मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१०५६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वस्वादित्यमरुद्गर्भं महारत्नसमन्वितम्।<br>वितस्तेरङ्गुलशतं यावदायामविस्तरम्॥ ६<br><br>कौशेयवस्त्रसंवीतं तिलद्रोणोपरि न्यसेत्।<br>तथाष्टादश धान्यानि समन्तात् परिकल्पयेत्॥ ७<br><br>पूर्वेणानन्तशयनं प्रद्युम्नं पूर्वदक्षिणे।<br>प्रकृतिं दक्षिणे देशे सङ्कर्षणमतः परम्॥ ८<br><br>पश्चिमे चतुरो वेदाननिरुद्धमतः परम्।<br>अग्निमुत्तरतो हैमं वासुदेवमतः परम्॥ ९<br><br>समन्ताद् गुडपीठस्थानर्चयेत् काञ्चनान् बुधः।<br>स्थापयेद् वस्त्रसंवीतान् पूर्णकुम्भान् दशैव तु॥ १० | युक्त हो। उसके गर्भमें वसुगण, आदित्यगण और मरुद्गण होने चाहिये तथा वह बहुमूल्य रत्नोंसे सुशोभित भी हो। उसकी लम्बाई-चौड़ाई एक बीतेसे लेकर सौ अंगुलतक होनी चाहिये। उसे रेशमी वस्त्रसे परिवेष्टित कर एक द्रोण तिलपर स्थापित करना चाहिये। उसके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्नोंको रखना चाहिये। उसकी पूर्व दिशामें अनन्तशायीको, (दक्षिण-पूर्वके) अग्निकोणमें प्रद्युम्नको, दक्षिण दिशामें प्रकृतिको, (दक्षिण-पश्चिमके) नैर्ऋत्यकोणमें संकर्षणको, पश्चिम दिशामें चारों वेदोंको, (पश्चिम-उत्तर) वायव्यकोणमें अनिरुद्धको, उत्तर दिशामें अग्निको, (उत्तर-पूर्वके) ईशानकोणमें सुवर्ण-निर्मित वासुदेवको स्थापित करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष इन सभी देवताओंकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनवाकर चारों ओर गुडके आसनपर स्थितकर उनकी पूजा करे। फिर जलसे भरे हुए दस कुम्भोंको वस्त्रसे परिवेष्टित कर स्थापित करे॥ १—१०॥ |
| दशैव धेनवो देयाः सहेमाम्बरदोहनाः।<br>पादुकोपानहच्छत्रचामरासनदर्पणैः ।<br>भक्ष्यभोज्यान्नदीपेक्षुफलमाल्यानुलेपनैः ॥ ११<br><br>होमाधिवासनान्ते च स्नापितो वेदपुङ्गवैः।<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं त्रिः कृत्वाथ प्रदक्षिणम्॥ १२ | तदनन्तर पादुका, जूता, छत्र, चमर, आसन, दर्पण, भक्ष्य-भोज्य, अन्न, दीप, ईख, फल, माला और चन्दनसहित सुवर्ण, वस्त्र और कांसदोहनीके साथ दस गौएँ दान करनी चाहिये। हवन एवं अधिवासनके समाप्त होनेपर वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा स्नान कराये जानेके बाद यजमान तीन बार प्रदक्षिणा कर इस मन्त्रका उच्चारण करे— |
| नमोऽस्तु विश्वेश्वर विश्वधाम<br>जगत्सवित्रे भगवन् नमस्ते।<br>सप्तर्षिलोकामरभूतलेश<br>गर्भेण सार्धं वितराभिरक्षाम् ॥ १३<br><br>ये दुःखितास्ते सुखिनो भवन्तु<br>प्रयान्तु पापानि चराचराणाम्।<br>त्वद्दानशस्त्राहतपातकानां<br>ब्रह्माण्डदोषाः प्रलयं व्रजन्तु॥ १४<br><br>एवं प्रणम्यामरविश्वगर्भं<br>दद्याद् द्विजेभ्यो दशधा विभज्य।<br>भागद्वयं तत्र गुरोः प्रकल्प्य<br>समं भजेच्छेषमनुक्रमेण॥ १५ | 'विश्वेश्वर! आपको नमस्कार है। विश्वधाम! आप जगत्को उत्पन्न करनेवाले हैं, आपको प्रणाम है। भगवन्! आप सप्तर्षिलोक, देवता और भूतलेके स्वामी हैं, आप गर्भके साथ चारों ओरसे हमारी रक्षा कीजिये। जो दुःखी हैं, वे सुखी हो जायँ, चराचर जीवोंके पापपुञ्ज नष्ट हो जायँ, आपके दानरूप शस्त्रसे नष्ट हुए पापोंवाले लोगोंके ब्रह्माण्ड-दोष नष्ट हो जायँ।' इस प्रकार अमरगणों एवं विश्वको गर्भमें धारण करनेवाले उस ब्रह्माण्डको प्रणाम करनेके बाद उसे दस भागोंमें विभक्त कर ब्राह्मणोंको दान कर दे। उनमेंसे दो भाग गुरुको दे और शेष भागोंको क्रमशः समानरूपसे ब्राह्मणोंको दे। |