मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 146, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 146
१३६ * मत्स्यपुराण *
| अहं हि पूर्वो वयसा भवद्ध्य-<br>स्तेनाभिवादं भवतां न युञ्जे।<br>यो विद्यया तपसा जन्मना वा<br>वृद्धः स वै सम्भवति द्विजानाम्॥ २ | मैं आपलोगोंसे अवस्थामें बड़ा हूँ, अतः आपलोगोंको प्रणाम नहीं कर रहा हूँ। द्विजातियोंमें जो विद्या, तप और अवस्थामें बड़ा होता है वही पूजनीय माना जाता है॥ १-२॥ |
| अष्टक उवाच<br>अवादीस्त्वं वयसास्मि वृद्ध<br>इति वै राजन्नधिकः कथंचित्।<br>यो वै विद्वांस्तपसा च वृद्धः<br>स एव पूज्यो भवति द्विजानाम्॥ ३ | **अष्टक बोले—**राजन्! आपने जो यह कहा है कि मैं अवस्थामें बड़ा हूँ, इसलिये ज्येष्ठ हूँ, सो इसमें आप कुछ अधिक कह गये; क्योंकि द्विजोंमें जो विद्या और तपस्यामें बढ़ा-चढ़ा होता है, वही पूज्य माना जाता है॥ ३॥ |
| ययातिरुवाच<br>प्रतिकूलं कर्मणां पापमाहु-<br>स्तद्दर्त्तिनां प्रवणं पापलोकम्।<br>सन्तोऽसतो नानुवर्तन्त ते वै<br>यदात्मनैषां प्रतिकूलवादी॥ ४ | **ययातिने कहा—**पापको पुण्यकर्मोंका नाशक बताया जाता है। वह नरककी प्राप्ति करानेवाला है और वह उद्दण्ड पुरुषोंमें ही देखा जाता है। श्रेष्ठ पुरुष दुराचारी पुरुषोंके दुराचारका अनुसरण नहीं करते। पहलेके साधु पुरुष भी उन श्रेष्ठ पुरुषोंके ही अनुकूल आचरण करते थे। |
| अभूद् धनं मे विपुलं महत् वै<br>विचेष्टमानोऽधिगन्ता तदस्मि।<br>एवं प्रधार्यात्महिते निविष्टो<br>यो वर्तते स विजानाति धीरः॥ ५ | मेरे पास पुण्यरूपी बहुत धन था, किंतु दूसरोंकी निन्दा करनेके कारण वह सब नष्ट हो गया। अब मैं चेष्टा करके भी उसे नहीं पा सकता। मेरी इस दुरवस्थाको समझ-बूझकर जो आत्मकल्याणमें संलग्न रहता है, वही ज्ञानी और धीर है। |
| नानाभावा बहवो जीवलोके<br>दैवाधीना नष्टचेष्टाधिकाराः।<br>तत् तत् प्राप्य न विहन्येत धीरो<br>दिष्टं बलीय इति मत्वात्मबुद्ध्या॥ ६ | इस जीव-जगत्में भिन्न-भिन्न स्वभाववाले बहुत-से प्राणी हैं, वे सभी प्रारब्धके अधीन हैं, अतः उनके धनादि पदार्थोंके लिये किये हुए उद्योग और अधिकार सभी व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये धीर पुरुषको चाहिये कि वह अपनी बुद्धिसे |
| सुखं हि जन्तुर्यदि वापि दुःखं<br>दैवाधीनं विन्दति नात्मशक्त्या।<br>तस्माद् दिष्टं बलवन्मन्यमानो<br>न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कदाचित्॥ ७ | 'प्रारब्ध ही बलवान् है'—यह जानकर दुःख या सुख जो भी मिले, उसमें विकारको न प्राप्त हो। जीव जो सुख अथवा दुःख पाता है, वह उसे प्रारब्ध (भाग्य)-से ही प्राप्त होता है, अपनी शक्तिसे नहीं; अतः प्रारब्धको ही बलवान् मानकर मनुष्य किसी प्रकार भी हर्ष अथवा शोक न करे। |
| दुःखे न तप्येत सुखे न हृष्येत्<br>समेन वर्तेत सदैव धीरः।<br>दिष्टं बलीय इति मन्यमानो<br>न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कदाचित्॥ ८ | दुःखोंसे संतप्त न हो और सुखोंसे हर्षित न हो। धीर पुरुष सदा समभावसे ही रहे और भाग्यको ही प्रबल मानकर किसी प्रकार चिन्ता एवं हर्षके वशीभूत न हो। |
| भये न मुह्याम्यष्टकाहं कदाचित्<br>संतापे मे मानसो नास्ति कश्चित्।<br>धाता यथा मां विदधाति लोके<br>ध्रुवं तदाहं भवितेति मत्वा॥ ९ | अष्टक! मैं कभी भयमें पड़कर मोहित नहीं होता, मुझे कोई मानसिक संताप भी नहीं होता; क्योंकि मैं समझता हूँ कि विधाता इस संसारमें मुझे जैसे रखेगा वैसे ही रहूँगा। |
| संस्वेदजा ह्याण्डजा ह्युद्भिदश्च<br>सरीसृपाः कृमयोऽप्यप्सु मत्स्याः।<br>तथाश्मानस्तृणकाष्ठं च सर्वं<br>दिष्टक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते॥ १० | स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, सरीसृप, कृमि, जलमें रहनेवाले मत्स्य आदि जीव तथा पर्वत, तृण और काष्ठ—ये सभी प्रारब्ध-भोगका सर्वथा क्षय हो जानेपर अपनी प्रकृतिको प्राप्त हो जाते हैं। |