मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ३८ * | १३५ |
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| दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात् पतन्तं<br>वैश्वानरार्कद्युतिमप्रमेयम्।<br>किं नु स्विदेतत् पततीव सर्वे<br>वितर्कयन्तः परिमोहिताः स्मः॥ ८<br>दृष्ट्वा च त्वाधिष्ठितं देवमार्गे<br>शक्रार्कविष्णुप्रतिप्रभावम् ।<br>प्रत्युद्गतास्त्वां वयमद्य सर्वे<br>तस्मात् पाते तव जिज्ञासमानाः॥ ९<br>न चापि त्वां धृष्णवः प्रष्टुमग्रे<br>न चत्वमस्मान् पृच्छसि के वयं स्म।<br>तत् त्वां पृच्छामि स्पृहणीयरूप<br>कस्य त्वं वा किं निमित्तं त्वमागाः॥ १०<br>भयं तु ते व्येतु विषादमोहौ<br>त्यजाशु देवेन्द्रसमानरूप।<br>त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे<br>शक्रो न सोढुं बलहापि शक्तः॥ ११<br>सन्तः प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां<br>सतां सदैवामरराजकल्प।<br>ते सङ्गताः स्थावरजङ्गमेशाः<br>प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु सत्सु॥ १२<br>प्रभुरग्निः प्रतपने भूमिरावपने प्रभुः।<br>प्रभुः सूर्यः प्रकाशाच्च सतां चाभ्यागतः प्रभुः॥ १३ | आपका तेज सूर्य और अग्निके सदृश है। आप अप्रमेय शक्तिशाली जान पड़ते हैं। आपको सूर्यके मार्गसे गिरते देख हम सब लोग मोहित (आश्चर्यचकित) होकर इस तर्क-वितर्कमें पड़े हैं कि यह क्या गिर रहा है ? आप इन्द्र, सूर्य और विष्णुके समान प्रभावशाली हैं। आपको आकाशमें स्थित देखकर हम सब लोग अब यह जाननेके लिये आपके निकट आये हैं कि आपके पतनका यथार्थ कारण क्या है। हम पहले आपसे कुछ पूछनेका साहस नहीं कर सकते और आप भी हमसे हमारा परिचय नहीं पूछते कि हम कौन हैं। इसलिये मैं ही आपसे पूछता हूँ। मनोरम रूपवाले महापुरुष! आप किसके पुत्र हैं और किसलिये यहाँ आये हैं? इन्द्रके तुल्य शक्तिशाली पुरुष! आपका भय दूर हो जाना चाहिये। अब आपको (स्वर्गसे गिरनेका) विषाद और मोह भी तुरंत त्याग देना चाहिये। इस समय आप संतोंके समीप विद्यमान हैं। बल दानवका नाश करनेवाले इन्द्र भी अब आपका तेज सहन करनेमें असमर्थ हैं। देवेश्वर इन्द्रके समान तेजस्वी महानुभाव! सुखसे वञ्चित होनेवाले साधु पुरुषोंके लिये सदा संत ही परम आश्रय हैं। वे स्थावर और जङ्गम—सभी प्राणियोंपर शासन करनेवाले सत्पुरुष यहाँ एकत्र हुए हैं। आप अपने समान पुण्यात्मा संतोंके बीचमें स्थित हैं। जैसे तपनेकी शक्ति अग्निमें है, बोये हुए बीजको धारण करनेकी शक्ति पृथ्वीमें है, प्रकाशित होनेकी शक्ति सूर्यमें है, उसी प्रकार संतोंका स्वामित्व—उनपर शासन करनेकी शक्ति केवल अतिथिको ही प्राप्त है'॥ ७—१३॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते ययातिपतनं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक सैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३७॥
अड़तीसवाँ अध्याय
ययाति और अष्टकका संवाद
| ययातिरुवाच<br>अहं ययातिर्नहुषस्य पुत्रः<br>पूरोः पिता सर्वभूतावमानात्।<br>प्रभ्रंशितोऽहं सुरसिद्धलोकात्<br>परिच्युतः प्रपताम्यल्पपुण्यः॥ १ | **ययातिने कहा—**महात्मन्! मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता ययाति हूँ। समस्त प्राणियोंका अपमान करनेसे मेरा पुण्य क्षीण हो गया है। इस कारण मैं देवताओं तथा सिद्धोंके लोकसे च्युत होकर नीचे गिर रहा हूँ। |