भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१२६ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ययातिरुवाच<br>यस्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि।<br>पापान्मातुलसम्बन्धाद् दुष्प्रजा ते भविष्यति॥ ८<br>तुर्वसो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>यौवनेन चरेयं वै विषयांस्तव पुत्रक॥ ९<br>पूर्Readणे वर्षसहस्रे तु पुनर्दास्यामि यौवनम्।<br>तथैव प्रतिपत्स्यामि पाप्मानं जरया सह॥ १०ययातिने कहा— तात! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न (औरस पुत्र) होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं देते हो, इसलिये इस पापके कारण तुम्हारी संतान मामाके अनुचित सम्बन्धद्वारा उत्पन्न होकर दुष्प्रजा कहलायेगी। (अब उन्होंने तुर्वसुको बुलाकर कहा—) 'तुर्वसो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरा दोष ले लो। बेटा! मैं तुम्हारी जवानीसे विषयोंका उपभोग करूँगा। एक हजार वर्ष पूर्ण होनेपर मैं तुम्हें जवानी लौटा दूँगा और बुढ़ापेसहित अपने दोषको वापस ले लूँगा'॥ ८—१०॥
तुर्वसुरुवाच<br>न कामये जरां तात कामभोगप्रणाशिनीम्।<br>बलरूपान्तकरणीं बुद्धिमानविनाशिनीम्॥ ११तुर्वसु बोले— तात! काम-भोगका नाश करनेवाली वृद्धावस्था मुझे नहीं चाहिये। वह बल तथा रूपका अन्त कर देती है और बुद्धि एवं मान-प्रतिष्ठाका भी नाश करनेवाली है॥ ११॥
ययातिरुवाच<br>यस्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि।<br>तस्मात् प्रजासमुच्छेदं तुर्वसो तव यास्यति॥ १२<br>संकीर्णाश्चोधर्मेषु प्रतिलोमचरेषु च।<br>पिशिताशिषु लोकेषु नूनं राजा भविष्यसि॥ १३<br>गुरुदारप्रसक्तेषु तिर्यग्योनिरतेषु च।<br>पशुधर्मिषु म्लेच्छेषु पापेषु प्रभविष्यसि॥ १४ययातिने कहा— तुर्वसो! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी मुझे अपनी युवावस्था नहीं देते हो, इसलिये तुम्हारी संतति नष्ट हो जायगी। मूढ़! जिनके आचार और धर्म वर्णसंकरोंके समान हैं, जो प्रतिलोम—संकर जातियोंमें गिने जाते हैं तथा जो कच्चा मांस खानेवाले एवं चाण्डाल आदिकी श्रेणीमें हैं, ऐसे (यवनादिसे अधिष्ठित आट्टादि देशोंके) लोगोंके तुम राजा होगे। जो गुरु-पत्नियोंमें आसक्त हैं, जो पशु-पक्षी आदिका-सा आचरण करनेवाले हैं तथा जिनके सारे आचार-विचार भी पशुओंके समान हैं, तुम उन पापात्मा म्लेच्छोंके राजा होगे॥ १२—१४॥
शौनक उवाच<br>एवं स तुर्वसुं शप्त्वा ययातिः सुतमात्मनः।<br>शर्मिष्ठायाः सुतं ज्येष्ठं द्रुह्युं वचनमब्रवीत्॥ १५शौनकजी कहते हैं— शतानीक! राजा ययातिने इस प्रकार अपने पुत्र तुर्वसुको शाप देकर शर्मिष्ठाके ज्येष्ठ पुत्र द्रुह्युसे यह बात कही—॥ १५॥
ययातिरुवाच<br>द्रुह्यो त्वं प्रतिपद्यस्व वर्णरूपविनाशिनीम्।<br>जरां वर्षसहस्रं मे यौवनं स्वं प्रयच्छताम्॥ १६<br>पूर्Readणे वर्षसहस्रे तु ते प्रदास्यामि यौवनम्।<br>स्वं चादास्यामि भूयोऽहं पाप्मानं जरया सह॥ १७ययातिने कहा— द्रुह्यो! कान्ति तथा रूपका नाश करनेवाली यह वृद्धावस्था तुम ले लो और एक हजार वर्षोंके लिये अपनी जवानी मुझे दे दो। हजार वर्ष पूर्ण हो जानेपर मैं पुनः तुम्हारी जवानी तुम्हें दे दूँगा और बुढ़ापेके साथ अपना दोष फिर ले लूँगा॥ १६-१७॥
द्रुह्युरुवाच<br>न राज्यं न रथं नाश्वं जीर्णो भुङ्क्ते न च स्त्रियम्।<br>न रागश्चास्य भवति तज्जरां ते न कामये॥ १८द्रुह्यु बोले— पिताजी! बूढ़ा मनुष्य न तो राज्य-सुखका अनुभव कर सकता है, न घोड़े और रथपर ही चढ़ सकता है। वह स्त्रीका भी उपभोग नहीं कर सकता। उसके हृदयमें राग-प्रेम उत्पन्न ही नहीं होता; अतः मैं वृद्धावस्था नहीं लेना चाहता॥ १८॥
ययातिरुवाच<br>यस्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि।<br>तद् द्रुह्यो वै प्रियः कामो न ते सम्पत्स्यते क्वचित्॥ १९ययातिने कहा— द्रुह्यो! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी अपनी जवानी मुझे नहीं दे रहे हो, इसलिये तुम्हारा प्रिय मनोरथ कभी नहीं सिद्ध होगा।