भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135
* अध्याय ३३ *१२५

| शुक्र उवाच | शुक्राचार्यने कहा— नहुषनन्दन! तुम भक्तिभावसे मेरा चिन्तन करके अपनी वृद्धावस्थाका इच्छानुसार दूसरेके शरीरमें संचार कर सकोगे। उस दशामें तुम्हें पाप भी नहीं लगेगा। जो पुत्र तुम्हें (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी युवावस्था देगा, वही राजा होगा। साथ ही दीर्घायु, यशस्वी तथा अनेक संतानोंसे युक्त होगा॥ ४०-४१॥ | | संक्रामयिष्यसि जरां यथेष्टं नहुषात्मज।<br>मामनुध्याय तत्त्वेन न च पापमवाप्स्यसि॥ ४०<br>वयो दास्यति ते पुत्रो यः स राजा भविष्यति।<br>आयुष्मान् कीर्तिमांश्चैव बह्वपत्यस्तथैव च॥ ४१ | |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिचरित नामक बत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३२॥


तैंतीसवाँ अध्याय

ययातिका अपने यदु आदि पुत्रोंसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेनेके लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देना, फिर पूरुको जरावस्था देकर उसकी युवावस्था लेना तथा उसे वर प्रदान करना

SanskritHindi
शौनक उवाच<br>जरां प्राप्य ययातिस्तु स्वपुरं प्राप्य चैव हि।<br>पुत्रं ज्येष्ठं वरिष्ठं च यदुमित्यब्रवीद् वचः॥ १शौनकजी कहते हैं— शतानीक! राजा ययाति बुढ़ापा लेकर वहाँसे अपने नगरमें आये और अपने ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ पुत्र यदुसे इस प्रकार बोले—॥ १॥
ययातिरुवाच<br>जरा बली च मां तात पलितानि च पर्यगुः।<br>काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने॥ २<br>त्वं यदो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयान्हम्॥ ३<br>पूर्णे वर्षसहस्रे तु त्वदीयं यौवनं त्वहम्।<br>दत्त्वा सम्प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह॥ ४ययातिने कहा— तात! कवि-पुत्र शुक्राचार्यके शापसे मुझे बुढ़ापेने घेर लिया, मेरे शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयीं और बाल सफेद हो गये, किंतु मैं अभी जवानीके भोगोंसे तृप्त नहीं हुआ हूँ। यदो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरे दोषको ले लो और मैं तुम्हारी जवानीके द्वारा विषयोंका उपभोग करूँ। एक हजार वर्ष पूरे होनेपर मैं पुनः तुम्हारी जवानी देकर बुढ़ापेके साथ अपना दोष वापस ले लूँगा॥ २-४॥
यदुरुवाच<br>सितश्मश्रुधरो दीनो जरसा शिथिलीकृतः।<br>बलीसंततगात्रश्च दुर्दर्शो दुर्बलः कृशः॥ ५<br>अशक्तः कार्यकरणे परिभूतः स यौवने।<br>सहोपजीविभिश्चैव तज्जरां नाभिकामये॥ ६<br>सन्ति ते बहवः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप।<br>जरां ग्रहीतुं धर्मज्ञ पुत्रमन्यं वृणीष्व वै॥ ७यदु बोले— महाराज! मैं उस बुढ़ापेको लेनेकी इच्छा नहीं करता, जिसके आनेपर दाढ़ी-मूँछके बाल सफेद हो जाते हैं, जीवनका आनन्द चला जाता है। वृद्धावस्था सर्वथा शिथिल कर देती है। सारे शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और मनुष्य इतना दुर्बल तथा कृशकाय हो जाता है कि उसकी ओर देखते नहीं बनता। बुढ़ापेमें काम-काज करनेकी शक्ति नहीं रहती, युवतियाँ तथा जीविका पानेवाले सेवक भी तिरस्कार करते हैं, अतः मैं वृद्धावस्था नहीं लेना चाहता। धर्मज्ञ नरेश्वर! आपके बहुत-से पुत्र हैं, जो आपको मुझसे भी अधिक प्रिय हैं; अतः बुढ़ापा लेनेके लिये आप अपने किसी दूसरे पुत्रको चुन लीजिये॥ ५-७॥