मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ * मत्स्यपुराण *
| जरयाहं प्रतिच्छन्नो वयोरूपधरस्तव ।<br>यौवनं भवते दत्त्वा चरिष्यामि यथेच्छया ॥ ३० ॥ | मैं वृद्धावस्थासे आच्छादित हो आपकी आयु एवं रूप धारण करके रहूँगा और आपको जवानी देकर आप मेरे लिये जो आज्ञा देंगे, उसका पालन करूँगा ॥ २८–३० ॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिचरित नामक तैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥
चौंतीसवाँ अध्याय
राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना
| शौनक उवाच | शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! पूरुके ऐसा कहनेपर राजर्षि ययातिने महान् व्रतपरायण शुक्राचार्यका स्मरण कर अपने महात्मा पुत्र पूरुके शरीरमें अपनी वृद्धावस्थाका संक्रमण कराया (और उसकी युवावस्था स्वयं ले ली)। नहुषके पुत्र नरश्रेष्ठ ययातिने पूरुकी युवावस्थासे अत्यन्त प्रसन्न होकर अभीष्ट विषय-भोगोंका सेवन आरम्भ किया। उन राजेन्द्रकी जैसी कामना होती, जैसा उत्साह होता और जैसा समय होता, उसके अनुसार वे सुखपूर्वक धर्मानुकूल भोगोंका उपभोग करते थे। वास्तवमें उसके योग्य वे ही थे। उन्होंने यज्ञोंद्वारा देवताओंको, श्राद्धोंसे पितरोंको, इच्छाके अनुसार अनुग्रह करके दीन-दुःखियोंको और मुँहमाँगी भोग्य वस्तुएँ देकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त किया। वे अतिथियोंको अन्न और जल देकर, वैश्योंको उनके धन-वैभवकी रक्षा करके, शूद्रोंको दयाभावसे, लुटेरोंको कैद करके तथा सम्पूर्ण प्रजाको धर्मपूर्वक संरक्षणद्वारा प्रसन्न रखते थे। इस प्रकार साक्षात् दूसरे इन्द्रके समान राजा ययातिने समस्त प्रजाका पालन किया। वे राजा सिंहके समान पराक्रमी और नवयुवक थे। सम्पूर्ण विषय उनके अधीन थे और वे धर्मका विरोध न करते हुए उत्तम सुखका उपभोग करते थे। वे नरेश शुभ भोगोंको प्राप्त करके पहले तो तृप्त एवं आनन्दित होते थे, परंतु जब यह बात ध्यानमें आती कि ये हजार वर्ष भी पूरे हो जायेंगे, तब उन्हें बड़ा खेद होता था। कालतत्त्वको जाननेवाले पराक्रमी राजा ययाति एक-एक कला और काष्ठाकी गिनती कर एक हजार वर्षके समयकी अवधिका स्मरण रखते थे। जब उन्होंने देखा कि अब समय पूरा हो गया, तब वे अपने पुत्र पूरुके पास आकर बोले—'शत्रुदमन पुत्र ! मैंने तुम्हारी जवानीके द्वारा अपनी रुचि, उत्साह और समयके अनुसार विषयोंका सेवन किया; परंतु विषयोंकी कामना उन विषयोंके उपभोगसे कभी शान्त नहीं होती, अपितु घीकी आहुति पड़नेसे अग्निकी भाँति वह अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है। | | एवमुक्तः स राजर्षिः काव्यं स्मृत्वा महाव्रतम् ।<br>संक्रामयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि ॥ १ | | | पौरवेणाथ वयसा ययातिर्नहुषात्मजः ।<br>प्रीतियुक्तो नरश्रेष्ठश्चचार विषयान् प्रियान् ॥ २ | | | यथाकामं यथोत्साहं यथाकालं यथासुखम् ।<br>धर्माविरुद्धान् राजेन्द्रो यथार्हति स एव हि ॥ ३ | | | देवानतर्पयद् यज्ञैः श्राद्धैरपि पितामहान् ।<br>दीनाननुग्रहैरिष्टैः कामैश्च द्विजसत्तमान् ॥ ४ | | | अतिथीन्नन्नपानैश्च विशश्च प्रतिपालनैः ।<br>अनृशंस्येन शूद्रांश्च दस्यून् निग्रहणेन च ॥ ५ | | | धर्मेण च प्रजाः सर्वा यथावदनुरञ्जयन् ।<br>ययातिः पालयामास साक्षादिन्द्र इवापरः ॥ ६ | | | स राजा सिंहविक्रान्तो युवा विषयगोचरः ।<br>अविरोधेन धर्मस्य चचार सुखमुत्तमम् ॥ ७ | | | स सम्प्राप्य शुभान् कामांस्तृप्तः खिन्नश्च पार्थिवः ।<br>कालं वर्षसहस्रान्तं सस्मार मनुजाधिपः ॥ ८ | | | परिचिन्त्य स कालज्ञः कलाः काष्ठाश्च वीर्यवान् ।<br>पूर्णं मत्वा ततः कालं पूरुं पुत्रमुवाच ह ॥ ९ | | | न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।<br>हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ १० | |