मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय ३४ *
| यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः।<br>नालमेकस्य तत् सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् ॥ ११<br>यथासुखं यथोत्साहं यथाकाममरिंदम।<br>सेविता विषयाः पुत्र यौवनेन मया तव॥ १२<br>पूरो प्रीतोऽस्मि भद्रं ते गृहाणेदं स्वयौवनम्।<br>राज्यं चैव गृहाणेदं त्वं हि मे प्रियकृत् सुतः॥ १३ | इस पृथ्वीपर जितने भी धान, जौ, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब एक मनुष्यके लिये भी पर्याप्त नहीं हैं, ऐसा मानकर शान्ति धारण कर लेना चाहिये। पूरो ! तुम्हारा भला हो, मैं प्रसन्न हूँ। तुम अपनी यह जवानी ले लो। साथ ही यह राज्य भी अपने अधिकारमें कर लो; क्योंकि तुम मेरा प्रिय करनेवाले पुत्र हो' ॥ १–१३॥ |
| शौनक उवाच<br>प्रतिपेदे जरां राजा ययातिर्नाहुषस्तदा।<br>यौवनं प्रतिपेदे स पूरुः स्वं पुनरात्मनः ॥ १४<br>अभिषेक्तुकामं च नृपं पूरुं पुत्रं कनीयसम्।<br>ब्राह्मणप्रमुखा वर्णा इदं वचनमब्रुवन् ॥ १५<br>कथं शुक्रस्य दौहित्रं देवयान्याः सुतं प्रभो।<br>ज्येष्ठं यदुमतिक्रम्य राज्यं पूरोः प्रदास्यसि ॥ १६<br>ज्येष्ठो यदुस्तव सुतस्तुर्वसुस्तदनन्तरम्।<br>शर्मिष्ठायाः सुतो द्रुह्युस्तथानुः पूरुरेव च॥ १७<br>कथं ज्येष्ठमतिक्रम्य कनीयान् राज्यमर्हति।<br>एतत् सम्बोधयामस्त्वां स्वधर्ममनुपालय ॥ १८ | **शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! उस समय नहुषनन्दन राजा ययातिने अपनी वृद्धावस्था वापस ले ली और पूरुने पुनः अपनी युवावस्था प्राप्त कर ली। जब ब्राह्मण आदि वर्णोंने देखा कि महाराज ययाति अपने छोटे पुत्र पूरुको राजाके पदपर अभिषिक्त करना चाहते हैं, तब उनके पास आकर इस प्रकार बोले—'प्रभो! शुक्राचार्यके नाती और देवयानीके ज्येष्ठ पुत्र यदुके होते हुए उन्हें लाँघकर आप पूरुको राज्य क्यों देते हैं? यदु आपके ज्येष्ठ पुत्र हैं। उनके बाद तुर्वसु उत्पन्न हुए। तदनन्तर शर्मिष्ठाके पुत्र क्रमशः द्रुह्यु, अनु और पूरु हैं। ज्येष्ठ पुत्रोंका उल्लङ्घन करके छोटा पुत्र राज्यका अधिकारी कैसे हो सकता है? हम आपको इस बातका स्मरण दिला रहे हैं। आप धर्मका पालन कीजिये'॥ १४–१८॥ |
| ययातिरुवाच<br>ब्राह्मणप्रमुखा वर्णाः सर्वे शृण्वन्तु मे वचः।<br>ज्येष्ठं प्रति यतो राज्यं न देयं मे कथंचन ॥ १९<br>मम ज्येष्ठेन यदुना नियोगो नानुपालितः।<br>प्रतिकूलः पितुर्यश्च न स पुत्रः सतां मतः ॥ २०<br>मातापित्रोर्वचनकृद्धितः पथ्यश्च यः सुतः।<br>स पुत्रः पुत्रवद् यश्च वर्तते पितृमातृषु ॥ २१<br>यदुनाहमवज्ञातस्तथा तुर्वसुनापि वा।<br>द्रुह्युणा चानुना चैव मय्यवज्ञा कृता भृशम् ॥ २२<br>पूरुणा मे कृतं वाक्यं मानितश्च विशेषतः।<br>कनीयान् मम दायादो जरा येन धृता मम ॥ २३<br>मम कामः स च कृतः पूरुणा पुत्ररूपिणा।<br>शुक्रेण च वरो दत्तः काव्येनोशनसा स्वयम् ॥ २४<br>पुत्रो यस्त्वानुवर्तेत स राजा पृथिवीपतिः।<br>भवन्तः प्रतिजानन्तु पूरुं राज्येऽभिषिच्यताम् ॥ २५ | **ययातिने कहा—**ब्राह्मण आदि सब वर्णके लोग मेरी बात सुनें, मुझे ज्येष्ठ पुत्रको किसी तरह राज्य नहीं देना है। मेरे ज्येष्ठ पुत्र यदुने मेरी आज्ञाका पालन नहीं किया है। जो पिताके प्रतिकूल हो, वह सत्पुरुषोंकी दृष्टिमें पुत्र नहीं माना गया है। जो माता और पिताकी आज्ञा मानता है, उनका हित चाहता है, उनके अनुकूल चलता है तथा माता-पिताके प्रति पुत्रोचित बर्ताव करता है, वही वास्तवमें पुत्र है। यदुने मेरी अवहेलना की है, तुर्वसु, द्रुह्यु तथा अनुने भी मेरा बड़ा तिरस्कार किया है। (और) पूरुने मेरी आज्ञाका पालन किया, मेरी बातको अधिक आदर दिया है, इसीने मेरा बुढ़ापा ले रखा था; अतः मेरा यह छोटा पुत्र ही वास्तवमें मेरे राज्य और धनको पानेका अधिकारी है। पूरुने पुत्ररूप होकर मेरी कामनाएँ पूर्ण की हैं। स्वयं शुक्राचार्यने मुझे वर दिया है कि 'जो पुत्र तुम्हारा अनुसरण करे वही राजा एवं समस्त भूमण्डलका पालक हो।' अतः मैं आपलोगोंसे विनयपूर्ण आग्रह करता हूँ कि पूरुको ही राज्यपर अभिषिक्त करें॥ १९–२५॥ |