भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१३८* मत्स्यपुराण *
तत्र स्थितं मां देवसुखेषु सक्तं<br>कालेऽतीते महति ततोऽतिमात्रम्।<br>दूतो देवानामब्रवीदुग्ररूपो<br>ध्वंसेत्युच्चैस्त्रिः प्लुतेन स्वरेण॥ १९<br>एतावन्मे विदितं राजसिंह<br>ततो भ्रष्टोऽहं नन्दनात् क्षीणपुण्यः।<br>वाचोऽश्रौषं चान्तरिक्षे सुराणा-<br>मनुक्रोशाच्छोचतां मां नरेन्द्र॥ २०<br>अकस्माद् वै क्षीणपुण्यो ययातिः<br>पतत्यसौ पुण्यकृत् पुण्यकीर्तिः।<br>तानब्रुवं पतमानस्तदाहं<br>सतां मध्ये निपतेयं कथं नु॥ २१<br>तैराख्यातं भवतां यज्ञभूमिं<br>समीक्ष्य चैनामहमागतोऽस्मि।<br>हविर्गन्धैर्दर्शितां यज्ञभूमिं<br>धूमापाङ्गं परिगृह्य प्रतीताम्॥ २२वहाँ रहकर मैं देवलोकके सुखोंमें आसक्त हो गया। तदनन्तर बहुत अधिक समय बीत जानेपर एक भयंकर रूपधारी देवदूत आकर मुझसे ऊँची आवाजमें तीन बार बोला—‘गिर जाओ, गिर जाओ, गिर जाओ।’ राजशिरोमणे! मुझे इतना ही ज्ञात हो सका है। तदनन्तर पुण्य क्षीण हो जानेके कारण मैं नन्दनवनसे नीचे गिर पड़ा। नरेन्द्र! उस समय मेरे लिये शोक करनेवाले देवताओंकी अन्तरिक्षमें यह दयाभरी वाणी सुनायी पड़ी—‘अहो! बड़े कष्टकी बात है कि पवित्र कीर्तिवाले ये पुण्यकर्मा महाराज ययाति पुण्य क्षीण होनेके कारण नीचे गिर रहे हैं!’ तब नीचे गिरते हुए मैंने उनसे पूछा—‘देवताओ! मैं साधु पुरुषोंके बीच गिरूँ, इसका क्या उपाय है?’ तब देवताओंने मुझे आपकी यज्ञभूमिका परिचय दिया। मैं इसीको देखता हुआ तुरंत यहाँ आ पहुँचा हूँ। यज्ञभूमिका परिचय देनेवाली हविष्यकी सुगन्धका अनुभव तथा धूप्रप्रान्तका अवलोकन कर मुझे बड़ी प्रसन्नता और सान्त्वना मिली है॥ १४—२२॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरितेऽष्टात्रिंशोऽध्यायः॥ ३८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक अड़तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३८॥


उन्तालीसवाँ अध्याय

अष्टक और ययातिका संवाद

अष्टक उवाच<br>यदा वसन् नन्दने कामरूपे<br>संवत्सराणामयुतं शतानाम्।<br>किं कारणं कार्तयुगप्रधानं<br>हित्वा तद् वै वसुधामन्वपद्यः॥ १<br>ययातिरुवाच<br>ज्ञातिः सुहृत् स्वजनो यो यथेह<br>क्षीणे वित्ते त्यज्यते मानवैर्हि।<br>तथा स्वर्गे क्षीणपुण्यं मनुष्यं<br>त्यजन्ति सद्यः खचरा देवसंघाः॥ २<br>अष्टक उवाच<br>कथं तस्मिन् क्षीणपुण्या भवन्ति<br>सम्मुह्यते मेऽत्र मनोऽतिमात्रम्।<br>किं विशिष्ठाः कस्य धामोपयान्ति<br>तद् वै ब्रूहि क्षेत्रवित् त्वं मतो मे॥ ३अष्टकने पूछा— सत्ययुगके निष्पाप राजाओंमें प्रधान नरेश! जब आप इच्छानुसार रूप धारण करके दस लाख वर्षोंतक नन्दनवनमें निवास कर चुके हैं, तब क्या कारण है कि आप उसे छोड़कर भूतलपर चले आये?॥ १॥<br>ययाति बोले— जैसे इस लोकमें जाति-भाई, सुहृद् अथवा स्वजन कोई भी क्यों न हो, धन नष्ट हो जानेपर उसे सब मनुष्य त्याग देते हैं, उसी प्रकार स्वर्गलोकमें जिसका पुण्य समाप्त हो जाता है, उस मनुष्यको देवराज इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता तुरंत त्याग देते हैं॥ २॥<br>अष्टकने पूछा— देवलोकमें मनुष्योंके पुण्य कैसे क्षीण होते हैं? इस विषयमें मेरा मन अत्यन्त मोहित हो रहा है। प्रजापतिका वह कौन-सा धाम है, जिसमें विशिष्ट (अपुनरावृत्तिकी योग्यतावाले) पुरुष जाते हैं? यह बताइये; क्योंकि आप मुझे ज्ञानी जान पड़ते हैं॥ ३॥