मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१०८४ * मत्स्यपुराण *
| एतत् पुराणं परमं सर्वदोषविघातकम्।<br>मत्स्यरूपेण हरिणा कथितं मनवेऽर्णवे॥ ३१<br>अस्मात् पुराणादपि पादमेकं<br>पठेत् तु यः सोऽपि विमुक्तपापः।<br>नारायणस्यास्पदमैति नून-<br>मनङ्गवद् दिव्यवपुः सुखी स्यात्॥ ३२<br>पुराणमेतत् सकलं रहस्यं<br>श्रद्धान्वितः पुण्यमिदं शृणोति।<br>स चाश्वमेधावभृथप्रभावं<br>फलं समाप्नोति हरप्रसादात्॥ ३३<br>शिवं विष्णुं समभ्यर्च्य ब्रह्माणं सदिवाकरम्।<br>श्लोकं श्लोकार्धपादं वा श्रद्धया यः शृणोति वा।<br>श्रावयेद् वापि धर्मज्ञस्तत्फलं शृणुत द्विजाः॥ ३४<br>ब्राह्मणो लभते विद्यां क्षत्रियो लभते महीम्।<br>वैश्यो धनमवाप्नोति सुखं शूद्रस्तु विन्दति॥ ३५<br>आयुष्मान् पुत्रवांश्चैव लक्ष्मीवान् पापवर्जितः।<br>श्रुत्वा पुराणमखिलं शत्रुभिश्चापराजितः॥ ३६ | यह परमोत्तम पुराण सम्पूर्ण दोषोंका नाशक है। इसे मत्स्यरूपधारी श्रीहरिने प्रलयकालमें एकार्णवके जलमें मनुके प्रति कहा था। जो मनुष्य इस पुराणके एक श्लोकके एक चरणका भी पाठ करता है, वह भी पापोंसे मुक्त होकर सुखी हो जाता है तथा कामदेवकी भाँति दिव्य शरीर धारणकर निश्चय ही नारायणके निवासस्थान वैकुण्ठमें चला जाता है। जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इस पुण्यप्रद एवं रहस्यमय सम्पूर्ण पुराणको सुनता है, वह शंकरजीकी कृपासे अश्वमेध-यज्ञके अन्तमें होनेवाले अवभृथ-स्नानके सदृश प्रभावशाली फलको प्राप्त करता है। द्विजवरो! जो धर्मज्ञ मनुष्य शिव, विष्णु, ब्रह्मा और सूर्यकी अर्चना करके श्रद्धापूर्वक इस पुराणके एक श्लोक, आधे श्लोक अथवा एक चरणको सुनता है अथवा दूसरेको सुनाता है, उसे जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनिये। वह ब्राह्मण हो तो विद्या, क्षत्रिय हो तो पृथ्वी, वैश्य हो तो धन और शूद्र हो तो सुख प्राप्त करता है। सम्पूर्ण पुराण सुननेवाला पापरहित होकर आयुष्मान्, पुत्रवान् और लक्ष्मीवान् हो जाता है तथा उसे शत्रु पराजित नहीं कर सकते॥ २९—३६॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽनुक्रमणिका नामैकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २९१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अनुक्रमणिका नामक दो सौ इक्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २९१॥
पुराण-श्रवण-कालमें पालनीय धर्म
| श्रद्धाभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसाः।<br>वाग्यताः शुचयोऽव्यग्राः श्रोतारः पुण्यभागिनः॥ १<br><br>अभक्त्या ये कथां पुण्यां शृण्वन्ति मनुजाधमाः।<br>तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखं स्याज्जन्मजन्मनि॥ २<br><br>पुराणं ये च सम्पूज्य ताम्बूलाद्यैरुपायनैः।<br>शृण्वन्ति च कथां भक्त्याऽदरिद्राः स्युर्न संशयः॥ ३<br><br>कथायां कीर्त्यमानायां ये गच्छन्त्यन्यतो नराः।<br>भोगान्तरे प्रणश्यन्ति तेषां दाराश्च सम्पदः॥ ४ | जो लोग श्रद्धा और भक्तिसे सम्पन्न, अन्य कार्योंकी लालसासे रहित, मौन, पवित्र और शान्तचित्तसे (पुराणकी कथाको) श्रवण करते हैं, वे ही पुण्यके भागी होते हैं। जो अधम मनुष्य भक्तिरहित होकर पुण्यकथाको सुनते हैं, उन्हें पुण्यफल तो मिलता नहीं, उलटे प्रत्येक जन्ममें दुःख भोगना पड़ता है। जो लोग ताम्बूल, पुष्प, चन्दन आदि पूजन-सामग्रियोंद्वारा पुराणकी भलीभाँति पूजा करके भक्तिपूर्वक कथा सुनते हैं, वे निःसंदेह दरिद्रतारहित अर्थात् धनवान् होते हैं। जो मनुष्य कथा होते समय अन्य कार्यके लिये वहाँसे उठकर अन्यत्र चले जाते हैं, उनकी पत्नी और |