मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| शाखाओंका वर्णन | ८३२ | २२६- | सामान्य राजनीतिका निरूपण | ८८७ | |
| २०३- | प्रवरकीर्तनमें धर्मके वंशका वर्णन | ८३३ | २२७- | दण्डनीतिका निरूपण | ८८९ |
| २०४- | श्राद्धकल्प—पितृगाथा-कीर्तन | ८३४ | २२८- | अद्भुत शान्तिका वर्णन | ९०५ |
| २०५- | धेनु-दान-विधि | ८३६ | २२९- | उत्पातोंके भेद तथा कतिपय ऋतुस्वभावजन्य शुभदायक अद्भुतोंका वर्णन | ९०८ |
| २०६- | कृष्णमृगचर्मके दानकी विधि और उसका माहात्म्य | ८३७ | २३०- | अद्भुत उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय | ९१० |
| २०७- | उत्सर्ग किये जानेवाले वृषके लक्षण, वृषोत्सर्गका विधान और उसका महत्त्व | ८४० | २३१- | अग्निसम्बन्धी उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय | ९११ |
| २०८- | सावित्री और सत्यवान्का चरित्र | ८४३ | २३२- | वृक्षजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय | ९१२ |
| २०९- | सत्यवान्का सावित्रीको वनकी शोभा दिखाना | ८४५ | २३३- | वृष्टिजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय | ९१४ |
| २१०- | यमराजका सत्यवान्के प्राणको बाँधना तथा सावित्री और यमराजका वार्तालाप | ८४८ | २३४- | जलाशयजनित विकृतियाँ और उनकी शान्तिके उपाय | ९१५ |
| २११- | सावित्रीको यमराजसे द्वितीय वरदानकी प्राप्ति | ८५० | २३५- | प्रसवजनित विकारका वर्णन और उसकी शान्ति | ९१५ |
| २१२- | यमराज-सावित्री-संवाद तथा यमराजद्वारा सावित्रीको तृतीय वरदानकी प्राप्ति | ८५२ | २३६- | उपस्कर-विकृतिके लक्षण और उनकी शान्ति | ९१६ |
| २१३- | सावित्रीकी विजय और सत्यवान्की बन्धन-मुक्ति | ८५४ | २३७- | पशु-पक्षीसम्बन्धी उत्पात और उनकी शान्ति | ९१७ |
| २१४- | सत्यवान्को जीवनलाभ तथा पत्नीसहित राजाको नेत्रज्योति एवं राज्यकी प्राप्ति | ८५६ | २३८- | राजाकी मृत्यु तथा देशके विनाश-सूचक लक्षण और उनकी शान्ति | ९१८ |
| २१५- | राजाका कर्तव्य, राजकर्मचारियोंके लक्षण तथा राजधर्मका निरूपण | ८५७ | २३९- | ग्रहयागका विधान | ९१९ |
| २१६- | राजकर्मचारियोंके धर्मका वर्णन | ८६४ | २४०- | राजाओंकी विजयर्थ यात्राका विधान | ९२२ |
| २१७- | दुर्ग-निर्माणकी विधि तथा राजाद्वारा दुर्गमें संग्रहणीय उपकरणोंका विवरण | ८६७ | २४१- | अङ्गस्फुरणके शुभाशुभ फल | ९२४ |
| २१८- | दुर्गमें संग्राह्य ओषधियोंका वर्णन | ८७३ | २४२- | शुभाशुभ स्वप्नोंके लक्षण | ९२६ |
| २१९- | विषयुक्त पदार्थोंके लक्षण एवं उससे राजाके बचनेके उपाय | ८७६ | २४३- | शुभाशुभ शकुनोंका निरूपण | ९२८ |
| २२०- | राजधर्म एवं सामान्य नीतिका वर्णन | ८७८ | २४४- | वामन-प्रादुर्भाव-प्रसङ्गमें श्रीभगवान्-द्वारा अदितिको वरदान | ९३० |
| २२१- | दैव और पुरुषार्थका वर्णन | ८८२ | २४५- | बलिद्वारा विष्णुकी निन्दापर प्रह्लादका उन्हें शाप, बलिकी अनुनय, ब्रह्माजी-द्वारा वामनभगवान्का स्तवन, भगवान् वामनका देवताओंको आश्वासन तथा उनका बलिके यज्ञके लिये प्रस्थान | ९३४ |
| २२२- | साम-नीतिका वर्णन | ८८३ | २४६- | बलि-शुक्र-संवाद, वामनका बलिके यज्ञमें पदार्पण, बलिद्वारा उन्हें तीन | |
| २२३- | नीति चतुष्टयीके अन्तर्गत भेद-नीतिका वर्णन | ८८४ | |||
| २२४- | दान-नीतिकी प्रशंसा | ८८५ | |||
| २२५- | दण्डनीतिका वर्णन | ८८६ |