भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०७४ * मत्स्यपुराण *


नानापुष्पफलोपेता नानांशुकविभूषिताः ।<br>विद्याधरसुपर्णानां मिथुनैरुपशोभिताः ॥ ४<br><br>पुष्पाण्यादित्सुभिः सिद्धैः फलानि च विहङ्गमैः ।<br>लोकपालानुकारिण्यः कर्तव्यास्तासु देवताः ॥ ५<br><br>ब्राह्मीमनन्तशक्तिं च लवणस्योपरि न्यसेत् ।<br>अधस्ताल्लतयोर्मध्ये पद्मशङ्खकरे शुभे ॥ ६<br><br>इमासनस्था तु गुडे पूर्वतः कुलिशायुधा ।<br>रजन्यजस्थिताग्नायी स्रुवपाणिरथानले ॥ ७<br><br>याम्ये च महिषारूढा गदिनी तण्डुलोपरि ।<br>नैर्ऋते नैर्ऋती स्थाप्या सखड्गा दक्षिणापरे ॥ ८<br><br>वारुणे वारुणी क्षीरे झषस्था नागपाशिनी ।<br>पताकिनी च वायव्ये मृगस्था शर्करोपरि ॥ ९<br><br>सौम्या तिलेषु संस्थाप्या शङ्खिनी निधिसंस्थिता ।<br>माहेश्वरी वृषारूढा नवनीते त्रिशूलिनी ॥ १०<br><br>मौलिन्यो वरदास्तद्वत् कर्तव्या बालकान्विताः ।<br>शक्त्या पञ्चपलादूर्ध्वमासहस्रात् प्रकल्पयेत् ॥ ११<br><br>सर्वासामुपरि स्थाप्यं पञ्चवर्णं वितानकम् ।<br>धेनवो दश कुम्भाश्च वस्त्रयुग्मानि चैव हि ॥ १२<br><br>मध्यमे द्वे तु गुरवे ऋत्विग्भ्योऽन्यास्तथैव च ।<br><br>ततो मङ्गलशब्देन स्नातः शुक्लाम्बरो बुधः ।<br>त्रिः प्रदक्षिणमावृत्य मन्त्रमेतमुदीरयेत् ॥ १३<br><br>नमो नमः पापविनाशिनीभ्यो<br>ब्रह्माण्डलोकेश्वरपालिनीभ्यः ।<br>आशंसिताधिक्यफलप्रदाभ्यो<br>दिग्भ्यस्तथा कल्पलतावधूभ्यः ॥ १४<br><br>इति सकलदिगङ्गनाप्रदानं<br>भवभयसूदनकारि यः करोति ।<br>अभिमतफलदे स नागलोके<br>वसति पितामहवत्सराणि त्रिंशत् ॥ १५<br><br>पितृशतमथ तारयेद् भवाब्धे-<br>र्भवदुरितौघविघातशुद्धदेहः ।जो विविध प्रकारके पुष्पों और फलोंसे युक्त तथा विविध रेशमी वस्त्रोंसे विभूषित तथा विद्याधरों एवं पक्षियोंके जोड़ोंसे सुशोभित हों। उन्हें पुष्प चुननेका प्रयत्न करते हुए सिद्धों, फल खानेके लिये उत्सुक पक्षियों तथा लोकपालोंके समान आकृतिवाली देवियोंसे युक्त बनाना चाहिये। फिर लवणराशिके ऊपर अनन्त एवं ब्राह्मी शक्तिको स्थापित करना चाहिये। दो लताओंके निम्नभागमें पद्म और शङ्खसे सुशोभित हाथोंवाली उन दोनों मङ्गलमयी देवियोंको चित्रित करे॥ १—६॥<br><br>पूर्व दिशामें गुड़के ऊपर कुलिशका अस्त्र धारण किये हुए हाथीपर विराजमान इन्द्राणीको, अग्निकोणमें हल्दी-चूर्णपर स्रुवा हाथमें लिये हुए बकरेपर सवार अग्नायीको, दक्षिण दिशामें तण्डुलपर महिषारूढ़ गदा धारण किये हुए यमीको, नैर्ऋत्यकोणमें घृतके ऊपर खड्गसहित नैर्ऋतीको, पश्चिम दिशामें दुग्धपर नागपाश धारण किये हुए मत्स्यपर आरूढ़ वारुणीको, वायव्यकोणमें शर्कराके ऊपर मृगारूढ़ पताका लिये हुए पताकिनी (वायवी)-को, उत्तर दिशामें तिलोंपर निधिसहित शङ्ख लिये हुए (कौबेरी)-को तथा ईशानकोणमें मक्खनकी राशिपर नन्दीपर आरूढ़ त्रिशूलधारण किये हुए माहेश्वरी शक्ति ऐशानीको स्थापित करना चाहिये। उसी प्रकार वहाँ केश-मुकुट धारण करनेवाली वरदायिनी देवियोंको भी बालकोंके साथ स्थापित करना चाहिये। उन्हें अपनी शक्तिके अनुसार पाँच पल सोनेसे ऊपर एक हजार पलतकका बनवाना चाहिये। इन सभीके ऊपर पाँचरंगा वितान तानना चाहिये। फिर दस गौ, दस कलश तथा दो वस्त्रोंका दान देना चाहिये। इनमेंसे दो मध्यम लताओंको गुरुको तथा अन्य ऋत्विजोंको देना चाहिये। तत्पश्चात् बुद्धिमान् यजमानको माङ्गलिक शब्दोंके साथ स्नान करनेके बाद श्वेत वस्त्र धारणकर इन कल्पलताओंकी तीन प्रदक्षिणा कर इस भावके मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये—‘जो पापविनाशिनी, ब्रह्माण्ड एवं लोकेश्वरोंका पालन करनेवाली तथा याचकोंको अभिलाषासे भी अधिक फल प्रदान करनेवाली हैं, उन कल्पलता-वधुओं तथा दिग्वधुओंको बारम्बार नमस्कार है।' इस प्रकार जो पुरुष भवभयको हरण करनेवाले सम्पूर्ण दिगङ्गनाओंके दानको करता है, वह अभीष्ट फलदायी नागलोकमें ब्रह्माके तीस वर्षोतक निवास करता है तथा सैकड़ों पितरोंको भवसागरसे तार देता है। वह सांसारिक पापसमूहके नष्ट हो जानेसे