मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * पुराण-श्रवण-कालमें पालनीय धर्म * | १०८५ |
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| सोष्णीषमस्तका ये च कथां शृण्वन्ति पावनीम्।<br>ते बलाकाः प्रजायन्ते पापिनो मनुजाधमाः॥ ५<br><br>ताम्बूलं भक्षयन्तो ये कथां शृण्वन्ति पावनीम्।<br>श्वविष्ठां खादयन्त्येताननयन्ति यमकिङ्कराः॥ ६<br><br>ये च तुङ्गासनारूढाः कथां शृण्वन्ति दाम्भिकाः।<br>अक्षय्यनरकान् भुक्त्वा ते भवन्त्येव वायसाः॥ ७<br><br>ये वै वरासनारूढा ये च मध्यासनस्थिताः।<br>शृण्वन्ति सत्कथां ते वै भवन्त्यर्जुनपादपाः॥ ८<br><br>असम्प्रणम्य शृण्वन्ति विषभक्षा भवन्ति ते।<br>तथा शयानाः शृण्वन्ति भवन्त्यजगरा नराः॥ ९ | सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। जो पापी अधम मनुष्य मस्तकपर पगड़ी बाँधकर (या टोपी लगाकर) पवित्र कथाको सुनते हैं, वे (दूसरे जन्ममें) बगुला होकर उत्पन्न होते हैं। जो लोग पान चबाते हुए पवित्र कथाको सुनते हैं, उन्हें कुत्तेका मल खाना पड़ता है और यमदूत उन्हें यमपुरीमें ले जाते हैं। जो ढोंगी मनुष्य (व्यासासनसे) ऊँचे आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे ही अक्षय नरकोंका भोग करके कौआ होते हैं। जो लोग (व्यासासनसे) श्रेष्ठ आसनपर अथवा मध्यम आसनपर बैठकर उत्तम कथाको श्रवण करते हैं, वे अर्जुन नामक वृक्ष होते हैं। जो मनुष्य (पुराणकी पुस्तक और व्यासको) बिना प्रणाम किये ही कथा सुनते हैं, वे विषभक्षी होते हैं तथा जो लोग सोते हुए कथा सुनते हैं, वे अजगर साँप होते हैं॥ १—९॥ | | यः शृणोति कथां वक्तुः समानासनसंस्थितः।<br>गुरुतल्पसमं पापं सम्प्राप्य नरकं व्रजेत्॥ १०<br><br>ये निन्दन्ति पुराणज्ञान् कथां वै पापहारिणीम्।<br>ते वै जन्मशतं मर्त्याः सूकराः सम्भवन्ति हि॥ ११<br><br>कथायां कीर्त्यमानायां ये वदन्ति दुरुत्तरम्।<br>ते गर्दभाः प्रजायन्ते कृकलासास्तथैव च॥ १२<br><br>कदाचिदपि ये पुण्यां न शृण्वन्ति कथां नराः।<br>ते भुक्त्वा नरकान् घोरान् भवन्ति वनसूकराः॥ १३<br><br>ये कथामनुमोदन्ते कीर्त्यमानां नरोत्तमाः।<br>अशृण्वन्तोऽपि ते यान्ति शाश्वतं परमं पदम्॥ १४<br><br>कथायां कीर्त्यमानायां विघ्नं कुर्वन्ति ये शठाः।<br>कोट्यब्दं नरकान् भुक्त्वा भवन्ति ग्रामसूकराः॥ १५<br><br>ये श्रावयन्ति मनुजान् पुण्यां पौराणिकीं कथाम्।<br>कल्पकोटिशतं सांग्रं तिष्ठन्ति ब्रह्मणः पदे॥ १६<br><br>आसनार्थं प्रयच्छन्ति पुराणज्ञस्य ये नराः।<br>कम्बलाजिनवासांसि मञ्चं फलकमेव च॥ १७<br><br>स्वर्गलोकं समासाद्य भुक्त्वा भोगान् यथेप्सितान्।<br>स्थित्वा ब्रह्मादिलोकेषु पदं यान्ति निरामयम्॥ १८ | इसी प्रकार जो वक्ताके समान आसनपर बैठकर कथा सुनता है, वह गुरु-शय्या-गमनके समान पापका भागी होकर नरकगामी होता है। जो मनुष्य पुराणोंके ज्ञाता (व्यास) और पापोंको हरण करनेवाली कथाकी निन्दा करते हैं, वे सौ जन्मोंतक सूकर-योनिमें उत्पन्न होते हैं। कथा होते समय जो लोग वक्ताको बुरा उत्तर देते हैं, वे गदहा तथा गिरगिटकी योनिमें पैदा होते हैं। जो मनुष्य इस पुण्य कथाको कभी भी नहीं सुनते, वे घोर नरकोंका भोग करके बनैले सूअर होते हैं। जो नरश्रेष्ठ कही जाती हुई कथाका अनुमोदन करते हैं, वे कथा न सुननेपर भी अविनाशी परम पदको प्राप्त होते हैं। जो दुष्ट कही जाती हुई कथामें विघ्न पैदा करते हैं, वे करोड़ों वर्षोतक नरकोंका भोग करके अन्तमें ग्रामीण सूअर होते हैं। जो लोग साधारण मनुष्योंको पुराणसम्बन्धिनी पुण्य कथा सुनाते हैं, वे सौ करोड़ कल्पोंसे भी अधिक समयतक ब्रह्मलोकमें निवास करते हैं। जो मनुष्य पुराणके ज्ञाता वक्ताको आसनके लिये कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र, सिंहासन और चौकी प्रदान करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाकर अभीष्ट भोगोंका उपभोग करनेके बाद ब्रह्मा आदिके लोकोंमें निवास कर अन्तमें निरामय पदको प्राप्त होते हैं॥ १०—१८॥ | | पुराणस्य प्रयच्छन्ति ये वरासनमुत्तमम्।<br>भोगिनो ज्ञानसम्पन्ना भवन्ति च भवे भवे॥ १९ | इसी तरह जो लोग पुराणकी पुस्तकके लिये उत्तम श्रेष्ठ आसन प्रदान करते हैं, वे प्रत्येक जन्ममें भोगोंका उपभोग करनेवाले एवं ज्ञानी होते हैं। |