मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ३३ * | १२७ |
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| नौरूपप्लवसंचारो यत्र नित्यं भविष्यति।<br>अराजभोजशब्दं त्वं तत्र प्राप्स्यसि सान्वयः॥ २०<br><br>ययातिरुवाच<br>अनो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>एकं वर्षसहस्रं तु चरेयं यौवनेन ते॥ २१<br><br>अनुरुवाच<br>जीर्णः शिशुरिवादत्तेऽकालेऽन्नमशुचिर्यथा।<br>न जुहोति च कालेऽग्निं तां जरां नाभिकामये॥ २२<br><br>ययातिरुवाच<br>यस्त्वं मे हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि।<br>जरादोषस्त्वयोक्तो यस्तस्मात् त्वं प्रतिपद्यसे॥ २३<br><br>प्रजाश्च यौवनं प्राप्ता विनश्यन्ति ह्यनो तव।<br>अग्निप्रस्कन्दनगतस्त्वं चाप्येवं भविष्यसि॥ २४॥<br><br>ययातिरुवाच<br>पूरो त्वं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह।<br>त्वं मे प्रियतरः पुत्रस्त्वं वरीयान् भविष्यसि॥ २५<br><br>जरा बली च मां तात पलितानि च पर्यगुः।<br>काव्यस्योशनसः शापान्न च तृप्तोऽस्मि यौवने॥ २६<br><br>किञ्चित्कालं चरेयं वै विषयान् वयसा तव।<br>पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रतिदास्यामि यौवनम्।<br>स्वं चैव प्रतिपत्स्येऽहं पाप्मानं जरया सह॥ २७<br><br>शौनक उवाच<br>एवमुक्तः प्रत्युवाच पूरुः पितरमञ्जसा।<br>यथात्थ त्वं महाराज तत् करिष्यामि ते वचः॥ २८<br><br>प्रतिपत्स्यामि ते राजन् पाप्मानं जरया सह।<br>गृहाण यौवनं मत्तश्चर कामान् यथेप्सितान्॥ २९ | (जहाँ घोड़े जुते हुए उत्तम रथों, घोड़ों, हाथियों, पीठकों, पालकियों, गदहों, बकरों, बैलों और शिबिका आदिकी भी गति नहीं है) जहाँ प्रतिदिन (केवल) नावपर ही बैठकर घूमना-फिरना होगा, ऐसे (पञ्चनदके निचले) प्रदेशमें तुम अपनी संतानोंके साथ चले जाओगे और वहाँ तुम्हारे वंशके लोग राजा नहीं, भोज कहलायेंगे॥ १९-२०॥<br><br>तदनन्तर ययातिने अनुसे कहा—अनो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरा दोष-पाप ले लो और मैं तुम्हारी जवानीके द्वारा एक हजार वर्षतक सुखसे चलते-फिरते आनन्द भोगूँगा॥ २१॥<br><br>अनु बोले—पिताजी! बूढ़ा मनुष्य बच्चोंकी तरह असमयमें भोजन करता है, अपवित्र रहता है तथा समयपर अग्निहोत्र आदि कर्म नहीं करता, अतः वैसी वृद्धावस्थाको मैं नहीं लेना चाहता॥ २२॥<br><br>ययातिने कहा—अनो! तुम मेरे हृदयसे उत्पन्न होकर भी अपनी युवावस्था मुझे नहीं दे रहे हो और बुढ़ापेके दोष बतला रहे हो, अतः तुम वृद्धावस्थाके समस्त दोषोंको प्राप्त करोगे और तुम्हारी संतान जवान होते ही मर जायगी तथा तुम भी बूढ़े-जैसे होकर अग्निहोत्रका त्याग कर दोगे॥ २३-२४॥<br><br>तत्पश्चात् ययातिने पूरुसे कहा—पूरो! तुम मेरे अत्यधिक प्रिय पुत्र हो। गुणोंमें तुम श्रेष्ठ होओगे। तात! मुझे बुढ़ापेने घेर लिया, सब अङ्गोंमें झुर्रियाँ पड़ गयीं और सिरके बाल सफेद हो गये। बुढ़ापेके ये सारे चिह्न मुझे एक ही साथ प्राप्त हुए हैं। कवि-पुत्र शुक्राचार्यके शापसे मेरी यह दशा हुई है; किंतु मैं जवानीके भोगोंसे अभी तृप्त नहीं हुआ हूँ। पूरो! (तुम बुढ़ापेके साथ मेरे दोष-पापको ले लो और) मैं तुम्हारी युवावस्था लेकर उसके द्वारा कुछ कालतक विषयोंका उपभोग करूँगा। एक हजार वर्ष पूरे होनेपर मैं तुम्हें पुनः तुम्हारी जवानी दे दूँगा और बुढ़ापेके साथ अपना दोष ले लूँगा॥ २५-२७॥<br><br>शौनकजी कहते हैं—ययातिके ऐसा कहनेपर पूरुने अपने पितासे विनयपूर्वक कहा—'महाराज! आप मुझे जैसा आदेश दे रहे हैं, आपके उस वचनका मैं पालन करूँगा। (गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन मनुष्योंके लिये पुण्य, स्वर्ग तथा आयु प्रदान करनेवाला है। गुरुके ही प्रसादसे इन्द्रने तीनों लोकोंका शासन किया है। गुरुस्वरूप पिताकी अनुमति प्राप्त करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको पा लेता है।) राजन्! मैं बुढ़ापेके साथ आपका दोष ग्रहण कर लूँगा। आप मुझसे जवानी ले लें और इच्छानुसार विषयोंका उपभोग करें। |