मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय ३५ * १३१
| शतानीक उवाच | |
|---|---|
| कर्मणा केन स दिवं पुनः प्राप्तो महीपतिः।<br>कथमिन्द्रेण भगवन् पातितो मेदिनीतले॥ ६<br><br>सर्वमेतदशेषेण श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।<br>कथ्यमानं त्वया विप्र देवर्षिगणसंनिधौ॥ ७<br><br>देवराजसमो ह्यासीद् ययातिः पृथिवीपतिः।<br>वर्धनः कुरुवंशस्य विभावसुसमद्युतिः॥ ८<br><br>तस्य विस्तीर्णयशसः सत्यकीर्तेर्महात्मनः।<br>श्रोतुमिच्छामि देवेश दिवि चेह च सर्वशः॥ ९ | शतानीकने पूछा— भगवन्! किस कर्मसे वे भूपाल पुनः स्वर्गमें पहुँचे थे? तथा इन्द्रने उन्हें भूतलपर क्यों ढकेल दिया था? विप्रवर! मैं ये सारी बातें पूर्णरूपसे यथावत् सुनना चाहता हूँ। इन ब्रह्मर्षियोंके समीप आप इस प्रसंगका वर्णन करें। कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले अग्निके समान तेजस्वी राजा ययाति देवराज इन्द्रके समान थे। उनका यश चारों ओर फैला था। देवेश! मैं उन सत्यकीर्ति महात्मा ययातिका चरित्र, जो इहलोक और स्वर्गलोकमें सर्वत्र प्रसिद्ध है, सुनना चाहता हूँ॥ ६–९॥ |
| शौनक उवाच | |
| हन्त ते कथयिष्यामि ययातेरुत्तमां कथाम्।<br>दिवि चेह च पुण्यार्थां सर्वपापप्रणाशिनीम्॥ १०<br><br>ययातिर्नाहुषो राजा पूरुं पुत्रं कनीयसम्।<br>राज्येऽभिषिच्य मुदितः प्रवव्राज वनं तदा॥ ११<br><br>अन्तेषु स विनिक्षिप्य पुत्रान् यदुपुरोगमान्।<br>फलमूलाशनो राजा वनेऽसौ न्यवसच्चिरम्॥ १२<br><br>स जितात्मा जितक्रोधस्तर्पयन् पितृदेवताः।<br>अग्नींश्च विधिवज्जुह्वन् वानप्रस्थविधानतः॥ १३<br><br>अतिथीन् पूजयन् नित्यं वन्येन हविषा विभुः।<br>शिलोञ्छवृत्तिमास्थाय शेषान्नकृतभोजनः॥ १४<br><br>पूर्णं सहस्रं वर्षाणामेवंवृत्तिरभून्नृपः।<br>अम्बुभक्षः स चाब्दांस्त्रीनासीन्नियतवाङ्मनः॥ १५<br><br>ततस्तु वायुभक्षोऽभूत् संवत्सरमतन्द्रितः।<br>पञ्चाग्निमध्ये च तपस्तेपे संवत्सरं पुनः॥ १६<br><br>एकपादस्थितश्चासीत् षण्मासाननिलाशनः।<br>पुण्यकीर्तिस्ततः स्वर्गं जगामावृत्य रोदसी॥ १७ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक! ययातिकी उत्तम कथा इहलोक और स्वर्गलोकमें भी पुण्यदायक है। यह सब पापोंका नाश करनेवाली है, मैं तुमसे उसका वर्णन करता हूँ। नहुष-पुत्र महाराज ययातिने अपने छोटे पुत्र पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके यदु आदि अन्य पुत्रोंको सीमान्त (किनारेके देशों)-में रख दिया। फिर बड़ी प्रसन्नताके साथ वे वनमें चले गये। वहाँ फल-मूलका आहार करते हुए उन्होंने दीर्घकालतक निवास किया। उन्होंने अपने मनको शुद्ध करके क्रोधपर विजय पायी और प्रतिदिन देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करते हुए वानप्रस्थाश्रमकी विधिसे शास्त्रीय विधानके अनुसार अग्निहोत्र प्रारम्भ किया। वे राजा शिलोञ्छवृत्तिका आश्रय ले यज्ञशेष अन्नका भोजन करते थे। भोजनसे पूर्व वनमें उपलब्ध होनेवाले फल, मूल आदि हविष्यके द्वारा अतिथियोंका आदर-सत्कार करते थे। राजाको इसी वृत्तिसे रहते हुए पूरे एक हजार वर्ष बीत गये। उन्होंने मन और वाणीपर संयम करके तीन वर्षोंतक केवल जलका आहार किया। तत्पश्चात् वे आलस्यरहित हो एक वर्षतक केवल वायु पीकर रहे। फिर एक वर्षतक पाँच अग्नियोंके बीच बैठकर तपस्या की। इसके बाद छह महीनेतक हवा पीकर वे एक पैरसे खड़े रहे। तदनन्तर पुण्यकीर्ति महाराज ययाति पृथ्वी और आकाशमें अपना यश फैलाकर स्वर्गलोकमें चले गये॥ १०—१७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित्र-वर्णन नामक पैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३५॥