मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय २८३ * | १०६९ |
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| कौशेयवस्त्रकटकैर्मणिभिश्चाभिपूजयेत् ।<br>शय्यां सोपस्करां दद्याद् धेनुमेकां पयस्विनीम्॥ १०<br><br>तथाष्टादश धान्यानि समंतादधिवासयेत्।<br>ततः प्रदक्षिणीकृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः॥ ११<br><br>इममुच्चारयेन्मन्त्रमथ सर्वं निवेदयेत्।<br>यस्माद् देवगणाः सर्वे स्थावराणि चराणि च॥ १२<br><br>धुरंधराङ्गे तिष्ठन्ति तस्माद् भक्तिः शिवेऽस्तु मे।<br>यस्माच्च भूमिदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १३<br><br>दानान्यन्यानि मे भक्तिर्धर्म एवं दृढा भवेत्।<br>दण्डेन सप्तहस्तेन त्रिंशद्दण्डं निवर्तनम्॥ १४<br><br>त्रिभागहीनं गोचर्ममानमाह प्रजापतिः।<br>मानेनानेन यो दद्यान्निवर्तनशतं बुधः।<br>विधिनानेन तस्याशु क्षीयते पापसंहतिः॥ १५<br><br>तदर्थमथवा दद्यादपि गोचर्ममात्रकम्।<br>भवनस्थानमात्रं वा सोऽपि पापैः प्रमुच्यते॥ १६<br><br>यावन्ति लाङ्गलकमार्गमुखानि भूमे-<br>र्भासां पतेर्दुहितुरङ्गजरोमकाणि।<br>तावन्ति शङ्करपुरे ससमा हि तिष्ठेद्<br>भूमिप्रदानमिह यः कुरुते मनुष्यः॥ १७<br><br>गन्धर्वकिन्नरसुरसुरसिद्धसङ्घै-<br>राधूतचामरमुपेत्य महद्विमानम्।<br>सम्पूज्यते पितृपितामहबन्धुयुक्तः<br>शम्भोः पदं व्रजति चामरनायकः सन्॥ १८<br><br>इन्द्रत्वमप्यधिगतं क्षयमभ्युपैति<br>गोभूमिलाङ्गलधुरन्धरसम्प्रदानात् ।<br>तस्मादघौघपटलक्षयकारि भूमे-<br>र्दानं विधेयमिति भूतिभवोद्भवाय॥ १९ | जंजीर, अंगूठी, रेशमी वस्त्र, सुवर्णके कङ्कण एवं मणियोंद्वारा उनकी पूजा करे तथा सामग्रियोंसहित शय्या और एक दूध देनेवाली गायका भी दान करे॥ १-१०॥<br><br>हलोंके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्नोंको रखना चाहिये। फिर अञ्जलिमें फूल लेकर प्रदक्षिणा करनेके पश्चात् सबका दान कर देना चाहिये। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—'चूँकि सभी देवगण तथा चराचर जीव भारवाही वृषभोके अङ्गोंमें निवास करते हैं, अतः मेरी शिवमें भक्ति हो। चूँकि अन्य सभी दान भूमिदानकी सोलहवीं कलाकी भी समता नहीं कर सकते, अतः धर्ममें मेरी सुदृढ़ भक्ति हो।' सात (मतान्तरसे दस) हाथोंके दण्डके मापसे तीस दण्ड मापका एक निवर्तन होता है और उसके तिहाई अंशसे न्यूनको गोचर्म* कहते हैं—ऐसा मान प्रजापतिने बतलाया है। जो बुद्धिमान् पुरुष इस मानके अनुसार एक सौ निवर्तन भूमिको इस विधिसे दान करता है, उसका पापपुञ्ज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जो उसका आधा भाग या गोचर्ममात्र अथवा एक भवन बनने योग्य भूमिका दान करता है, वह भी पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य इस मर्त्यलोकमें भूमि-दान करता है, वह उस भूमिमें हलके मुखके जितने मार्ग बनते हैं तथा सूर्यपुत्रीके अङ्गमें जितने रोएँ हैं, उतने वर्षोंतक शंकरपुरीमें निवास करता है तथा गन्धर्व, किन्नर, सुर, असुर और सिद्धोंके समूहोंद्वारा चँवर डुलाये जाते हुए महान् विमानपर सवार हो पिता, पितामह और बन्धुगणोंके साथ देवनायक होकर शम्भुलोकमें जाता है और वहाँ पूजित होता है। मनुष्य इस गौ, भूमि, हल और वृषभोका दान करनेसे नष्ट हुए इन्द्रत्वको भी प्राप्त कर लेता है, अतः ऐश्वर्य एवं समृद्धिके लिये पापपुञ्जके परदेको नष्ट करनेवाले भूमिदानको अवश्य करना चाहिये॥ ११-१९॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने पञ्चलाङ्गलप्रदानविधिर्नाम त्र्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानानुकीर्तन-प्रसंगमें पञ्चलाङ्गलप्रदान-विधि नामक दो सौ तिरासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८३॥
* दशहस्तेन दण्डेन त्रिंशद्दण्डानिवर्तनम्। दश तान्येव गोचर्म दत्त्वा स्वर्गे महीयते ॥