भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 1071, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 1071
* अध्याय २७८ *१०६१

| तद्दिने ब्रह्मचारी स्याद् विदीच्छेद्द्विपुलां श्रियम्।<br>अनेन विधिना यस्तु गोसहस्रप्रदो भवेत्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सिद्धचारणसेवितः॥ २२<br>विमानेनार्कवर्णेन किङ्किणीजालमालिना ।<br>सर्वेषां लोकपालानां लोके सम्पूज्यतेऽमरैः॥ २३<br>प्रतिमन्वन्तरं तिष्ठेत् पुत्रपौत्रसमन्वितः।<br>सप्त लोकानतिक्रम्य ततः शिवपुरं व्रजेत्॥ २४<br>शतमेकोत्तरं तद्वत् पितॄणां तारयेद् बुधः।<br>मातामहानां तद्वच्च पुत्रपौत्रसमन्वितः।<br>यावत् कल्पशतं तिष्ठेद् राजराजो भवेत् पुनः॥ २५<br>अश्वमेधशतं कुर्याच्छिवध्यानपरायणः।<br>वैष्णवं योगमास्थाय ततो मुच्येत बन्धनात्॥ २६<br>पितरश्चाभिनन्दन्ति गोसहस्रप्रदं सुतम्।<br>अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं पुत्रो दौहित्र एव वा।<br>गोसहस्रप्रदो भूत्वा नरकादुद्धरिष्यति॥ २७<br>तस्य कर्मकरो वा स्यादपि द्रष्टा तथैव च।<br>संसारसागरादस्माद् योऽस्मान् सन्तारयिष्यति॥ २८<br>इति पठति य एतद् गोसहस्रप्रदानं<br>सुरभुवनमुपेयात् संस्मरेद् वा च पश्येत्।<br>अनुभवति मुदं वा मुच्यमानो निकामं<br>प्रहतकलुषदेहः सोऽपि यातीन्द्रलोकम्॥ २९ | यदि उसे विपुल समृद्धिकी इच्छा हो तो उस दिन ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करना चाहिये। इस विधिसे जो मनुष्य एक हजार गौओंका दान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर सिद्धों एवं चारणोंद्वारा सेवित होता है। वह क्षुद्र घंटियोंसे सुशोभित सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर आरूढ़ होकर सभी लोकपालोंके लोकोंमें अमरोंद्वारा पूजित होता है एवं वहाँ प्रत्येक मन्वन्तरमें पुत्र-पौत्रसहित निवास करता है। पुनः सातों लोकोंका अतिक्रमण कर शिवपुरको चला जाता है। वह बुद्धिमान् दाता अपने पितृपक्ष तथा मातृपक्षके पितरोंके एक सौ एक पीढ़ियोंको तार देता है। वह वहाँ पुत्र-पौत्रसे युक्त होकर सौ कल्पोंतक निवास करता है तथा वहाँसे लौटनेपर भूतलपर राजाधिराज होता है। यहाँ वह शिवके ध्यानमें परायण हो सैकड़ों अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करता है। पुनः वैष्णवयोगको धारणकर बन्धनसे मुक्त हो जाता है। पितर भी हजार गोदान करनेवाले पुत्रका अभिनन्दन करते हैं। (वे अपने हृदयमें सर्वदा यह आकाङ्क्षा करते रहते हैं कि) क्या हमारे कुलमें कोई पुत्र अथवा दौहित्र (कन्याका पुत्र) ऐसा होगा जो हजार गौओंका दान कर हमलोगोंका नरकसे उद्धार करेगा अथवा इस महादानका कर्मचारी या इसका दर्शक होगा जिससे इस संसारसागरसे हमलोगोंको पार कर देगा।<br>इस प्रकार इस गोसहस्रदानको जो पढ़ता, स्मरण करता अथवा देखता है, वह देवलोकको प्राप्त होता है अथवा जो दान देते समय अत्यन्त हर्षका अनुभव करता है उसका शरीर पापसे मुक्त हो जाता है और वह इन्द्रलोकको चला जाता है॥ २२—२९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने गोसहस्रप्रदानविधिर्नामाष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णन-प्रसंगमें गौ-सहस्र प्रदान-विधि नामक दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७८॥

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