भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 142

१३२ * मत्स्यपुराण *


छत्तीसावाँ अध्याय

इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शौनक उवाच<br>स्वर्गतस्तु स राजेन्द्रो न्यवसद् देवसद्मनि।<br>पूजितस्त्रिदशैः साध्यैर्मरुद्भिर्वसुभिस्तथा॥ १<br>देवलोकाद् ब्रह्मलोकं स चरन् पुण्यकृद् वशी।<br>अवसत् पृथिवीपालो दीर्घकालमिति श्रुतिः॥ २<br>स कदाचिन्नृपश्रेष्ठो ययातिः शक्रमागतः।<br>कथान्ते तत्र शक्रेण पृष्टः स पृथिवीपतिः॥ ३**शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! स्वर्गलोकमें जाकर महाराज ययाति देव-भवनमें निवास करने लगे। वहाँ देवताओं, साध्यगणों, मरुद्गणों तथा वसुओंने उनका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। पुण्यात्मा तथा जितेन्द्रिय राजा वहाँ देवलोकसे ब्रह्मलोकतक भ्रमण करते हुए दीर्घकालतक रहे—ऐसी पौराणिक परम्परा है। एक दिन नृपश्रेष्ठ ययाति देवराज इन्द्रके पास आये। वार्तालापके अन्तमें इन्द्रने राजा ययातिसे इस प्रकार प्रश्न किया॥ १–३॥
शक्र उवाच<br>यदा स पूरुस्तव रूपेण राज-<br>ञ्जरां गृहीत्वा प्रचचार लोके।<br>तदा राज्यं सम्प्रदायैवमस्मै<br>त्वया किमुक्तः कथयेह सत्यम्॥ ४**इन्द्रने पूछा—**राजन्! जिस समय पूरु आपसे वृद्धावस्था लेकर आपके स्वरूपसे इस पृथ्वीपर विचरण करने लगा, सत्य कहिये, उस समय राज्य देकर आपने उसको क्या आदेश दिया था?॥ ४॥
ययातिरुवाच<br>प्रकृत्यनुमते पूरुं राज्ये कृत्वेदमब्रुवम्।<br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये कृत्स्नोऽयं विषयस्तव।<br>मध्ये पृथिव्यास्त्वं राजा भ्रातरोऽन्तेऽधिपास्तव॥ ५<br>अक्रोधनः क्रोधनेभ्यो विशिष्ट-<br>स्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्टः।<br>अमानुषेभ्यो मानुषश्च प्रधानो<br>विद्वांस्तथैवाविदुषः प्रधानः॥ ६<br>आक्रोशमानो नाक्रोशेन्मन्युमेव तितिक्षति।<br>आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति॥ ७<br>नारंतुदः स्यान्न नृशंसवादी<br>न हीनतः परमभ्याददीत।<br>ययास्य वाचा पर उद्विजेत<br>न तां वदेद् रुशतीं पापलौल्याम्॥ ८**ययातिने कहा—**देवराज! मैंने प्रजाओंकी अनुमतिसे पूरुको राज्याभिषिक्त करके उससे यह कहा था कि 'बेटा! गङ्गा और यमुनाके बीचका यह सारा प्रदेश तुम्हारे अधिकारमें रहेगा। यह पृथ्वीका मध्य भाग है, इसके तुम राजा होओगे और तुम्हारे भाई सीमान्त देशोंके अधिपति होंगे।' देवेन्द्र! (इसके बाद मैंने यह उपदेश दिया कि मनुष्यको चाहिये कि वह दीनता, शठता और क्रोध न करे। कुटिलता, मात्सर्य और वैर कहीं न करे। माता, पिता, विद्वान्, तपस्वी तथा क्षमाशील पुरुषका बुद्धिमान् मनुष्य कभी अपमान न करे। शक्तिशाली पुरुष सदा क्षमा करता है। शक्तिहीन मनुष्य सदा क्रोध करता है। दुष्ट मानव साधु पुरुषसे और दुर्बल अधिक बलवान्‌से द्वेष करता है। कुरूप मनुष्य रूपवान्‌से, निर्धन धनवान्‌से, अकर्मण्य कर्मनिष्ठसे और अधार्मिक धर्मात्मासे द्वेष करते हैं। इसी प्रकार गुणहीन मनुष्य गुणवान्‌से डाह रखता है। इन्द्र! यह कलिका लक्षण है।) क्रोध करनेवालोंसे वह पुरुष श्रेष्ठ है जो कभी क्रोध नहीं करता। इसी प्रकार असहनशीलसे सहनशील उत्तम है, मनुष्येतर प्राणियोंसे मनुष्य श्रेष्ठ है और मूर्खोंसे विद्वान् उत्तम है। यदि कोई किसीकी निन्दा करता या उसे गाली देता है तो वह भी बदलेमें निन्दा या गाली-गलौज न करे; क्योंकि जो गाली या निन्दा सह लेता है, उस पुरुषका आन्तरिक दुःख ही गाली देनेवाले या अपमान करनेवालेको जला डालता है। साथ ही उसके पुण्यको भी वह ले लेता है। क्रोधवश किसीके मर्म-स्थानमें