मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| प्रकृतय ऊचुः<br>यः पुत्रो गुणसम्पन्नो मातापित्रोर्हितः सदा।<br>सर्वं सोऽर्हति कल्याणं कनीयानपि स प्रभुः॥ २६<br>अहं पूरोरिदं राज्यं यः प्रियः प्रियकृत् तव।<br>वरदानेन शुक्रस्य न शक्यं वक्तुमुत्तरम्॥ २७<br><br>शौनक उवाच<br>पौरजानपदैस्तुष्टैरित्युक्तो नाहुषस्तदा।<br>अभिषिच्य ततः पूरुं राज्ये स्वसुतमात्मजम्॥ २८<br>दत्त्वा च पूरवे राज्यं वनवासाय दीक्षितः।<br>पुरात् स निर्ययौ राजा ब्राह्मणैस्तापसैः सह॥ २९<br>यदोस्तु यादवा जातास्तुर्वसोर्यवनाः सुताः।<br>द्रुह्योश्चैव सुता भोजा अनोस्तु म्लेच्छजातयः॥ ३०<br>पूरोस्तु पौरवो वंशो यत्र जातोऽसि पार्थिव।<br>इदं वर्षसहस्रात् तु राज्यं कुरु कुलागतम्॥ ३१ | **प्रजावर्गके लोग बोले—**जो पुत्र गुणवान् और सदा माता-पिताका हितैषी हो, वह छोटा होनेपर भी श्रेष्ठतम है। वही सम्पूर्ण कल्याणका भागी होने योग्य है। पूरु आपका प्रिय करनेवाले पुत्र हैं, अतः शुक्राचार्यके वरदानके अनुसार ये ही इस राज्यको पानेके अधिकारी हैं। इस निश्चयके विरुद्ध अब कुछ भी उत्तर नहीं दिया जा सकता॥ २६-२७॥<br><br>**शौनकजी कहते हैं—**नगर और राज्यके लोगोंने संतुष्ट होकर जब इस प्रकार कहा, तब नहुषनन्दन ययातिने अपने पुत्र पूरुको ही अपने राज्यपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार पूरुको राज्य दे वनवासकी दीक्षा लेकर राजा ययाति तपस्वी ब्राह्मणोंके साथ नगरसे बाहर निकल गये। यदुसे यादव क्षत्रिय उत्पन्न हुए, तुर्वसुकी संतान (सीमन्तसे लेकर यूनानतकके निवासी) यवन कहलायी, द्रुह्युके पुत्र भोज नामसे प्रसिद्ध हुए और अनुसे म्लेच्छ जातियाँ उत्पन्न हुईं। राजन्! पूरुसे पौरव वंश चला, जिसमें तुम उत्पन्न हुए हो। हजारों वर्षोंसे यह राज्य कुरुकुलमें सम्मिलित हो गया है, अर्थात् यह कुरुवंश नामसे प्रसिद्ध हो गया है॥ २८-३१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे ययातिचरिते चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ययाति-चरित्र-वर्णन नामक चौंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय
वनमें राजा ययातिकी तपस्या और उन्हें स्वर्गलोककी प्राप्ति
| शौनक उवाच<br>एवं स नाहुषो राजा ययातिः पुत्रमीप्सितम्।<br>राज्येऽभिषिच्य मुदितो वानप्रस्थोऽभवन्मुनिः॥ १<br>उषित्वा वनवासं स ब्राह्मणैः सह संश्रितः।<br>फलमूलाशनो दान्तो यथा स्वर्गमितो गतः॥ २<br>स गतः स्वर्गवासं तु न्यवसन्मुदितः सुखी।<br>कालस्य नातिमहतः पुनः शक्रेण पातितः॥ ३<br>विवशः प्रच्युतः स्वर्गादप्राप्तो मेदिनीतलम्।<br>स्थितश्चासीदन्तरिक्षे स तदेति श्रुतं मया॥ ४<br>तत एव पुनश्चापि गतः स्वर्गमिति श्रुतिः।<br>राज्ञा वसुमता सार्धमष्टकेन च वीर्यवान्।<br>प्रतर्दनेन शिबिना समेत्य किल संसदि॥ ५ | **शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! इस प्रकार नहुषनन्दन राजा ययाति अपने प्रिय पुत्र पूरुका राज्याभिषेक करके प्रसन्नतापूर्वक वानप्रस्थ मुनि हो गये। वे वनमें ब्राह्मणोंके साथ रहकर कठोर व्रतका पालन करते हुए फल-मूलका आहार तथा मन और इन्द्रियोंका संयम करते थे, इससे वे स्वर्गलोकमें गये। स्वर्गलोकमें जाकर वे बड़ी प्रसन्नताके साथ सुखपूर्वक रहने लगे और बहुत कालके बाद इन्द्रद्वारा वे पुनः स्वर्गसे नीचे गिरा दिये गये। स्वर्गसे भ्रष्ट हो पृथ्वीपर गिरते समय वे भूतलतक नहीं पहुँचे, आकाशमें ही स्थिर हो गये, ऐसा मैंने सुना है। फिर यह भी सुननेमें आया है कि वे पराक्रमी राजा ययाति मुनिसमाजमें राजा वसुमान्, अष्टक, प्रतर्दन और शिबिसे मिलकर पुनः वहींसे साधु पुरुषोंके सङ्गके प्रभावसे स्वर्गलोकमें चले गये॥ १—५॥ |