भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 147
* अध्याय ३८ *१३७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अनित्यतां सुखदुःखस्य बुद्ध्वा<br>कस्मात् संतापमष्टकाहं भजेयम्।<br>किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये<br>तस्मात् संतापं वर्जयाम्यप्रमत्तः॥ ११अष्टक! मैं सुख तथा दुःख—दोनोंकी अनित्यताको जानता हूँ, फिर मुझे संताप हो तो कैसे? मैं क्या करूँ और क्या करके संतस न होऊँ—इन बातोंकी चिन्ता छोड़ चुका हूँ, अतः सावधान रहकर शोक-संतापको अपनेसे दूर रखता हूँ॥ ४–११॥
शौनक उवाच<br>एवं ब्रुवाणं नृपतिं ययाति-<br>मथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छत्।<br>मातामहं सर्वगुणोपपन्नं<br>यत्र स्थितं स्वर्गलोके यथावत्॥ १२शौनकजी कहते हैं—शतानीक! राजा ययाति समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थे और नातेमें अष्टकके नाना लगते थे। वे अन्तरिक्षमें वैसे ही ठहरे हुए थे, जैसे मानो स्वर्गलोकमें हों। जब उन्होंने उपर्युक्त बातें कहीं तब अष्टकने उनसे पुनः प्रश्न किया॥ १२॥
अष्टक उवाच<br>ये ये लोकाः पार्थिवेन्द्रे प्रधाना-<br>स्त्वया भुक्ता यं च कालं यथा च।<br>तन्मे राजन् ब्रूहि सर्वं यथावत्<br>क्षेत्रज्ञवद् भाषसे त्वं हि धर्मम्॥ १३अष्टकने कहा—महाराज! आपने जिन-जिन प्रधान लोकोंमें रहकर जितने समयतक वहाँके सुखोंका भली-भाँति उपभोग किया है, उन सबका मुझे यथार्थ परिचय दीजिये। राजन्! आप तो महात्माओंकी भाँति धर्मोंका उपदेश कर रहे हैं॥ १३॥
ययातिरुवाच<br>राजाहमासं त्विह सार्वभौम-<br>स्ततो लोकान् महतश्चार्जयं वै।<br>तत्रावसं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥ १४ययातिने कहा—अष्टक! मैं पहले समस्त भूमण्डलमें प्रसिद्ध चक्रवर्ती राजा था। तदनन्तर सत्कर्मोंद्वारा बड़े-बड़े लोकोंपर मैंने विजय प्राप्त की और उनमें एक हजार वर्षोतक (सुखपूर्वक) निवास किया। इसके बाद उनसे भी उच्चतम लोकमें जा पहुँचा।
ततः पुरीं पुरुहूतस्य रम्यां<br>सहस्रद्वारां शतयोजनान्ताम्।<br>अध्यावसं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥ १५वहाँ सौ योजन विस्तृत और एक हजार दरवाजोंसे युक्त इन्द्रकी रमणीय पुरी प्राप्त हुई। उसमें मैंने केवल एक हजार वर्षोंतक निवास किया और उसके बाद उससे भी ऊँचे लोकमें गया।
ततो दिव्यमजरं प्राप्य लोकं<br>प्रजापतेर्लोकपतेर्दुरापम् ।<br>तत्रावसं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>ततो लोकान् परमानभ्युपेतः॥ १६तदनन्तर लोकपालोंके लिये भी दुर्लभ प्रजापतिके उस दिव्यलोकमें जा पहुँचा, जहाँ जरावस्थाका प्रवेश नहीं है। वहाँ एक हजार वर्षतक रहा, फिर उससे भी उत्तम लोकमें चला गया।
देवस्य देवस्य निवेशने च<br>विजित्य लोकान् न्यवसं यथेष्टम्।<br>सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तै-<br>स्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम्॥ १७वह देवाधिदेव ब्रह्माजीका धाम था। वहाँ मैं अपनी इच्छाके अनुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमें विहार करता हुआ सम्पूर्ण देवताओंसे सम्मानित होकर रहा। उस समय मेरा प्रभाव और तेज देवेश्वरोंके समान था।
तथावसं नन्दने कामरूपी<br>संवत्सराणामयुतं शतानाम्।<br>सहाप्सरोभिर्विचरन् पुण्यगन्धान्<br>पश्यन् नगान् पुष्पितांश्चारुरूपान्॥ १८इसी प्रकार मैं नन्दनवनमें इच्छानुसार रूप धारण करके अप्सराओंके साथ विहार करता हुआ दस लाख वर्षोंतक रहा। वहाँ मुझे पवित्र गन्ध और मनोहर रूपवाले वृक्ष देखनेको मिले, जो फूलोंसे लदे हुए थे।