भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 1072, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1072

१०६२ * मत्स्यपुराण *


दो सौ उन्यासीवाँ अध्याय

कामधेनु-दानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि कामधेनुविधिं परम्।<br>सर्वकामप्रदं नृणां महापातकनाशनम्॥ १<br>लोकेशावाहनं तद्वद्धोमः कार्योऽधिवासनम्।<br>तुलापुरुषवत् कुर्यात् कुण्डमण्डपवेदिकम्॥ २<br>स्वल्पे त्वेकाग्निवत्कुर्याद् गुरुरेकः समाहितः।<br>काञ्चनस्यातिशुद्धस्य धेनुं वत्सं च कारयेत्॥ ३<br>उत्तमा पलसाहस्त्री तदर्धेन तु मध्यमा।<br>कनीयसी तदर्धेन कामधेनुः प्रकीर्तिता॥ ४<br>शक्तिस्तस्त्रिपलादूर्ध्वमशक्तोऽपीह कारयेत्।<br>वेद्यां कृष्णाजिनं न्यस्य गुडप्रस्थसमन्वितम्॥ ५<br>न्यसेदुपरि तां धेनुं महारत्नैरलङ्कृताम्।<br>कुम्भाष्टकसमोपेतां नानाफलसमन्विताम्॥ ६<br>तथाष्टादश धान्यानि समंतात् परिकल्पयेत्।<br>इक्षुदण्डाष्टकं तद्वन्नानाफलसमन्वितम्।<br>भाजनं चासनं तद्वत्ताम्रदोहनकं तथा॥ ७अब इसके बाद मैं मनुष्योंके महापातकोंको नाश करनेवाले तथा सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले कामधेनुके दानकी विधि बतला रहा हूँ। इसमें भी तुलापुरुष-दानकी तरह लोकपालोंका आवाहन, हवन और स्थापन-कार्य करना चाहिये तथा उसी प्रकार कुण्ड, मण्डप और वेदीकी रचना करनी चाहिये। स्वल्प वित्तवाला व्यक्ति एककुण्डीयज्ञाग्निकी विधिसे ऋत्विज्रूपमें समाहित चित्तवाले एकमात्र अपने गुरुका ही वरण करे। इसके लिये वह अत्यन्त शुद्ध सोनेकी कामधेनु और वत्स बनवाये। वह कामधेनु एक हजार पलकी उत्तम, पाँच सौ पलकी मध्यम और ढाई सौ पलकी कनिष्ठ कही गयी है। असमर्थ व्यक्तिको भी अपनी शक्तिके अनुसार तीन पलसे ऊपरकी ही कामधेनु बनवानी चाहिये। उसके बाद वेदीपर काले मृगचर्मको फैलाकर उसपर एक प्रस्थ गुड़ रखे। उसीके ऊपर बहुमूल्य रत्नोंसे अलंकृत उस धेनुको स्थापित करे। उस गौके साथ आठ कुम्भ तथा विविध प्रकारके फल हों। फिर वेदीके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्न, ईखके आठ टुकड़े, विविध प्रकारके पात्र, आसन तथा ताँबेकी दोहनीको रखना चाहिये॥ १—७॥
कौशेयवस्त्रद्वयसंयुतां गां<br>दीपातपत्राभरणाभिरामाम् ।<br>सचामरां कुण्डलिनीं सघण्टां<br>सुवर्णशृङ्गीं परिरूप्यपादाम्॥ ८<br>रसैश्च सर्वैः परितोऽभिजुष्टां<br>हरिद्रया पुष्पफलैरनेकैः।<br>अजाजिकुस्तुम्बुरुशर्करादिभि-<br>र्वितानकं चोपरि पञ्चवर्णम्॥ ९<br>स्नातस्ततो मङ्गलवेदघोषैः<br>प्रदक्षिणीकृत्य सपुष्पहस्तः।<br>आवाहयेत् तां गुरुणोक्तमन्त्रै-<br>र्द्विजाय दद्यादथ दर्भपाणिः॥ १०उसके बाद दो रेशमी वस्त्रोंसे आच्छादित, दीप, छत्र और आभरणोंसे सुशोभित, चामरयुक्त, कुण्डलधारिणी, घण्टीसे युक्त, सुवर्णजटित सींगों और चाँदीजटित पैरोंवाली गौके सम्पूर्ण शरीरको सभी प्रकारके रस, हल्दी, जीरा, धनिया और शक्करसे लेपन करके उसके निकट अनेकों प्रकारके पुष्प और फल रखे। उसके ऊपर पाँचरंगा चंदोवा ताने। तदनन्तर यजमान माङ्गलिक वेदध्वनिके साथ स्नान कर पुष्प और कुश हाथोंमें लेकर प्रदक्षिणा करके ब्राह्मणको दान दे, फिर गुरुद्वारा उच्चारित मन्त्रोंसे कामधेनुका आवाहन करे।