भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 144

१३४ * मत्स्यपुराण *


सैंतीसवाँ अध्याय

ययातिका स्वर्गसे पतन और अष्टकका उनसे प्रश्न करना

इन्द्र उवाच<br>सर्वाणि कार्याणि समाप्य राजन्<br>गृहान् परित्यज्य वनं गतोऽसि।<br>तत् त्वां पृच्छामि नहुषस्य पुत्र<br>केनासि तुल्यस्तपसा ययाते॥ १इन्द्रने कहा—राजन्! आप सम्पूर्ण कर्मोंको समाप्त करके घर छोड़कर वनमें चले गये थे; अतः नहुषपुत्र ययाते! मैं आपसे पूछता हूँ कि आप तपस्यामें किसके समान हैं?॥ १॥
ययातिरुवाच<br>नाहं देवमनुष्येषु न गन्धर्वमहर्षिषु।<br>आत्मनस्तपसा तुल्यं कंचित् पश्यामि वासव॥ २ययातिने कहा—इन्द्र! मैं न तो देवताओं एवं मनुष्योंमें तथा न गन्धर्वों और महर्षियोंमें ही किसीको ऐसा देख रहा हूँ जो तपस्यामें मेरे समान हो (अर्थात् मैं तपमें अद्वितीय हूँ)॥ २॥
इन्द्र उवाच<br>यदावमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च<br>पापीयसश्चाविदितप्रभावः ।<br>तस्माल्लोका ह्यन्तवन्तस्तवेमे<br>क्षीणे पुण्ये पतितोऽस्यद्य राजन्॥ ३इन्द्र बोले—राजन्! आपने अपने समान, अपने-से बड़े और छोटे लोगोंका प्रभाव न जानकर सबका तिरस्कार किया है, अतः आपके इन पुण्यलोकोंमें रहनेकी अवधि समाप्त हो गयी; क्योंकि (दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण) आपका पुण्य क्षीण हो गया, इसलिये अब आप यहाँसे नीचे गिरेंगे॥ ३॥
ययातिरुवाच<br>सुरर्षिगन्धर्वनरावमानात्<br>क्षयं गता मे यदि शक्र लोकाः।<br>इच्छाम्यहं सुरलोकाद् विहीनः<br>सतां मध्ये पतितुं देवराज॥ ४ययातिने कहा—देवराज इन्द्र! देवता, ऋषि, गन्धर्व और मनुष्य आदिका अपमान करनेके कारण यदि मेरे पुण्यलोक क्षीण हो गये हैं तो इन्द्रलोकसे भ्रष्ट होकर मैं साधु पुरुषोंके बीचमें गिरनेकी इच्छा करता हूँ॥ ४॥
इन्द्र उवाच<br>सतां सकाशे पतितोऽसि राजं-<br>श्च्युतः प्रतिष्ठां यत्र लब्धासि भूयः।<br>एवं विदित्वा तु पुनर्ययाते<br>न तेऽवमान्याः सदृशः श्रेयसे च॥ ५इन्द्र बोले—राजन् ययाति! आप यहाँसे च्युत होकर साधु पुरुषोंके ही समीप गिरेंगे और वहाँ अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर लेंगे; किंतु यह सब जानकर आप फिर (आगे) कभी अपनी बराबरीवाले तथा अपनेसे बड़े लोगोंका अपमान मत कीजियेगा॥ ५॥
शौनक उवाच<br>ततः पपातामरराजजुष्टात्<br>पुण्याल्लोकात् पतमानं ययातिम्।<br>सम्प्रेक्ष्य राजर्षिवरोऽष्टकस्त-<br>मुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता॥ ६शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर देवराज इन्द्रके सेवन करनेयोग्य पुण्यलोकोंका परित्याग कर राजा ययाति नीचे गिरने लगे। उस समय राजर्षियोंमें श्रेष्ठ एवं उत्तम धर्मविधिके पालक अष्टकने उन्हें गिरते देखा। (तब) उन्होंने उन (ययाति)-से (इस प्रकार) कहा॥ ६॥
अष्टक उवाच<br>कस्त्वं युवा वासवतुल्यरूपः<br>स्वतेजसा दीप्यमानो यथाग्निः।<br>पतस्युदीर्णाम्बुधरप्रकाशः<br>खे खेचराणां प्रवरो यथार्कः॥ ७अष्टकने पूछा—'इन्द्रके समान सुन्दर रूपवाले तरुण पुरुष आप कौन हैं? आप अपने तेजसे अग्निकी भाँति देदीप्यमान हो रहे हैं। मेघरूपी घने अन्धकारवाले आकाशसे आकाशचारी ग्रहोंमें श्रेष्ठ सूर्यके समान आप कैसे गिर रहे हैं?