मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २८७ * | १०७५ |
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| सुरपतिवनितासहस्रसंख्यैः<br>परिवृतमम्बुजसंसदाभिवन्द्यः ॥ १६<br>इति विधानमिदं दिगङ्गनानां<br>कनककल्पलताविनिवेदकम् ।<br>पठति यः स्मरतीह तथैक्षते<br>स पदमेति पुरंदरसेवितम्॥ १७ | विशुद्धशरीर होकर हजारों देवाङ्गनाओंसे सुशोभित ब्रह्माके लोकमें अभिवन्दनीय होता है। इस प्रकार दिगङ्गनाओंके तथा कनककल्पलताके दानकी विधिको जो पढ़ता, स्मरण करता या देखता है, वह इन्द्रद्वारा सेवित पदको प्राप्त करता है॥ ७—१७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने कनककल्पलताप्रदानविधिर्नाम षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानवर्णन-प्रसंगमें कनककल्पलताप्रदानविधि नामक दो सौ छियासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २८६ ॥
दो सौ सतासीवाँ अध्याय
सप्तसागर-दानकी विधि
| मत्स्य उवाच | |
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| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>सप्तसागरकं नाम सर्वपापप्रणाशनम्॥ १<br>पुण्यं दिनमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः॥ २<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ।<br>कारयेत् सप्त कुण्डानि काञ्चनानि विचक्षणः॥ ३<br>प्रादेशमात्राणि तथारत्निमात्राणि वै पुनः।<br>कुर्यात् सप्तपलादूर्ध्वमासहस्राच्च शक्तितः॥ ४<br>संस्थाप्यानि च सर्वाणि कृष्णाजिनतिलोपरि।<br>प्रथमं पूरयेत् कुण्डं लवणेन विचक्षणः॥ ५<br>द्वितीयं पयसा तद्वत् तृतीयं सर्पिषा पुनः।<br>चतुर्थं तु गुडेनैव दध्ना पञ्चममेव च॥ ६<br>षष्ठं शर्करया तद्वत् सप्तमं तीर्थवारिणा।<br>स्थापयेल्लवणस्थं तु ब्रह्माणं काञ्चनं शुभम्॥ ७<br>केशवं क्षीरमध्ये तु घृतमध्ये महेश्वरम्।<br>भास्करं गुडमध्ये तु दधिमध्ये निशाधिपम्॥ ८<br>शर्करायां न्यसेल्लक्ष्मीं जलमध्ये तु पार्वतीम्।<br>सर्वेषु सर्वरत्नानि धान्यानि च समन्ततः॥ ९ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**अब मैं सम्पूर्ण पापोंके विनाशक परमोत्तम सप्तसागर नामक महादानकी विधि बतला रहा हूँ। बुद्धिमान् पुरुष तुलापुरुष-दानकी तरह किसी पवित्र दिनके आनेपर पुण्याहवाचन करके लोकपालोंका आवाहन करे। तथा ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण, आच्छादन आदिका प्रबन्ध भी उसी तरह करे। विचक्षण पुरुष स्वर्णनिर्मित सात स्वतन्त्र कुण्डोंका निर्माण करे। ये कुण्ड एक बित्ता चौड़े तथा एक अरत्नि अर्थात् बँधी हुई मुट्ठीवाले हाथ-जितने लम्बे होने चाहिये। इन्हें अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार सात पल सोनेसे ऊपर एक हजार पलतकका बनवाना चाहिये। इन सभी कुण्डोंको कृष्णमृगके चर्मपर रखे गये तिलोंके ऊपर स्थापित करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको प्रथम कुण्डको लवणसे, द्वितीय कुण्डको दुग्धसे, तृतीयको घृतसे, चतुर्थको गुड़से, पञ्चमको दहीसे, छठेको चीनीसे तथा सातवेंको तीर्थोंके पवित्र जलसे पूर्ण करना चाहिये। फिर लवण कुण्डमें सुवर्ण-निर्मित ब्रह्माकी, दुग्धकुण्डके मध्यमें भगवान् विष्णुकी, घृतकुण्डमें भगवान् शिवकी, गुड़कुण्डमें भगवान् भास्करकी, दधिकुण्डमें चन्द्रमाकी, शर्कराकुण्डमें लक्ष्मीकी और जलकुण्डमें पार्वतीकी स्थापना करनी चाहिये। सभी कुण्डोंको सभी ओरसे रत्नों तथा अन्नोंद्वारा अलंकृत करना |