मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१०८६ * मत्स्यपुराण *
| ये महापातकैर्युक्ता उपपातकिनश्च ये।<br>पुराणश्रवणादेव ते प्रयान्ति परं पदम्॥ २०<br>एवंविधविधानेन पुराणं शृणुयान्नरः।<br>भुक्त्वा भोगान् यथाकामं विष्णुलोकं प्रयाति सः॥ २१<br>पुस्तकं पूजयेत् पश्चाद् वस्त्रालङ्करणादिभिः।<br>वाचकं विप्रसंयुक्तं पूजयीत प्रयत्नवान्॥ २२<br>गोभूमिहेमवस्त्राणि वाचकाय निवेदयेत्।<br>ब्राह्मणान् भोजयेत् पश्चान्मण्डलड्डुकपायसैः॥ २३<br>त्वं व्यासरूपी भगवन् बुद्ध्या चाङ्गिरसोपमः।<br>पुण्यवाञ्शीलसम्पन्नः सत्यवादी जितेन्द्रियः॥ २४<br>प्रसन्नमानसं कुर्याद् दानमानोपचारतः।<br>त्वत्प्रसादादिमान् धर्मान् सम्पूर्णाञ्श्रुतवानहम्॥ २५<br>एवं प्रार्थनकं कृत्वा व्यासस्य परमात्मनः।<br>यशस्वी च भवेन्नित्यं यः कुर्याद्देवमादरात्॥ २६<br>नारदोक्तानिमान् धर्मान् यः कुर्यान्नियतेन्द्रियः।<br>कृत्स्नं फलमवाप्नोति पुराणश्रवणस्य वै॥ २७ | जो महापातकोंसे युक्त होते हैं अथवा जो उपपातकी होते हैं, वे सभी पुराणकी कथा सुननेसे ही परम पदको प्राप्त हो जाते हैं। जो मनुष्य इस प्रकारके नियम-विधानसे पुराणकी कथा सुनता है, वह स्वेच्छानुसार भोगोंको भोगकर विष्णुलोकको चला जाता है। कथा समाप्त होनेपर श्रोता पुरुष प्रयत्नपूर्वक वस्त्र और अलंकार आदिद्वारा पुस्तककी पूजा करे। तत्पश्चात् सहायक ब्राह्मणसहित वाचककी पूजा करे। उस समय वाचकको गौ, पृथ्वी, सोना और वस्त्र देना चाहिये। तदुपरान्त ब्राह्मणोंको मलाई, लड्डू और खीरका भोजन कराना चाहिये। तदनन्तर परमात्मा व्याससे प्रार्थना करे—'आप व्यासरूपी भगवान्! बुद्धिमें बृहस्पतिके समान, पुण्यवान्, शीलसम्पन्न, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हैं, आपकी कृपासे मैंने इन सम्पूर्ण धर्मोंको सुना है।' इस प्रकार प्रार्थना कर दान, मान और सेवासे उनके मनको प्रसन्न करना चाहिये। जो मनुष्य इस प्रकार आदरपूर्वक करता है, वह सदा यशस्वी होता है। जो जितेन्द्रिय मनुष्य देवर्षि नारदद्वारा कहे गये इन धर्मोंका पालन करता है, वह पुराण-श्रवणका सम्पूर्ण फल पाता है॥ १९—२७॥ |
| सूत उवाच<br>मत्स्यरूपी स भगवान् मनवे बुद्धिशालिने।<br>अवापोद्घातसहितमुक्त्वा ह्यन्तर्दधौ तदा॥ २८॥ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! उस समय मत्स्यरूपी भगवान् बुद्धिशाली मनुसे आदि-अन्त-सहित इस पुराणको कहकर अन्तर्हित हो गये॥ २८॥ |
इति पुराणश्रवणकालीनधर्माः।
इति श्रीमद्द्वैपायनमुनिप्रणीतं मत्स्यपुराणं समाप्तम्।
इस प्रकार श्रीमद्द्वैपायनमुनिप्रणीत मत्स्यपुराण समाप्त हुआ॥