भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 1080, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 1080

१०७० * मत्स्यपुराण *


दो सौ चौरासीवाँ अध्याय

हेमधरा (सुवर्णमयी पृथ्वी)-दानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि धरादानमनुत्तमम्।<br>पापक्षयकरं नृणाममङ्गल्यविनाशनम्॥ १<br>कारयेत् पृथिवीं हैमीं जम्बूद्वीपानुकारिणीम्।<br>मर्यादापर्वतवतीं मध्ये मेरुसमन्विताम्॥ २<br>लोकपालाष्टकोपेतां नववर्षसमन्विताम्।<br>नदीनदसमोपेतां सप्तसागरवेष्टिताम्॥ ३<br>महारत्नसमाकीर्णां वसुरुद्रार्कसंयुताम्।<br>हेम्नः पलसहस्रेण तदर्धेनाथ भक्तितः॥ ४<br>शतत्रयेण वा कुर्याद् द्विशतेन शतेन वा।<br>कुर्यात् पञ्चपलादूर्ध्वमशक्तोऽपि विचक्षणः॥ ५<br>तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ ६<br>वेद्यां कृष्णाजिनं कृत्वा तिलानामुपरि न्यसेत्।<br>तथाष्टादशधान्यानि रसांश्च लवणादिकान्॥ ७<br>तथाष्टौ पूर्णकलशान् समन्तात् परिकल्पयेत्।<br>वितानकं च कौशेयं फलानि विविधानि च॥ ८<br>तथांशुकानि रम्याणि श्रीखण्डशकलानि च।<br>इत्येवं कारयित्वा तामधिवासनपूर्वकम्॥ ९<br>शुक्लमाल्याम्बरधरः शुक्लाभरणभूषितः।<br>प्रदक्षिणं ततः कृत्वा गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ १०<br>पुण्यं कालमथासाद्य मन्त्रानेतानुदीरयेत्।अब इसके बाद मैं मनुष्योंके अमङ्गल और पापको नष्ट करनेवाले सर्वश्रेष्ठ हेमधरादानका वर्णन कर रहा हूँ। दानी इस दानमें जम्बूद्वीपके आकारकी भाँति सुवर्णमयी पृथ्वीकी रचना करवाये, वह मध्यमें सुमेरुपर्वतसे युक्त, मर्यादापर्वतोंसे सम्पन्न तथा आठ लोकपालों, नौ वर्षों, नदियों और नदोंसे युक्त हो, सातों सागरोंसे घिरी हुई हो। उसे बहुमूल्य रत्नोंसे जटिल तथा वसु, रुद्र और आदित्योंसे युक्त कर दे। इस पृथ्वीको अपनी शक्तिके अनुसार एक हजार, पाँच सौ, तीन सौ, दो सौ या एक सौ पल सोनेका बनवाना चाहिये। विचक्षण पुरुष अपनी असमर्थतामें इसे पाँच पलसे अधिक स्वर्णसे भी बनवा सकता है। बुद्धिमान् पुरुष तुलापुरुष-दानकी भाँति लोकपालोंका आवाहन तथा ऋत्विज्, मण्डप, पूजनसामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिका संकलन करे। फिर वेदीपर कृष्णमृगचर्म फैलाकर उसके ऊपर रखी हुई तिलराशिपर पृथ्वीकी प्रतिमा स्थापित कर दे। तत्पश्चात् उसके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्नों, लवणादि रसों और जलसे भरे आठ माङ्गलिक कलशोंको स्थापित करना चाहिये। उसे रेशमी चाँदौवा, विविध प्रकारके फल, मनोहर रेशमी वस्त्र और चन्दनोंके टुकड़ोंसे अलंकृत करना चाहिये। इस प्रकार अधिवासनपूर्वक पृथ्वीका सारा कार्य सम्पन्नकर स्वयं श्वेत वस्त्र और पुष्पमाला धारणकर, श्वेत वर्णके आभूषणोंसे विभूषित हो अञ्जलिमें पुष्प लेकर प्रदक्षिणा करे तथा पुण्यकाल आनेपर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे॥ १—१० १/२ ॥
नमस्ते सर्वदेवानां त्वमेव भवनं यतः॥ ११<br>धात्री च सर्वभूतानामतः पाहि वसुंधरे।<br>वसु धारयसे यस्माद् वसु चातीव निर्मलम्॥ १२<br>वसुंधरा ततो जाता तस्मात् पाहि भयादलम्।<br>चतुर्मुखोऽपि नो गच्छेद यस्मादन्तं तवाचले॥ १३'वसुंधरे! चूँकि तुम्हीं सभी देवताओं तथा सम्पूर्ण जीवनिकायकी भवनभूता तथा धात्री हो, अतः मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है। चूँकि तुम सभी प्रकारके भवनों, उनमें वास करनेवाले प्राणियों तथा अत्यन्त निर्मल रत्नोंको भी धारण करती हो, इसीसे तुम्हारा वसुंधरा नाम है, तुम संसार-भयसे मेरी रक्षा करो। अचले! चूँकि ब्रह्मा भी तुम्हारे अन्तको नहीं प्राप्त कर सकते,
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