मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २८५ * | १०७१ |
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| अनन्तायै नमस्तस्मात् पाहि संसारकर्दमात्।<br>त्वमेव लक्ष्मी गोविन्दे शिवे गौरीति चास्थिता॥ १४ | इसलिये तुम अनन्ता हो, तुम्हें प्रणाम है। तुम इस संसाररूप कीचड़से मेरी रक्षा करो। तुम्हीं विष्णुमें लक्ष्मी, शिवमें गौरी, ब्रह्माके समीप गायत्री, चन्द्रमामें ज्योत्स्ना, रविमें प्रभा, बृहस्पतिमें बुद्धि और मुनियोंमें मेधा नामसे ख्यात हो। चूँकि तुम समस्त विश्वमें व्याप्त हो, इसलिये विश्वम्भरा कही जाती हो। धृति, स्थिति, क्षमा, क्षोणी, पृथ्वी, वसुमती तथा रसा—ये तुम्हारी मूर्तियाँ हैं। देवि! तुम अपनी इन मूर्तियोंद्वारा इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करो।' इस प्रकार उच्चारणकर पृथ्वीकी मूर्तिको ब्राह्मणोंको निवेदित कर दे। उस पृथ्वीका आधा अथवा चौथाई भाग गुरुको समर्पित करे। शेष भाग ऋत्विजोंको देकर उन्हें नमस्कार कर विसर्जन करे। जो मनुष्य पुण्यकाल आनेपर सुवर्णनिर्मित कल्याणमयी पृथ्वीका इस विधिके साथ दान करता है, वह वैष्णव पदको प्राप्त होता है तथा क्षुद्रघंटिकाओं (घुँघरू)-से सुशोभित एवं सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा वैकुण्ठमें जाकर तीन कल्पपर्यन्त निवास करता है और इक्कीस पीढ़ियोंके पितरों, पुत्रों तथा पौत्रोंका उद्धार कर देता है। इस प्रकार जो मनुष्य इस विधिको प्रसङ्गवश भी पढ़ता अथवा श्रवण करता है, उसका शरीर सर्वथा पापसमूहोंसे मुक्त हो जाता है और वह स्वर्गलोकमें देवाङ्गनाओंद्वारा प्रार्थित होता हुआ सहस्रों देवताओंद्वारा सेवित शंकरजीके लोकको प्राप्त होता है॥ ११—२१॥ |
| गायत्री ब्रह्मणः पार्श्वे ज्योत्स्ना चन्द्रे रवौ प्रभा।<br>बुद्धिर्बृहस्पतौ ख्याता मेधा मुनिषु संस्थिता॥ १५ | |
| विश्वं व्याप्य स्थिता यस्मात्ततो विश्वम्भरा स्मृता।<br>धृतिः स्थितिः क्षमा क्षोणी पृथ्वी वसुमती रसा॥ १६ | |
| एताभिर्मूर्तिभिः पाहि देवि संसारसागरात्।<br>एवमुच्चार्य तां देवीं ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत्॥ १७ | |
| धरार्धं वा चतुर्थांशं गुरवे प्रतिपादयेत्।<br>शेषं चैवाथ ऋत्विग्भ्यः प्रणिपत्य विसर्जयेत्॥ १८ | |
| अनेन विधिना यस्तु दद्याद्धेमधरां शुभाम्।<br>पुण्यकाले तु सम्प्राप्ते स पदं याति वैष्णवम्॥ १९ | |
| विमानेनार्कवर्णेन किङ्किणीजालमालिना।<br>नारायणपुरं गत्वा कल्पत्रयमथावसेत्।<br>पितॄन् पुत्रांश्च पौत्रांश्च तारयेदेकविंशतिम्॥ २० | |
| इति पठति य इत्थं यः शृणोति प्रसङ्गा-<br>दपि कलुषवितानैर्मुक्तदेहः समन्तात्।<br>दिवममरवधूभिर्याति सम्प्रार्थ्यमानो<br>पदममरसहस्रैः सेवितं चन्द्रमौलेः॥ २१ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हेमपृथिवीदानमाहात्म्यं नाम चतुरशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-प्रसङ्गमें हेम-पृथ्विदान-माहात्म्य नामक दो सौ चौरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८४॥
दो सौ पचासीवाँ अध्याय
विश्वचक्रदानकी विधि
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
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| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>विश्वचक्रमिति ख्यातं महापातकनाशनम्॥ १<br>तपनीयस्य शुद्धस्य विश्वचक्रं तु कारयेत्।<br>श्रेष्ठं पलसहस्रेण तदर्धेन तु मध्यमम्॥ २ | अब इसके बाद मैं महापातकनाशी एवं अत्यन्त श्रेष्ठ विश्वचक्र नामक महादानकी विधि बतला रहा हूँ। यह विश्वचक्र तपाये हुए शुद्ध स्वर्णका बनवाना चाहिये। यह विश्वचक्र एक सहस्र पल सुवर्णका उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और |