भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०७६ * मत्स्यपुराण *


| तुलापुरुषवच्छेषमत्रापि परिकल्पयेत्।<br>ततो वारुणहोमान्ते स्नापितो वेदपुङ्गवैः॥१०<br>त्रिः प्रदक्षिणमावृत्य मन्त्रानेतानुदीरयेत्।<br>नमो वः सर्वसिन्धूनामाधारेभ्यः सनातनाः।<br>जन्तूनां प्राणदेभ्यश्च समुद्रेभ्यो नमो नमः॥११<br>क्षीरोदकाज्यदधिमाधुरलावणेषु-<br>सारामृतेन भुवनत्रयजीवसंघान्।<br>आनन्दयन्ति वसुभिश्च यतो भवन्त-<br>स्तस्मान्ममाप्यघविघातमलं विशन्तु॥१२<br>यस्मात् समस्तभुवनेषु भवन्त एव<br>तीर्थामरासुरसुबद्धमणिप्रदानम् ।<br>पापक्षयामृतविलेपनभूषणाय<br>लोकस्य बिभ्रति तदस्तु ममापि लक्ष्मीः॥१३<br>इति ददाति रसामृतसंयुता-<br>ञ्छुचिरविस्मयवानिह सागरान्।<br>अमलकाञ्चनवर्णमयानसौ<br>पदमुपैति हरेरमराचितः ॥१४<br>सकलपापविधौतविराजितः<br>पितृपितामहपुत्रकलत्रकम् ।<br>नरकलोकसमाकुलमप्ययं<br>झटिति सोऽपि नयेच्छिवमन्दिरम्॥१५ | चाहिये। शेष कार्य तुलापुरुषदानकी भाँति सम्पन्न करना चाहिये। तत्पश्चात् महावारुणी आहुतियाँ प्रदानकर वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा अभिषिक्त यजमान इन कुण्डोंकी तीन बार प्रदक्षिणा कर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे॥१—१० १/२॥<br>'सनातन सागरगण! आपलोग समस्त जीवोंके प्राणदाता तथा सम्पूर्ण नदियोंके आधार हो, आपको बारंबार नमस्कार है। चूँकि आपलोग दुग्ध, जल, घृत, दही, मधु, लवण, शक्कररूप अमृत तथा रत्नादि सम्पत्तियोंद्वारा त्रिभुवनके जीवसमूहोंको आनन्दित करते हैं, अतः मेरे भी पापपुञ्जोंका विनाश करें। चूँकि आपलोग ही समस्त भुवनोंमें लोकके पापक्षय, अमृतविलेपन और भूषणके निमित्त तीर्थों, देवताओं, असुरों और सुन्दर मणिके प्रदान-कार्यको धारणवाले हैं, अतः वह लक्ष्मी मुझे भी प्राप्त हो।' इस प्रकार जो मनुष्य पवित्र एवं विस्मयरहित होकर इस लोकमें रस एवं अमृतसे युक्त निर्मल सोनेके बने हुए सागरोंका दान करता है, वह देवताओंद्वारा पूजित होकर भगवान् विष्णुके पदको प्राप्त करता है। सम्पूर्ण पापोंके धुल जानेसे विशुद्ध हुआ यह पुरुष नरकलोकमें व्याकुल हुए पिता, पितामह, पुत्र और पत्नी आदिको भी शीघ्र ही शिवलोकमें ले जाता है॥११—१५॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने सप्तसागरप्रदानविधिर्नाम सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥२८७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानवर्णन-प्रसङ्गमें सप्तसागरदान-विधि नामक दो सौ सत्तासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥२८७॥


दो सौ अठासीवाँ अध्याय

रत्नधेनुदानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>रत्नधेन्विति विख्यातं गोलोकफलदं नृणाम्॥ १अब मैं मनुष्योंको गोलोक प्रदान करनेवाले अत्युत्तम 'रत्नधेनु' नामक महादानकी विधिको वर्णन कर रहा हूँ।
पुण्यं दिनमथासाद्य तुलापुरुषदानवत्।<br>लोकेशावाहनं कृत्वा ततो धेनुं प्रकल्पयेत्॥ २किसी पुण्य दिनके आनेपर यजमान तुलापुरुषदानकी तरह लोकपालोंका आवाहन करनेके पश्चात् धेनुकी कल्पना करे।