मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २७७ * | १०५७ |
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| स्वल्पे च होमं गुरुरेक एव<br>कुर्यादतैकाग्निविधानयुक्त्या ।<br>स एव सम्पूज्यतमोऽल्पवित्ते<br>यथोक्तवस्त्राभरणादिकेन ॥ १६<br>इत्थं य एतदखिलं पुरुषोऽत्र कुर्याद्<br>ब्रह्माण्डदानमधिगम्य महद्विमानम्।<br>निर्धूतकल्मषविशुद्धतनुर्मुरारे-<br>रानन्दकृत्पदमुपैति सहाप्सरोभिः॥ १७<br>संतारयेत् पितृपितामहपुत्रपौत्र-<br>बन्धुप्रियातिथिकलत्रशताष्टकं सः।<br>ब्रह्माण्डदानशकलीकृतपातकोघ-<br>मानन्दयेच्च जननीकुलमप्यशेषम्॥ १८<br>इति पठति शृणोति वा य एतत्<br>सुरभवनेषु गृहेषु धार्मिकाणाम्।<br>मतिमपि च ददाति मोदतेऽसाव-<br>मरपतेर्भवने सहाप्सरोभिः॥ १९॥ | स्वल्प हवनमें एक गुरुको ही एकाग्निकी विधिसे नियुक्त करना चाहिये और अल्प वित्त होनेपर यथोक्त वस्त्र-आभूषणादिसे उन्हींकी पूजा करनी चाहिये। इस प्रकार जो मनुष्य इस लोकमें इस ब्रह्माण्डदानकी क्रियाको सम्पन्न करता है, वह पापोंके नष्ट हो जानेसे शुद्ध शरीर हो अप्सराओंके साथ महान् विमानपर आरूढ़ हो मुरारिके आनन्ददायक पदको प्राप्त करता है। इस प्रकार करनेसे वह अपने सैकड़ों पिता, पितामह, पुत्र, पौत्र, बन्धु, प्रियजन, अतिथि और स्त्रीको तार देता है। साथ ही जिसका पापसमूह ब्रह्माण्ड-दानसे चूर्ण हो गया है उस सम्पूर्ण मातृकुलको भी आनन्दित करता है। इसे जो मनुष्य देव-मन्दिरों अथवा धार्मिकोंके गृहोंमें पढ़ता अथवा सुनता या ऐसा करनेकी मति ही देता है, वह इन्द्रके भवनमें अप्सराओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है॥ १६–१९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने ब्रह्माण्डप्रदानविधिर्नाम षट्सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णनप्रसङ्गमें ब्रह्माण्ड-दान-विधि नामक दो सौ छिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७६ ॥
दो सौ सतहत्तरवाँ अध्याय
कल्पपादप-दान-विधि
| मत्स्य उवाच<br><br>कल्पपादपदानाख्यमतः परमनुत्तमम्।<br>महादानं प्रवक्ष्यामि सर्वपातकनाशनम्॥ १<br>पुण्यं दिनमथासाद्य तुलापुरुषदानवत्।<br>पुण्याहवाचनं कृत्वा लोकेशावाहनं तथा॥ २<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ।<br>काञ्चनं कारयेद् वृक्षं नानाफलसमन्वितम्॥ ३<br>नानाविहगवस्त्राणि भूषणानि च कारयेत्।<br>शक्तितस्त्रिपलादूर्ध्वमासहस्त्रं प्रकल्पयेत्॥ ४ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**इसके बाद मैं सभी पातकोंको नष्ट करनेवाले अत्युत्तम कल्पपादप-दान नामक महादानका वर्णन कर रहा हूँ। पुण्य दिन प्राप्त होनेपर तुलापुरुष-दानके समान ही पुण्याहवाचन तथा लोकपालोंका आवाहन कर ऋत्विज् मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण, आच्छादन आदि सम्पन्न कर कल्पवृक्ष-दानका समारम्भ करे। इसके लिये विविध प्रकारके फलोंसे सुशोभित एक सुवर्णमय कल्पवृक्ष बनवाये। उसपर विविध प्रकारके पक्षी, वस्त्र तथा आभूषण भी बनवाये। इस वृक्षको यथाशक्ति तीन पलसे लेकर एक हजार पलतकका बनवाना चाहिये। |