मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 143, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ३६ * | १३३ |
|---|
| अरंतुदं पुरुषं तीव्रवाचं<br>वाक्कण्टकैर्विंतुदन्तं मनुष्यान्।<br>विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां<br>मुखे निबद्धं निर्ऋतिं वहन्तम्॥ ९<br><br>सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्यात्<br>सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षितः स्यात्।<br>सदासतामतिवादांस्तितिक्षेत्<br>सतां वृत्तं पालयन् साधुवृत्तः॥ १०<br><br>वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति<br>यैराहतः शोचति रात्र्यहानि।<br>परस्य वा मर्मसु ते पतन्ति<br>तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु॥ ११<br><br>नास्तीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।<br>यथा मैत्री च लोकेषु दानं च मधुरा च वाक्॥ १२<br><br>तस्मात् सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुषं क्वचित्।<br>पूज्यान् सम्पूजयेद् दद्यान्नाभिशापं कदाचन॥ १३ | चोट न पहुँचाये (ऐसा बर्ताव न करे, जिससे किसीको मार्मिक पीड़ा हो)। किसीके प्रति कठोर बात भी मुँहसे न निकाले, अनुचित उपायसे शत्रुको भी वशमें न करे। जो जीको जलानेवाली हो, जिससे दूसरेको उद्वेग होता हो ऐसी बात मुँहसे न बोले; क्योंकि पापीलोग ही ऐसी बातें बोला करते हैं। जो स्वभावका कठोर हो, दूसरोंके मर्ममें चोट पहुँचाता हो, तीखी बातें बोलता हो और कठोर वचनरूपी काँटोंसे दूसरे मनुष्यको पीड़ा देता हो, उसे अत्यन्त लक्ष्मीहीन (दरिद्र या अभागा) समझे। उसको देखना भी बुरा है; क्योंकि वह कड़वी बोलीके रूपमें अपने मुँहमें बँधी हुई एक पिशाचिनीको ढो रहा है। (अपना बर्ताव और व्यवहार ऐसा रखे, जिससे) साधु पुरुष सामने तो सत्कार करें ही, पीठ-पीछे भी उनके द्वारा अपनी रक्षा हो। दुष्ट लोगोंकी कही हुई अनुचित बातें सदा सह लेनी चाहिये तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके सदाचारका आश्रय लेकर साधु पुरुषोंके व्यवहारको ही अपनाना चाहिये। दुष्ट मनुष्योंके मुखसे कटुवचनरूपी बाण सदा छूटते रहते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन शोक और चिन्तामें डूबा रहता है। वे वाग्बाण दूसरोंके मर्मस्थानोंपर ही चोट करते हैं; अतः विद्वान् पुरुष दूसरेके प्रति ऐसी कठोर वाणीका प्रयोग न करे। सभी प्राणियोंके प्रति दया और मैत्रीका बर्ताव, दान और सबके प्रति मधुर वाणीका प्रयोग—तीनों लोकोंमें इनके समान कोई वशीकरण नहीं है। इसलिये कभी कठोर वचन न बोले। सदा सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन ही बोले। पूजनीय पुरुषोंका पूजन (आदर-सत्कार) करे। दूसरोंको दान दे और स्वयं कभी किसीसे कुछ न माँगे॥ ५—१३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते षट्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित्र-वर्णन नामक छत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३६॥