तथा उन दसों गायोंमेंसे एक-एक तथा हजार गौओंमेंसे एक-एक सौ, पचास-पचास अथवा बीस-बीस गायें प्रत्येक ऋत्विज्को समर्पित कर दे। तत्पश्चात् उनकी आज्ञासे अन्य ब्राह्मणोंको दस-दस या पाँच-पाँच गौएँ देनी चाहिये। एक ही गाय बहुतोंको नहीं देनी चाहिये; क्योंकि वह दोष-प्रदायिनी हो जाती है। बुद्धिमान् यजमानको आरोग्यवृद्धिके लिये एक-एकको अनेक गौएँ देनी चाहिये। इस प्रकार एक हजार गोदान करनेवाला यजमान एक दिनके लिये पुनः पयोव्रत करे और इस महादानका अनुकीर्तन स्वयं सुनाये अथवा सुने॥ १२—२१॥ |


* वाजसने० ८। ४१ आदिमें बार-बार रोहिणीरूपा गौओंको कामधेनु एवं सुरभिरूपा कहा गया है। रोहिणी गौ प्रायः लाल वर्णकी होती है।

* अध्याय २७८ *१०६१

| तद्दिने ब्रह्मचारी स्याद् विदीच्छेद्द्विपुलां श्रियम्।<br>अनेन विधिना यस्तु गोसहस्रप्रदो भवेत्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सिद्धचारणसेवितः॥ २२<br>विमानेनार्कवर्णेन किङ्किणीजालमालिना ।<br>सर्वेषां लोकपालानां लोके सम्पूज्यतेऽमरैः॥ २३<br>प्रतिमन्वन्तरं तिष्ठेत् पुत्रपौत्रसमन्वितः।<br>सप्त लोकानतिक्रम्य ततः शिवपुरं व्रजेत्॥ २४<br>शतमेकोत्तरं तद्वत् पितॄणां तारयेद् बुधः।<br>मातामहानां तद्वच्च पुत्रपौत्रसमन्वितः।<br>यावत् कल्पशतं तिष्ठेद् राजराजो भवेत् पुनः॥ २५<br>अश्वमेधशतं कुर्याच्छिवध्यानपरायणः।<br>वैष्णवं योगमास्थाय ततो मुच्येत बन्धनात्॥ २६<br>पितरश्चाभिनन्दन्ति गोसहस्रप्रदं सुतम्।<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं पुत्रो दौहित्र एव वा।<br>गोसहस्रप्रदो भूत्वा नरकादुद्धरिष्यति॥ २७<br>तस्य कर्मकरो वा स्यादपि द्रष्टा तथैव च।<br>संसारसागरादस्माद् योऽस्मान् सन्तारयिष्यति॥ २८<br>इति पठति य एतद् गोसहस्रप्रदानं<br>सुरभुवनमुपेयात् संस्मरेद् वा च पश्येत्।<br>अनुभवति मुदं वा मुच्यमानो निकामं<br>प्रहतकलुषदेहः सोऽपि यातीन्द्रलोकम्॥ २९ | यदि उसे विपुल समृद्धिकी इच्छा हो तो उस दिन ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करना चाहिये। इस विधिसे जो मनुष्य एक हजार गौओंका दान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर सिद्धों एवं चारणोंद्वारा सेवित होता है। वह क्षुद्र घंटियोंसे सुशोभित सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर आरूढ़ होकर सभी लोकपालोंके लोकोंमें अमरोंद्वारा पूजित होता है एवं वहाँ प्रत्येक मन्वन्तरमें पुत्र-पौत्रसहित निवास करता है। पुनः सातों लोकोंका अतिक्रमण कर शिवपुरको चला जाता है। वह बुद्धिमान् दाता अपने पितृपक्ष तथा मातृपक्षके पितरोंके एक सौ एक पीढ़ियोंको तार देता है। वह वहाँ पुत्र-पौत्रसे युक्त होकर सौ कल्पोंतक निवास करता है तथा वहाँसे लौटनेपर भूतलपर राजाधिराज होता है। यहाँ वह शिवके ध्यानमें परायण हो सैकड़ों अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करता है। पुनः वैष्णवयोगको धारणकर बन्धनसे मुक्त हो जाता है। पितर भी हजार गोदान करनेवाले पुत्रका अभिनन्दन करते हैं। (वे अपने हृदयमें सर्वदा यह आकाङ्क्षा करते रहते हैं कि) क्या हमारे कुलमें कोई पुत्र अथवा दौहित्र (कन्याका पुत्र) ऐसा होगा जो हजार गौओंका दान कर हमलोगोंका नरकसे उद्धार करेगा अथवा इस महादानका कर्मचारी या इसका दर्शक होगा जिससे इस संसारसागरसे हमलोगोंको पार कर देगा।<br>इस प्रकार इस गोसहस्रदानको जो पढ़ता, स्मरण करता अथवा देखता है, वह देवलोकको प्राप्त होता है अथवा जो दान देते समय अत्यन्त हर्षका अनुभव करता है उसका शरीर पापसे मुक्त हो जाता है और वह इन्द्रलोकको चला जाता है॥ २२—२९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने गोसहस्रप्रदानविधिर्नामाष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णन-प्रसंगमें गौ-सहस्र प्रदान-विधि नामक दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७८॥

१०६२ * मत्स्यपुराण *


दो सौ उन्यासीवाँ अध्याय

कामधेनु-दानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि कामधेनुविधिं परम्।<br>सर्वकामप्रदं नृणां महापातकनाशनम्॥ १<br>लोकेशावाहनं तद्वद्धोमः कार्योऽधिवासनम्।<br>तुलापुरुषवत् कुर्यात् कुण्डमण्डपवेदिकम्॥ २<br>स्वल्पे त्वेकाग्निवत्कुर्याद् गुरुरेकः समाहितः।<br>काञ्चनस्यातिशुद्धस्य धेनुं वत्सं च कारयेत्॥ ३<br>उत्तमा पलसाहस्त्री तदर्धेन तु मध्यमा।<br>कनीयसी तदर्धेन कामधेनुः प्रकीर्तिता॥ ४<br>शक्तिस्तस्त्रिपलादूर्ध्वमशक्तोऽपीह कारयेत्।<br>वेद्यां कृष्णाजिनं न्यस्य गुडप्रस्थसमन्वितम्॥ ५<br>न्यसेदुपरि तां धेनुं महारत्नैरलङ्कृताम्।<br>कुम्भाष्टकसमोपेतां नानाफलसमन्विताम्॥ ६<br>तथाष्टादश धान्यानि समंतात् परिकल्पयेत्।<br>इक्षुदण्डाष्टकं तद्वन्नानाफलसमन्वितम्।<br>भाजनं चासनं तद्वत्ताम्रदोहनकं तथा॥ ७अब इसके बाद मैं मनुष्योंके महापातकोंको नाश करनेवाले तथा सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले कामधेनुके दानकी विधि बतला रहा हूँ। इसमें भी तुलापुरुष-दानकी तरह लोकपालोंका आवाहन, हवन और स्थापन-कार्य करना चाहिये तथा उसी प्रकार कुण्ड, मण्डप और वेदीकी रचना करनी चाहिये। स्वल्प वित्तवाला व्यक्ति एककुण्डीयज्ञाग्निकी विधिसे ऋत्विज्रूपमें समाहित चित्तवाले एकमात्र अपने गुरुका ही वरण करे। इसके लिये वह अत्यन्त शुद्ध सोनेकी कामधेनु और वत्स बनवाये। वह कामधेनु एक हजार पलकी उत्तम, पाँच सौ पलकी मध्यम और ढाई सौ पलकी कनिष्ठ कही गयी है। असमर्थ व्यक्तिको भी अपनी शक्तिके अनुसार तीन पलसे ऊपरकी ही कामधेनु बनवानी चाहिये। उसके बाद वेदीपर काले मृगचर्मको फैलाकर उसपर एक प्रस्थ गुड़ रखे। उसीके ऊपर बहुमूल्य रत्नोंसे अलंकृत उस धेनुको स्थापित करे। उस गौके साथ आठ कुम्भ तथा विविध प्रकारके फल हों। फिर वेदीके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्न, ईखके आठ टुकड़े, विविध प्रकारके पात्र, आसन तथा ताँबेकी दोहनीको रखना चाहिये॥ १—७॥
कौशेयवस्त्रद्वयसंयुतां गां<br>दीपातपत्राभरणाभिरामाम् ।<br>सचामरां कुण्डलिनीं सघण्टां<br>सुवर्णशृङ्गीं परिरूप्यपादाम्॥ ८<br>रसैश्च सर्वैः परितोऽभिजुष्टां<br>हरिद्रया पुष्पफलैरनेकैः।<br>अजाजिकुस्तुम्बुरुशर्करादिभि-<br>र्वितानकं चोपरि पञ्चवर्णम्॥ ९<br>स्नातस्ततो मङ्गलवेदघोषैः<br>प्रदक्षिणीकृत्य सपुष्पहस्तः।<br>आवाहयेत् तां गुरुणोक्तमन्त्रै-<br>र्द्विजाय दद्यादथ दर्भपाणिः॥ १०उसके बाद दो रेशमी वस्त्रोंसे आच्छादित, दीप, छत्र और आभरणोंसे सुशोभित, चामरयुक्त, कुण्डलधारिणी, घण्टीसे युक्त, सुवर्णजटित सींगों और चाँदीजटित पैरोंवाली गौके सम्पूर्ण शरीरको सभी प्रकारके रस, हल्दी, जीरा, धनिया और शक्करसे लेपन करके उसके निकट अनेकों प्रकारके पुष्प और फल रखे। उसके ऊपर पाँचरंगा चंदोवा ताने। तदनन्तर यजमान माङ्गलिक वेदध्वनिके साथ स्नान कर पुष्प और कुश हाथोंमें लेकर प्रदक्षिणा करके ब्राह्मणको दान दे, फिर गुरुद्वारा उच्चारित मन्त्रोंसे कामधेनुका आवाहन करे।

* अध्याय २८० * १०६३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वं सर्वदेवगणमन्दिरमङ्गभूता<br>विश्वेश्वरि त्रिपथगोदधिपर्वतानाम्।<br>त्वद्दानशस्त्रशकलीकृतपातकौघः<br>प्राप्तोऽस्मि निर्वृतिमतीव परां नमामि॥ ११<br><br>लोके यथेप्सितफलार्थविधायिनीं त्वां<br>आसाद्य को हि भवदुःखमुपैति मर्त्यः।<br>संसारदुःखशमनाय यतस्व कामं<br>त्वां कामधेनुमिति वेदविदो वदन्ति॥ १२<br><br>आमन्त्र्य शीलकुलरूपगुणान्विताय<br>विप्राय यः कनकधेनुमिमां प्रदद्यात्।<br>प्राप्नोति धाम स पुरन्दरदेवजुष्टं<br>कन्यागणैः परिवृतः पदमिन्दुमौलेः॥ १३तत्पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे—'विश्वेश्वरि! तुम सभी देवताओंकी आश्रयस्वरूपा तथा गङ्गा, समुद्र और पर्वतोंकी अङ्गभूता हो। मेरे पापसमूह तुम्हारे दानरूप शस्त्रसे टुकड़े-टुकड़े हो गये हैं, इस कारण मैं परम संतुष्ट हो गया हूँ, अतः तुम्हें नमस्कार करता हूँ। संसारमें यथाभिलषित फल प्रदान करनेवाली तुम्हें प्राप्तकर भला कौन मनुष्य सांसारिक दुःखोंमें पड़ सकेगा। तुम सांसारिक दुःखोंको शान्त करनेके लिये पूर्णरूपसे यत्नशील होओ। इसीलिये वेदवेत्तागण तुम्हें कामधेनु कहते हैं।' इस प्रकार आमन्त्रित कर जो व्यक्ति उत्तम कुल, शील, रूप और गुणसे युक्त ब्राह्मणको इस सुवर्णनिर्मित कामधेनुको दान करता है, वह कन्यासमूहोंसे घिरा हुआ इन्द्रदेवसे सेवित स्वर्ग तथा शंकरके लोकको प्राप्त करता है॥ ८—१३॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हिरण्यकामधेनुप्रदानविधिर्नामैकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानवर्णन-प्रसङ्गमें हिरण्यकामधेनु-दान-विधि नामक दो सौ उन्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७९॥


दो सौ असीवाँ अध्याय

हिरण्याश्व-दानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि हिरण्याश्वविधिं परम्।<br>यस्य प्रदानाद् भुवने चानन्तं फलमश्नुते॥ १<br><br>पुण्यां तिथिंमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>लोकेशावाहनं कुर्यात् तुलापुरुषदानवत्॥ २<br><br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम्।<br>स्वल्पे त्वेकाग्निवत्कुर्याद्धेमवाजिमखं बुधः॥ ३<br><br>स्थापयेद् वेदिमध्ये तु कृष्णाजिनतिलोपरि।<br>कौशेयवस्त्रसंवीतं कारयेद्धेमवाजिनम्॥ ४<br><br>शक्तितस्त्रिपलादूर्ध्वमासहस्रपलाद् बुधः।<br>पादुकोपानहच्छत्रचामरासनभाजनैः ॥ ५<br><br>पूर्णकुम्भाष्टकोपेतं माल्येक्षुफलसंयुतम्।<br>शय्यां सोपस्करां तद्वद्धेममार्तण्डसंयुताम्॥ ६अब मैं परम श्रेष्ठ सुवर्णमय अश्वके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिसके प्रदानसे मनुष्य भुवनमें अनन्त फलको प्राप्त करता है। किसी पुण्यतिथिके आनेपर तुलापुरुष-दानकी तरह पुण्याहवाचन कर लोकपालोंका आवाहन करे। फिर ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण, आच्छादन आदिका संग्रह करे। बुद्धिमान् यजमान यदि स्वल्पवित्तवाला हो तो उसे यह हिरण्याश्व-यज्ञ एकाग्नि-विधिकी तरह करना चाहिये। उसे अपनी शक्तिके अनुरूप तीन पलसे ऊपर एक हजार पलतकके सोनेका अश्व बनवाना चाहिये और उसे रेशमी वस्त्रसे आच्छादितकर वेदीके ऊपर फैलाये गये काले मृगचर्मपर रखी हुई तिल-राशिपर स्थापित करना चाहिये। उसके निकट पादुका, जूता, छाता, चमर, आसन और पात्र तथा जलसे भरे हुए आठ कलश, पुष्प-माला, ईख और फल भी रखनेका विधान है। उसी प्रकार वहाँ स्वर्णनिर्मित सूर्य-प्रतिमासे युक्त सभी सामग्रियोंके सहित शय्या भी स्थापित करे।

१०६४ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः सर्वौषधिस्नानस्नापितो वेदपुङ्गवैः।<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ ७<br>नमस्ते सर्वदेवेश वेदाहरणलम्पट।<br>वाजिरूपेण मामस्मात् पाहि संसारसागरात्॥ ८<br>त्वमेव सप्तधा भूत्वा छन्दोरूपेण भास्कर।<br>यस्माद् भासयसे लोकानतः पाहि सनातन॥ ९तदनन्तर वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान कराये जानेके बाद यजमान अञ्जलिमें पुष्प लेकर इस मन्त्रका उच्चारण करे—'सभी देवोंके स्वामी! आपको नमस्कार है। वेदोंके लानेके लिये इच्छुक देव! आप अश्वरूपसे इस संसार-सागरसे मेरी रक्षा कीजिये। भास्कर! चूँकि आप ही छन्दोरूपसे सात भागोंमें विभक्त होकर सभी लोकोंको उद्भासित करते हैं, अतः सनातन! मेरी रक्षा कीजिये'॥ ७—९॥
एवमुच्चार्य गुरवे तमश्वं विनिवेदयेत्।<br>दत्त्वा पापक्षयाद् भानोर्लोकमभ्येति शाश्वतम्॥ १०<br>गोभिर्विभवतः सर्वानृत्विजश्चापि पूजयेत्।<br>सर्वधान्योपकरणं गुरवे विनिवेदयेत्॥ ११<br>सर्वं शय्यादिकं दत्त्वा भुञ्जीतातैलमेव हि।<br>पुराणश्रवणं तद्वत् कारयेद् भोजनादनु॥ १२<br>इमं हिरण्याश्वविधिं करोति यः<br>पुण्यं समासाद्य दिनं नरेन्द्र।<br>विमुक्तपापः स पुरं मुरारेः<br>प्राप्नोति सिद्धैरभिपूजितः सन्॥ १३<br>इति पठति य एतद्धेमवाजिप्रदानं<br>सकलकलुषमुक्तः सोऽश्वमेधेन युक्तः।<br>कनकमयविमानेनार्कलोकं प्रयाति<br>त्रिदशपतिवधूभिः पूज्यते योऽभिपश्येत्॥ १४<br>यो वा शृणोति पुरुषोऽल्पधनः स्मरेद् वा<br>हेमाश्वदानमभिनन्दयतीह लोके।<br>सोऽपि प्रयाति हतकल्मषशुद्धदेहः<br>स्थानं पुरन्दरमहेश्वरदेवजुष्टम्॥ १५इस प्रकार कहकर उस अश्वको गुरुको दान कर दे। इस दानको देनेसे पापके नष्ट हो जानेके कारण वह मनुष्य भगवान् सूर्यके अक्षयलोकको प्राप्त करता है। पुनः अपनी आर्थिक शक्तिके अनुकूल गौओंद्वारा सभी ऋत्विजोंकी भी पूजा करे। तत्पश्चात् धान्यसहित समस्त सामग्रियोंको तथा सम्पूर्ण सामग्रीसहित शय्याको गुरुको निवेदित कर दे। तदुपरान्त वह तैलरहित अन्नका भोजन करे और भोजनके बाद पुराणोंका श्रवण करे। नरेन्द्र! जो मनुष्य पुण्यदिन आनेपर इस हिरण्याश्व-विधिको सम्पन्न करता है वह पापोंसे मुक्त हो सिद्धोंद्वारा पूजित होता हुआ मुरारिके पुर—वैकुण्ठको प्राप्त करता है। जो मनुष्य इस सुवर्णाश्वके दानकी विधिको पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर अश्वमेध-यज्ञके फलका भागी होता है और सुवर्णमय विमानद्वारा सूर्यके लोकको जाता है तथा जो इस दानको देखता है, वह देवाङ्गनाओंद्वारा पूजित होता है। जो अल्पवित्त पुरुष हिरण्याश्व-दानकी इस विधिको सुनता या स्मरण करता है अथवा लोकमें इसका अभिनन्दन करता है, वह भी पापोंके नष्ट हो जानेसे विशुद्ध शरीरवाला हो पुरन्दर एवं महेश्वरसेवित स्थानको जाता है॥ १०—१५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हिरण्याश्वप्रदानविधिर्नामाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानवर्णनप्रसङ्गमें हिरण्याश्व-प्रदान-विधि नामक दो सौ असीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८०॥

* अध्याय २८१ *१०६५

दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय

हिरण्याश्वरथ-दानकी विधि

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मत्स्य उवाच<br><br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>पुण्यमश्वरथं नाम महापातकनाशनम्॥ १<br><br>पुण्यं दिनमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>लोकेशावाहनं कुर्यात् तुलापुरुषदानवत्॥ २<br><br>ऋत्विङ् मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम्।<br>कृष्णाजिने तिलान् कृत्वा काञ्चनं स्थापयेद् रथम्॥ ३<br><br>सप्ताश्वं चतुरश्वं वा चतुश्चक्रं सकूबरम्।<br>ऐन्द्रनीलेन कुम्भेन ध्वजरूपेण संयुतम्॥ ४<br><br>लोकपालाष्टकोपेतं पद्मरागदलान्वितम्।<br>चतुरः पूर्णकलशान् धान्यान्यष्टादशैव तु॥ ५<br><br>कौशेयवस्त्रसंयुक्तमुपरिष्टाद् वितानकम्।<br>काल्येक्षुफलसंयुक्तं पुरुषेण समन्वितम्॥ ६<br><br>यो यद्भक्तः पुमान् कुर्यात् स तन्नाम्नाधिवासनम्।<br>छत्रचामरकौशेयवस्त्रोपानहपादुकम् ॥ ७<br><br>गोभिर्विभवतः सार्धं दद्याच्च शयनादिकम्।<br>अभावात् त्रिपलादूर्ध्वं शक्तितः कारयेद् बुधः॥ ८**मत्स्यभगवान्ने कहा—**अब इसके बाद मैं सर्वश्रेष्ठ पुण्यप्रद एवं महापातकोंके विनाशक अश्वरथ नामक महादानका वर्णन कर रहा हूँ। इस दानमें भी पुण्य पर्वदिन आनेपर तुलापुरुष-दानकी तरह यजमान पुण्याहवाचन कर लोकपालोंका आवाहन करे तथा ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिको इकट्ठा करे। फिर (कम धन हो तो एककुण्डी होम आदिका विधान कर) वेदीपर कृष्णमृग-चर्मको फैलाकर उसके ऊपर रखी हुई तिलोंकी राशिपर स्वर्णमय रथकी स्थापना करे। वह रथ सात या चार घोड़ोंसे युक्त हो। उसमें चार चक्के होने चाहिये और उसे जुआसे सम्पन्न तथा इन्द्रनील मणिके कलश और ध्वजासे सुशोभित करना चाहिये। उसपर पद्मरागमणिके दलसे युक्त आठों लोकपालोंकी मूर्ति रेशमी वस्त्रसे सुशोभित, जलसे भरे हुए चार कलश तथा अठारह धान्य हों और उसके ऊपर चाँदौवा तना हो। उसे पुष्प-माला, ईख और फलसे संयुक्त तथा पुरुषसे समन्वित होना चाहिये। जो पुरुष जिस देवताका भक्त हो, वह उसीके नामका उच्चारण कर अधिवासन करे। छत्र, चमर, रेशमी वस्त्र, जूते, पादुका तथा अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार गौओंके साथ शय्या आदिका दान करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको अर्थाभावमें तीन पल सोनेसे अधिक तौलका रथ बनवाना चाहिये॥ १–८॥
अश्वाष्टकेन संयुक्तं चतुर्भिरथ वाजिभिः।<br>द्वाभ्यामपि युतं दद्याद्धेमसिंहध्वजान्वितम्॥ ९<br><br>चक्ररक्षावुभौ तस्य तुरगस्थावथाश्विनौ।<br>पुण्यकालमथावाप्य पूर्ववत् स्नापितो द्विजैः॥ १०<br><br>त्रिः प्रदक्षिणमावृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः।<br>शुक्लमाल्याम्बरो दद्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ ११उसी प्रकार आठ, चार अथवा दो अश्वोंसे युक्त तथा स्वर्णमय सिंहध्वजसे समन्वित रथका दान करना चाहिये। घोड़ेपर सवार दोनों अश्विनीकुमारोंको उसके चक्ररक्षकके रूपमें स्थापित करना चाहिये। इस प्रकार पुण्यकाल आनेपर ब्राह्मणोंद्वारा पूर्ववत् स्नान कराया हुआ यजमान श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारणकर अञ्जलिमें पुष्प लिये हुए (उस रथकी) तीन बार प्रदक्षिणाकर दान करे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—

१०६६ * मत्स्यपुराण *


| नमो नमः पापविनाशनाय<br>विश्वात्मने वेदतुरङ्गमाय।<br>धाम्नामधीशाय दिवाकराय<br>पापौघदावानल देहि शान्तिम्॥ १२<br>वस्वष्टकादित्यमरुद्गणानां<br>त्वमेव धाता परमं निधानम्।<br>यतस्ततो मे हृदयं प्रयातु<br>धर्मैकतानत्वमघौघनाशात् ॥ १३<br>इति तुरगरथप्रदानमेतद्<br>भवभयसूदनमत्र यः करोति।<br>स कलुषपटलैर्विमुक्तदेहः<br>परममुपैति पदं पिनाकपाणेः॥ १४<br>देदीप्यमानवपुषा विजितप्रभाव-<br>माक्रम्य मण्डलमखण्डितचण्डभानोः।<br>सिद्धाङ्गनानयनषट्पदपीयमान-<br>वक्त्राम्बुजोऽम्बुजभवेन चिरं सहास्ते॥ १५<br>इति पठति शृणोति वा य इत्थं<br>कनकपुरगरथप्रदानमस्मिन् ।<br>न स नरकपुरं व्रजेत् कदाचि-<br>न्नरकरिपोर्भवनं प्रयाति भूयः॥ १६ | 'पापसमूहके लिये दावाग्निस্বরূপ देव! आप पापोंके विनाशक, विश्वात्मा, वेदरूपी घोड़ोंसे युक्त, तेजोंके अधीश्वर और सूर्यरूप हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। आप मुझे शान्ति प्रदान कीजिये। चूँकि आप ही आठों वसुओं, आदित्यगण और मरुद्गणोंके भरण-पोषण करनेवाले और परम निधान हैं, अतः आपकी कृपासे पापसमूहके नष्ट हो जानेसे मेरा हृदय धर्मकी एकतान्ताको प्राप्त हो। इस प्रकार जो मनुष्य इस लोकमें भव-भय-नाशक इस तुरगरथ-प्रदान नामक महादानको करता है उसका शरीर पापसमूहसे मुक्त हो जाता है और वह पिनाकपाणिके परम पदको प्राप्त करता है तथा सिद्धाङ्गनाओंके नेत्ररूपी भ्रमरोंद्वारा पान किये जाते हुए मुखकमलवाला वह अपने देदीप्यमान शरीरद्वारा पूर्णरूपसे तपनेवाले सूर्यके विजितप्रभाववाले मण्डलको पारकर ब्रह्माके साथ चिरकालतक निवास करता है। जो प्राणी इस लोकमें सुवर्णतुरगरथ नामक महादानकी विधिको पढ़ता अथवा सुनता है, वह कभी भी नरक-लोकमें नहीं जाता, अपितु नरकासुरके शत्रु भगवान् विष्णुके लोकको जाता है'॥ ९—१६॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हिरण्याश्वरथप्रदानविधिर्नामैकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णनप्रसङ्गमें हिरण्याश्वरथ-प्रदान-विधि नामक दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८१॥


दो सौ बयासीवाँ अध्याय

हेमहस्तिरथ-दानकी विधि

मत्स्य उवाच**मत्स्यभगवान्ने कहा—**अब इसके बाद मैं मङ्गलमय सुवर्णनिर्मित हस्तिरथ नामक महादानका वर्णन कर रहा हूँ, जिसे प्रदान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है। पूर्वकथित तुलापुरुष-दानकी तरह किसी पुण्य तिथिके आनेपर बुद्धिमान् यजमानको ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन कराकर लोकपालोंका आवाहन करना चाहिये; फिर उसी प्रकार ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिको इकट्ठा
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि हेमहस्तिरथं शुभम्।<br>यस्य प्रदानाद् भुवनं वैष्णवं याति मानवः॥ १<br><br>पुण्यां तिथिंमथासाद्य तुलापुरुषदानवत्।<br>विप्रावाचनकं कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ २
* अध्याय २८२ *१०६७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अत्राप्युपोषितस्तद्वद् ब्राह्मणैः सह भोजनम्।<br>कुर्यात् पुष्परथाकारं काञ्चनं मणिमण्डितम्॥ ३<br>वलभीभिर्विचित्राभिश्चतुश्चक्रसमन्वितम् ।<br>कृष्णाजिने तिलद्रोणं कृत्वा संस्थापयेद् रथम्॥ ४<br>लोकपालाष्टकोपेतं ब्रह्मार्कशिवसंयुतम्।<br>मध्ये नारायणोपेतं लक्ष्मीपुष्टिसमन्वितम्॥ ५<br>तथाष्टादश धान्यानि भाजनासनचन्दनैः।<br>दीपिकोपानहच्छत्रदर्पणं पादुकान्वितम्॥ ६<br>ध्वजे तु गरुडं कुर्यात् कूबराग्रे विनायकम्।<br>नानाफलसमायुक्तमुपरिष्टाद् वितानकम्॥ ७<br>कौशेयं पञ्चवर्णं तु अम्लानकुसुमान्वितम्।<br>चतुर्भिः कलशैः सार्धं गोभिरष्टाभिरन्वितम्॥ ८<br>चतुर्भिर्हेममातङ्गैर्मुक्तादामविभूषितैः ।<br>स्वरूपतः गजाभ्यां च युक्तं कृत्वा निवेदयेत्॥ ९करे। इस महादानमें भी यजमानको उपवास रखकर ब्राह्मणोंके साथ भोजन करनेका विधान है। उसे मणियोंसे सुशोभित पुष्परथके आकारका सुवर्णमय रथ, जो विचित्र तोरणों और चार पहियोंसे युक्त हो, बनवाना चाहिये। उस रथको कृष्णमृगचर्मके ऊपर रखे गये एक द्रोण तिलपर स्थापित करना चाहिये। वह रथ आठों लोकपाल, ब्रह्मा, सूर्य और शिवकी प्रतिमाओंसे युक्त हो। उसके मध्य-भागमें लक्ष्मीसहित विष्णुभगवान्‌की भी मूर्ति होनी चाहिये। उसे अठारह प्रकारके अन्न, पात्र, आसन, चन्दन, दीपक, जूता, छत्र, दर्पण और पादुकासे भी युक्त होना चाहिये। उसके ध्वजपर गरुड तथा जुआके अग्रभागपर विनायकको स्थापित करना चाहिये। वह नाना प्रकारके फलोंसे युक्त हो और उसके ऊपर चंदोवा तना हो। वह पँचरंगे रेशमी वस्त्र, विकसित पुष्पों, चार माङ्गलिक कलशोंके साथ आठ गौओं तथा मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित चार सुवर्णके हाथियोंसे सम्पन्न हो। पुनः दो जीवित हाथियोंको रथमें जोतकर दान करना चाहिये॥ १–९॥
कुर्यात् पञ्चपलादूर्ध्वमा भारादपि शक्तितः।<br>तथा मङ्गलशब्देन स्नापितो वेदपुङ्गवैः॥ १०<br>त्रिः प्रदक्षिणामावृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः।<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत्॥ ११अपनी शक्तिके अनुसार उस रथको पाँच पलसे ऊपर एक भार सोनेतकका बनवाना चाहिये। इस प्रकार वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा माङ्गलिक शब्दोंके उच्चारणके साथ स्नान कराया गया यजमान अञ्जलिमें फूल लेकर तीन बार प्रदक्षिणा करे तथा निम्नलिखित मन्त्रका उच्चारण कर ब्राह्मणोंको दान दे—
नमो नमः शङ्करपद्मजार्क-<br>लोकेशविद्याधरवासुदेवैः ।<br>त्वं सेव्यसे वेदपुराणयज्ञै-<br>स्तेजोमयस्यन्दन पाहि तस्मात्॥ १२'तेजोमय स्यन्दन! शङ्कर, ब्रह्मा, सूर्य, लोकपाल, विद्याधर, वासुदेव, वेद, पुराण और यज्ञ तुम्हारी सेवा करते हैं, अतः तुम मेरी रक्षा करो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है।
यत्तत्पदं परमगुह्यतमं मुरारे-<br>रानन्दहेतुगुणरूपविमुक्तमन्तः ।<br>योगैकमानसद्दशो मुनयः समाधौ<br>पश्यन्ति तत्त्वमसि नाथ रथाधिरूढ ॥ १३रथाधिरूढ स्वामिन्! विष्णुभगवान्‌का जो पद परमगुह्यतम, आनन्दका हेतु और गुण एवं रूपसे परे है तथा एकमात्र योगरूप मानसिक दृष्टिवाले मुनिगण जिसका समाधिकालमें दर्शन करते हैं वह आप ही हैं।
यस्मात् त्वमेव भवसागरसम्प्लुताण्ड-<br>मानन्दभारमृतमध्वरपानपात्रम् ।<br>तस्मादघौघशमनेन कुरु प्रसादं<br>चामीकरेभरथ माधव सम्प्रदानात्॥ १४माधव! चूँकि आप ही भवसागरमें डूबनेवालोंके लिये आनन्दके पात्र, सत्यस्वरूप तथा यज्ञोंमें पानपात्र हैं, इसलिये आप इस सुवर्णमय हस्तिरथके दानसे मेरे पापपुञ्जोंको नष्टकर मुझपर कृपा कीजिये।'
इत्थं प्रणम्य कनकेभरथप्रदानं<br>यः कारयेत् सकलपापविमुक्तदेहः।<br>विद्याधरामरमुनीन्द्रगणाभिजुष्टं<br>प्राप्नोत्यसौ पदमतीन्द्रियमिन्दुमौलेः॥ १५जो मनुष्य इस प्रकार प्रणाम करके स्वर्णमय हस्तिरथका दान करता है उसका शरीर समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और वह शङ्करजीके विद्याधर, देवगण एवं मुनीन्द्रगणोंद्वारा सेवित इन्द्रियातीत लोकको प्राप्त करता है। वह पूर्व

१०६८ * मत्स्यपुराण *


| कृतदुरितवितानप्रज्वलद्वह्निजाल-<br>  व्यतिकरकृतदाहोद्वेगभाजोऽपि बन्धून्।<br>नयति स पितृपुत्रान् बान्धवानप्यशेषान्<br>  कृतगजरथदानाच्छाश्वतं सद्म विष्णोः॥ १६॥ | जन्मके किये गये दुष्कर्म-रूप वितानसे आच्छादित प्रज्वलित अग्निकी ज्वालाओंके संयोगसे उत्पन्न हुए दाहके उद्वेगसे युक्त बन्धुओं, पितरों, पुत्रों तथा सम्पूर्ण बान्धवोंको इस हस्तिरथके दानसे विष्णुभगवान्के शाश्वत लोकमें ले जाता है॥ १०—१६॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हेमहस्तिरथप्रदानविधिर्नाम द्व्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णन-प्रसङ्गमें हेमहस्तिरथ-प्रदान-विधि नामक दो सौ बयासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८२॥


दो सौ तिरासीवाँ अध्याय

पञ्चलाङ्गल (हल) प्रदानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>पञ्चलाङ्गलकं नाम महापातकनाशनम्॥ १<br>पुण्यां तिथिंमथासाद्य युगादिग्रहणादिकाम्।<br>भूमिदानं नरो दद्यात् पञ्चलाङ्गलकान्वितम्॥ २<br>खर्वटं खेटकं वापि ग्रामं वा सस्यशालिनम्।<br>निवर्त्तनशतं वापि तदर्धं वापि शक्तितः॥ ३<br>सारदारुमयान् कृत्वा हलान् पञ्च विचक्षणः।<br>सर्वोपकरणैर्युक्तानन्यान् पञ्च च काञ्चनान्।<br>कुर्यात् पञ्चपलादूर्ध्वमासहस्रपलावधि॥ ४<br>वृषाँल्लक्षणसंयुक्तान् दश चैव धुरन्धरान्।<br>सुवर्णशृङ्गाभरणान् मुक्तालाङ्गलभूषणान्॥ ५<br>रूप्यपादाग्रतिलकान् रक्तकौशेयभूषणान्।<br>स्रग्दामचन्दनयुताञ्शालायामधिवासयेत्॥ ६<br>पर्जन्यादित्यरुद्रेभ्यः पायसं निर्वपेच्चरुम्।<br>एकस्मिन्नेव कुण्डे तु गुरुस्तेभ्यो निवेदयेत्॥ ७<br>पलाशसमिधस्तद्वदाज्यं कृष्णतिलास्तथा।<br>तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः॥ ८<br>ततो मङ्गलशब्देन शुक्लमाल्याम्बरो बुधः।<br>आहूय द्विजदाम्पत्यं हेमसूत्राङ्गुलीयकैः॥ ९अब इसके बाद मैं महापातकनाशी अतिश्रेष्ठ पञ्चलाङ्गल नामक महादानका वर्णन कर रहा हूँ। युगादि तिथियों तथा सूर्यग्रहण आदिके अवसरपर मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार पाँच हलोंसे युक्त, फसलसे सुशोभित ग्राम, खेट, खर्वट, एक सौ निवर्तन या उससे आधा पचास निवर्तन भूमिको दान करना चाहिये। विचक्षण पुरुष साखूकी लकड़ीके पाँच तथा सुवर्णके बने हुए अन्य पाँच हलोंको सभी सामग्रियोंसे युक्त करे। वे हल पाँच पल सोनेसे ऊपर एक हजार पलतकके बनवाने चाहिये। साथ ही दस वृषभोंको, जो उत्तम लक्षणोंसे युक्त तथा भार ढोनेमें समर्थ हों, जिनकी सींगें सुवर्णसे, पूँछ मोतीसे और खुर चाँदीसे विभूषित हों, जिनके सिरपर तिलक लगा हो, जो लाल रेशमी वस्त्रसे सुशोभित तथा पुष्पमाला और चन्दनसे युक्त हों, शालामें अधिवासित कराये। फिर पर्जन्य, आदित्य और रुद्रके लिये खीरकी चरु तैयार करे और गुरु उसे एक ही कुण्डमें उनके लिये निवेदित करे। उसी प्रकार पलाशकी समिधा, घृत तथा काले तिलका हवन करे। बुद्धिमान् यजमान तुलापुरुष-दानकी भाँति लोकपालोंका आवाहन करे। तदनन्तर शुक्ल वस्त्र एवं पुष्पमाला धारण कर बुद्धिमान् पुरुष माङ्गलिक शब्दोंके साथ द्विजदम्पतिको बुलाकर सोनेकी
* अध्याय २८३ *१०६९

| कौशेयवस्त्रकटकैर्मणिभिश्चाभिपूजयेत् ।<br>शय्यां सोपस्करां दद्याद् धेनुमेकां पयस्विनीम्॥ १०<br><br>तथाष्टादश धान्यानि समंतादधिवासयेत्।<br>ततः प्रदक्षिणीकृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ ११<br><br>इममुच्चारयेन्मन्त्रमथ सर्वं निवेदयेत्।<br>यस्माद् देवगणाः सर्वे स्थावराणि चराणि च॥ १२<br><br>धुरंधराङ्गे तिष्ठन्ति तस्माद् भक्तिः शिवेऽस्तु मे।<br>यस्माच्च भूमिदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १३<br><br>दानान्यन्यानि मे भक्तिर्धर्म एवं दृढा भवेत्।<br>दण्डेन सप्तहस्तेन त्रिंशद्दण्डं निवर्तनम्॥ १४<br><br>त्रिभागहीनं गोचर्ममानमाह प्रजापतिः।<br>मानेनानेन यो दद्यान्निवर्तनशतं बुधः।<br>विधिनानेन तस्याशु क्षीयते पापसंहतिः॥ १५<br><br>तदर्थमथवा दद्यादपि गोचर्ममात्रकम्।<br>भवनस्थानमात्रं वा सोऽपि पापैः प्रमुच्यते॥ १६<br><br>यावन्ति लाङ्गलकमार्गमुखानि भूमे-<br>र्भासां पतेर्दुहितुरङ्गजरोमकाणि।<br>तावन्ति शङ्करपुरे ससमा हि तिष्ठेद्<br>भूमिप्रदानमिह यः कुरुते मनुष्यः॥ १७<br><br>गन्धर्वकिन्नरसुरसुरसिद्धसङ्घै-<br>राधूतचामरमुपेत्य महद्विमानम्।<br>सम्पूज्यते पितृपितामहबन्धुयुक्तः<br>शम्भोः पदं व्रजति चामरनायकः सन्॥ १८<br><br>इन्द्रत्वमप्यधिगतं क्षयमभ्युपैति<br>गोभूमिलाङ्गलधुरन्धरसम्प्रदानात् ।<br>तस्मादघौघपटलक्षयकारि भूमे-<br>र्दानं विधेयमिति भूतिभवोद्भवाय॥ १९ | जंजीर, अंगूठी, रेशमी वस्त्र, सुवर्णके कङ्कण एवं मणियोंद्वारा उनकी पूजा करे तथा सामग्रियोंसहित शय्या और एक दूध देनेवाली गायका भी दान करे॥ १-१०॥<br><br>हलोंके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्नोंको रखना चाहिये। फिर अञ्जलिमें फूल लेकर प्रदक्षिणा करनेके पश्चात् सबका दान कर देना चाहिये। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—'चूँकि सभी देवगण तथा चराचर जीव भारवाही वृषभोके अङ्गोंमें निवास करते हैं, अतः मेरी शिवमें भक्ति हो। चूँकि अन्य सभी दान भूमिदानकी सोलहवीं कलाकी भी समता नहीं कर सकते, अतः धर्ममें मेरी सुदृढ़ भक्ति हो।' सात (मतान्तरसे दस) हाथोंके दण्डके मापसे तीस दण्ड मापका एक निवर्तन होता है और उसके तिहाई अंशसे न्यूनको गोचर्म* कहते हैं—ऐसा मान प्रजापतिने बतलाया है। जो बुद्धिमान् पुरुष इस मानके अनुसार एक सौ निवर्तन भूमिको इस विधिसे दान करता है, उसका पापपुञ्ज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जो उसका आधा भाग या गोचर्ममात्र अथवा एक भवन बनने योग्य भूमिका दान करता है, वह भी पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य इस मर्त्यलोकमें भूमि-दान करता है, वह उस भूमिमें हलके मुखके जितने मार्ग बनते हैं तथा सूर्यपुत्रीके अङ्गमें जितने रोएँ हैं, उतने वर्षोंतक शंकरपुरीमें निवास करता है तथा गन्धर्व, किन्नर, सुर, असुर और सिद्धोंके समूहोंद्वारा चँवर डुलाये जाते हुए महान् विमानपर सवार हो पिता, पितामह और बन्धुगणोंके साथ देवनायक होकर शम्भुलोकमें जाता है और वहाँ पूजित होता है। मनुष्य इस गौ, भूमि, हल और वृषभोका दान करनेसे नष्ट हुए इन्द्रत्वको भी प्राप्त कर लेता है, अतः ऐश्वर्य एवं समृद्धिके लिये पापपुञ्जके परदेको नष्ट करनेवाले भूमिदानको अवश्य करना चाहिये॥ ११-१९॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने पञ्चलाङ्गलप्रदानविधिर्नाम त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानानुकीर्तन-प्रसंगमें पञ्चलाङ्गलप्रदान-विधि नामक दो सौ तिरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८३॥


* दशहस्तेन दण्डेन त्रिंशद्दण्डानिवर्तनम्। दश तान्येव गोचर्म दत्त्वा स्वर्गे महीयते ॥

१०७० * मत्स्यपुराण *


दो सौ चौरासीवाँ अध्याय

हेमधरा (सुवर्णमयी पृथ्वी)-दानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि धरादानमनुत्तमम्।<br>पापक्षयकरं नृणाममङ्गल्यविनाशनम्॥ १<br>कारयेत् पृथिवीं हैमीं जम्बूद्वीपानुकारिणीम्।<br>मर्यादापर्वतवतीं मध्ये मेरुसमन्विताम्॥ २<br>लोकपालाष्टकोपेतां नववर्षसमन्विताम्।<br>नदीनदसमोपेतां सप्तसागरवेष्टिताम्॥ ३<br>महारत्नसमाकीर्णां वसुरुद्रार्कसंयुताम्।<br>हेम्नः पलसहस्रेण तदर्धेनाथ भक्तितः॥ ४<br>शतत्रयेण वा कुर्याद् द्विशतेन शतेन वा।<br>कुर्यात् पञ्चपलादूर्ध्वमशक्तोऽपि विचक्षणः॥ ५<br>तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ ६<br>वेद्यां कृष्णाजिनं कृत्वा तिलानामुपरि न्यसेत्।<br>तथाष्टादशधान्यानि रसांश्च लवणादिकान्॥ ७<br>तथाष्टौ पूर्णकलशान् समन्तात् परिकल्पयेत्।<br>वितानकं च कौशेयं फलानि विविधानि च॥ ८<br>तथांशुकानि रम्याणि श्रीखण्डशकलानि च।<br>इत्येवं कारयित्वा तामधिवासनपूर्वकम्॥ ९<br>शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लाभरणभूषितः।<br>प्रदक्षिणं ततः कृत्वा गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ १०<br>पुण्यं कालमथासाद्य मन्त्रानेतानुदीरयेत्।अब इसके बाद मैं मनुष्योंके अमङ्गल और पापको नष्ट करनेवाले सर्वश्रेष्ठ हेमधरादानका वर्णन कर रहा हूँ। दानी इस दानमें जम्बूद्वीपके आकारकी भाँति सुवर्णमयी पृथ्वीकी रचना करवाये, वह मध्यमें सुमेरुपर्वतसे युक्त, मर्यादापर्वतोंसे सम्पन्न तथा आठ लोकपालों, नौ वर्षों, नदियों और नदोंसे युक्त हो, सातों सागरोंसे घिरी हुई हो। उसे बहुमूल्य रत्नोंसे जटिल तथा वसु, रुद्र और आदित्योंसे युक्त कर दे। इस पृथ्वीको अपनी शक्तिके अनुसार एक हजार, पाँच सौ, तीन सौ, दो सौ या एक सौ पल सोनेका बनवाना चाहिये। विचक्षण पुरुष अपनी असमर्थतामें इसे पाँच पलसे अधिक स्वर्णसे भी बनवा सकता है। बुद्धिमान् पुरुष तुलापुरुष-दानकी भाँति लोकपालोंका आवाहन तथा ऋत्विज्, मण्डप, पूजनसामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिका संकलन करे। फिर वेदीपर कृष्णमृगचर्म फैलाकर उसके ऊपर रखी हुई तिलराशिपर पृथ्वीकी प्रतिमा स्थापित कर दे। तत्पश्चात् उसके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्नों, लवणादि रसों और जलसे भरे आठ माङ्गलिक कलशोंको स्थापित करना चाहिये। उसे रेशमी चाँदौवा, विविध प्रकारके फल, मनोहर रेशमी वस्त्र और चन्दनोंके टुकड़ोंसे अलंकृत करना चाहिये। इस प्रकार अधिवासनपूर्वक पृथ्वीका सारा कार्य सम्पन्नकर स्वयं श्वेत वस्त्र और पुष्पमाला धारणकर, श्वेत वर्णके आभूषणोंसे विभूषित हो अञ्जलिमें पुष्प लेकर प्रदक्षिणा करे तथा पुण्यकाल आनेपर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे॥ १—१० १/२ ॥
नमस्ते सर्वदेवानां त्वमेव भवनं यतः॥ ११<br>धात्री च सर्वभूतानामतः पाहि वसुंधरे।<br>वसु धारयसे यस्माद् वसु चातीव निर्मलम्॥ १२<br>वसुंधरा ततो जाता तस्मात् पाहि भयादलम्।<br>चतुर्मुखोऽपि नो गच्छेद यस्मादन्तं तवाचले॥ १३'वसुंधरे! चूँकि तुम्हीं सभी देवताओं तथा सम्पूर्ण जीवनिकायकी भवनभूता तथा धात्री हो, अतः मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है। चूँकि तुम सभी प्रकारके भवनों, उनमें वास करनेवाले प्राणियों तथा अत्यन्त निर्मल रत्नोंको भी धारण करती हो, इसीसे तुम्हारा वसुंधरा नाम है, तुम संसार-भयसे मेरी रक्षा करो। अचले! चूँकि ब्रह्मा भी तुम्हारे अन्तको नहीं प्राप्त कर सकते,
* अध्याय २८५ *१०७१
अनन्तायै नमस्तस्मात् पाहि संसारकर्दमात्।<br>त्वमेव लक्ष्मी गोविन्दे शिवे गौरीति चास्थिता॥ १४इसलिये तुम अनन्ता हो, तुम्हें प्रणाम है। तुम इस संसाररूप कीचड़से मेरी रक्षा करो। तुम्हीं विष्णुमें लक्ष्मी, शिवमें गौरी, ब्रह्माके समीप गायत्री, चन्द्रमामें ज्योत्स्ना, रविमें प्रभा, बृहस्पतिमें बुद्धि और मुनियोंमें मेधा नामसे ख्यात हो। चूँकि तुम समस्त विश्वमें व्याप्त हो, इसलिये विश्वम्भरा कही जाती हो। धृति, स्थिति, क्षमा, क्षोणी, पृथ्वी, वसुमती तथा रसा—ये तुम्हारी मूर्तियाँ हैं। देवि! तुम अपनी इन मूर्तियोंद्वारा इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करो।' इस प्रकार उच्चारणकर पृथ्वीकी मूर्तिको ब्राह्मणोंको निवेदित कर दे। उस पृथ्वीका आधा अथवा चौथाई भाग गुरुको समर्पित करे। शेष भाग ऋत्विजोंको देकर उन्हें नमस्कार कर विसर्जन करे। जो मनुष्य पुण्यकाल आनेपर सुवर्णनिर्मित कल्याणमयी पृथ्वीका इस विधिके साथ दान करता है, वह वैष्णव पदको प्राप्त होता है तथा क्षुद्रघंटिकाओं (घुँघरू)-से सुशोभित एवं सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा वैकुण्ठमें जाकर तीन कल्पपर्यन्त निवास करता है और इक्कीस पीढ़ियोंके पितरों, पुत्रों तथा पौत्रोंका उद्धार कर देता है। इस प्रकार जो मनुष्य इस विधिको प्रसङ्गवश भी पढ़ता अथवा श्रवण करता है, उसका शरीर सर्वथा पापसमूहोंसे मुक्त हो जाता है और वह स्वर्गलोकमें देवाङ्गनाओंद्वारा प्रार्थित होता हुआ सहस्रों देवताओंद्वारा सेवित शंकरजीके लोकको प्राप्त होता है॥ ११—२१॥
गायत्री ब्रह्मणः पार्श्वे ज्योत्स्ना चन्द्रे रवौ प्रभा।<br>बुद्धिर्बृहस्पतौ ख्याता मेधा मुनिषु संस्थिता॥ १५
विश्वं व्याप्य स्थिता यस्मात्ततो विश्वम्भरा स्मृता।<br>धृतिः स्थितिः क्षमा क्षोणी पृथ्वी वसुमती रसा॥ १६
एताभिर्मूर्तिभिः पाहि देवि संसारसागरात्।<br>एवमुच्चार्य तां देवीं ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत्॥ १७
धरार्धं वा चतुर्थांशं गुरवे प्रतिपादयेत्।<br>शेषं चैवाथ ऋत्विग्भ्यः प्रणिपत्य विसर्जयेत्॥ १८
अनेन विधिना यस्तु दद्याद्धेमधरां शुभाम्।<br>पुण्यकाले तु सम्प्राप्ते स पदं याति वैष्णवम्॥ १९
विमानेनार्कवर्णेन किङ्किणीजालमालिना।<br>नारायणपुरं गत्वा कल्पत्रयमथावसेत्।<br>पितॄन् पुत्रांश्च पौत्रांश्च तारयेदेकविंशतिम्॥ २०
इति पठति य इत्थं यः शृणोति प्रसङ्गा-<br>दपि कलुषवितानैर्मुक्तदेहः समन्तात्।<br>दिवममरवधूभिर्याति सम्प्रार्थ्यमानो<br>पदममरसहस्रैः सेवितं चन्द्रमौलेः॥ २१

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हेमपृथिवीदानमाहात्म्यं नाम चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-प्रसङ्गमें हेम-पृथ्विदान-माहात्म्य नामक दो सौ चौरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८४॥


दो सौ पचासीवाँ अध्याय

विश्वचक्रदानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्‌ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>विश्वचक्रमिति ख्यातं महापातकनाशनम्॥ १<br>तपनीयस्य शुद्धस्य विश्वचक्रं तु कारयेत्।<br>श्रेष्ठं पलसहस्रेण तदर्धेन तु मध्यमम्॥ २अब इसके बाद मैं महापातकनाशी एवं अत्यन्त श्रेष्ठ विश्वचक्र नामक महादानकी विधि बतला रहा हूँ। यह विश्वचक्र तपाये हुए शुद्ध स्वर्णका बनवाना चाहिये। यह विश्वचक्र एक सहस्र पल सुवर्णका उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और
१०७२* मत्स्यपुराण *

| तस्यार्धेन कनिष्ठं स्याद् विश्वचक्रमुदाहृतम्।<br>अन्यद् विंशात् पलादूर्ध्वमशक्तोऽपि निवेदयेत्॥ ३<br>षोडशारं ततश्चक्रं भ्रमन्नेम्यष्टकावृतम्।<br>नाभिपद्मे स्थितं विष्णुं योगारूढं चतुर्भुजम्॥ ४<br>शङ्खचक्रेऽस्य पार्श्वे तु देव्यष्टकसमावृतम्।<br>द्वितीयावरणे तद्वत् पूर्वतो जलशायिनम्॥ ५<br>अत्रिर्भृगुर्वसिष्ठश्च ब्रह्मा कश्यप एव च।<br>मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः॥ ६<br>रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्कीति वै क्रमात्।<br>तृतीयावरणे गौरी मातृभिर्वसुभिर्युता॥ ७<br>चतुर्थे द्वादशादित्या वेदाश्चत्वार एव च।<br>पञ्चमे पञ्च भूतानि रुद्राश्चैकादशैव तु॥ ८<br>लोकपालाष्टकं षष्ठे दिङ्मातङ्गास्तथैव च।<br>सप्तमेऽस्त्राणि सर्वाणि मङ्गलानि च कारयेत्॥ ९<br>अन्तरान्तरतो देवान् विन्यसेदष्टमे पुनः।<br>तुलापुरुषवच्छेषं समन्तात् परिकल्पयेत्॥ १०<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ।<br>विश्वचक्रं ततः कुर्यात् कृष्णाजिनतिलोपरि॥ ११ | ढाई सौ पलका कनिष्ठ कहा गया है। अल्प वित्तवाला मनुष्य अन्य प्रकारसे बीस पलसे ऊपरका बना हुआ विश्वचक्र दान कर सकता है। यह चक्र सोलह अरों तथा आठ नेमियोंसे युक्त घूमता हुआ होना चाहिये। उसके नाभि-कमलपर योगारूढ चतुर्भुज विष्णुको स्थापित करना चाहिये। उनके बगलमें शङ्ख और चक्र हों तथा आठ देवियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरे हुए हों। उसके दूसरे आवरणमें उसी प्रकार जलशायी, अत्रि, भृगु, वसिष्ठ, ब्रह्मा, कश्यप, मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, रामचन्द्र, परशुराम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि को, तीसरे आवरणमें मातृकाओं तथा वसुओंसहित गौरीको, चतुर्थ आवरणमें बारहों आदित्यों तथा चारों वेदोंको, पाँचवें आवरणमें पाँचों महाभूतों तथा ग्यारहों रुद्रको, छठे आवरणमें आठों लोकपालों तथा दिग्गजोंको, सप्तम आवरणमें सभी प्रकारके माङ्गलिक अस्त्रोंको तथा अष्टम आवरणमें थोड़े-थोड़े अन्तरपर देवताओंको स्थापित करे। शेष कार्य तुला-पुरुष-दानकी तरह करना चाहिये। उसी तरह ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण और आच्छादन आदिको भी रखना चाहिये। फिर उक्त विश्वचक्रको कृष्णमृगचर्मपर रखे गये तिलके ऊपर स्थापित करना चाहिये॥ १—११॥ | | तथाष्टादश धान्यानि रसांश्च लवणादिकान्।<br>पूर्णकुम्भाष्टकं चैव वस्त्राणि विविधानि च॥ १२<br>माल्येक्षुफलरत्नानि वितानं चापि कारयेत्।<br>ततो मङ्गलशब्देन स्नातः शुक्लाम्बरो गृही।<br>होमाधिवासनान्ते वै गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ १३<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं त्रिः कृत्वा तु प्रदक्षिणम्।<br>नमो विश्वमयायेति विश्वचक्रात्मने नमः॥ १४<br>परमानन्दरूपी त्वं पाहि नः पापकर्दमात्।<br>तेजोमयमिदं यस्मात् सदा पश्यन्ति योगिनः॥ १५<br>हृदि तत्त्वं गुणातीतं विश्वचक्रं नमाम्यहम्।<br>वासुदेवे स्थितं चक्रं चक्रमध्ये तु माधवः॥ १६<br>अन्योन्याधाररूपेण प्रणमामि स्थिताविह।<br>विश्वचक्रमिदं यस्मात् सर्वपापहरं परम्॥ १७ | फिर अठारह प्रकारके अन्न, लवण आदि सभी रस, जलसे भरे हुए आठ माङ्गलिक कलश, विविध प्रकारके वस्त्र, पुष्पमाला, ईख, फल, रत्न, वितान—इन सबको भी यथास्थान रखना चाहिये। तदनन्तर माङ्गलिक शब्दोंके साथ गृहस्थ यजमान स्नान करके श्वेत वस्त्र धारणकर हवन एवं अधिवासनके उपरान्त अञ्जलिमें पुष्प ग्रहणकर तीन बार प्रदक्षिणा करे और इस मन्त्रका उच्चारण करे—'विश्वमयको नमस्कार है। विश्वचक्रात्माको प्रणाम है। तुम परमानन्दस्वरूप हो, अतः पापरूप कीचड़से हमारी रक्षा करो। चूँकि इस तत्त्वस्वरूप, गुणातीत, तेजोमय विश्वचक्रको योगीलोग सदा अपने हृदयमें देखते हैं, अतः मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। यह विश्वचक्र वासुदेवमें स्थित है और माधव इस चक्रके मध्य भागमें स्थित हैं, इस प्रकार तुम दोनों अन्योन्याधाररूपसे स्थित हो, तुम्हें मैं प्रणाम करता हूँ। चूँकि यह विश्वचक्र सम्पूर्ण पातकोंका विनाश करनेवाला, |