भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 149

* अध्याय ३९ * <span style="float: right;">१३९</span>


| ययातिरुवाच<br>इमं भौमं नरकं ते पतन्ति<br>लालप्यमाना नरदेव सर्वे।<br>ते कङ्कगोमायुपलाशनाथं<br>क्षितौ विवृद्धिं बहुधा प्रयान्ति॥ ४<br>तस्मादेवं वर्जनीयं नरेन्द्र<br>दुष्टं लोके गर्हणीयं च कर्म।<br>आख्यातं ते पार्थिव सर्वमेतद्<br>भूयश्चेदानीं वद किं ते वदामि॥ ५ | **ययाति बोले—**नरदेव! जो अपने मुखसे अपने पुण्यकर्मोंका बखान करते हैं, वे सभी इस भौम नरकमें आ गिरते हैं। यहाँ वे गीधों, गीदड़ों और कौओं आदिके खानेयोग्य इस शरीरके लिये पृथ्वीपर पुत्र-पौत्रादिरूपसे बहुधा विस्तारको प्राप्त होते हैं। इसलिये नरेन्द्र! इस लोकमें जो दुष्ट और निन्दनीय कर्म हो, उसे सर्वथा त्याग देना चाहिये। भूपाल! मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया; बोलो, अब तुम्हें क्या बताऊँ॥ ४-५॥ | | अष्टक उवाच<br>यदा तु तांस्ते वितुदन्ते वयांसि<br>तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतङ्गाः।<br>कथं भवन्ति कथमाभवन्ति<br>त्वत्तो भौमं नरकमहं शृणोमि॥ ६ | **अष्टकने पूछा—**जब मनुष्योंको मृत्युके पश्चात् पक्षी, गीध, मयूर और पतङ्ग—ये नोच-नोचकर खा लेते हैं तब वे कैसे और किस रूपमें उत्पन्न होते हैं? आज मैं आपके ही मुखसे (प्रथम बार) भौम नरकका (जिसे कभी नहीं सुना था) नाम सुन रहा हूँ॥ ६॥ | | ययातिरुवाच<br>ऊर्ध्वं देहात् कर्मणो जृम्भमाणाद्<br>व्यक्तं पृथिव्यामनुसंचरन्ति।<br>इमं भौमं नरकं ते पतन्ति<br>नावेक्षन्ते वर्षपूगाननेकान्॥ ७<br>षष्टिं सहस्राणि पतन्ति व्योम्नि<br>तथाशीतिं चैव तु वत्सराणाम्।<br>तान् वै तुदन्ते प्रपतन्तः प्रयातान्<br>भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः॥ ८ | **ययाति बोले—**कर्मसे उत्पन्न होने और बढ़नेवाले शरीरको पाकर गर्भसे निकलनेके पश्चात् जीव सबके समक्ष इस पृथ्वीपर (विषयोंमें) विचरते हैं। उनका यह विचरण ही भौम नरक कहा गया है। इसीमें वे पड़ते हैं। इसमें पड़नेपर वे व्यर्थ बीतनेवाले अनेक वर्षसमूहोंकी ओर दृष्टिपात नहीं करते। कितने ही प्राणी स्वर्गादि लोकोंमें साठ हजार वर्ष रहते हैं। कुछ अस्सी हजार वर्षोंतक वहाँ निवास करते हैं। इसके बाद वे भूमिपर गिरते हैं। यहाँ उन गिरनेवाले जीवोंको तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके भयानक राक्षस (दुष्ट प्राणी) अत्यन्त पीड़ा देते हैं॥ ७-८॥ | | अष्टक उवाच<br>यदेतांस्ते सम्पतन्तस्तुदन्ति<br>भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः।<br>कथं भवन्ति कथमाभवन्ति<br>कथंभूता गर्भभूता भवन्ति॥ ९ | **अष्टकने पूछा—**तीखी दाढ़ोंवाले पृथ्वीके भयंकर राक्षस पापवश आकाशसे गिरते हुए जिन जीवोंको सताते हैं, वे गिरकर कैसे जीवित रहते हैं? किस प्रकार इन्द्रिय आदिसे युक्त होते हैं? और गर्भमें कैसे आते हैं?॥ ९॥ | | ययातिरुवाच<br>असृग्रेतःपुष्परसानुयुक्त-<br>मन्वेति सद्यः पुरुषेण सृष्टम्।<br>तद्वै तस्या रज आपद्यते च<br>स गर्भभूतः समुपैति तत्र॥ १०<br>वनस्पतीनोषधीश्चाविशन्ति<br>अपो वायुं पृथिवीं चान्तरिक्षम्।<br>चतुष्पदं द्विपदं चापि सर्वं<br>एवंभूता गर्भभूता भवन्ति॥ ११ | **ययाति बोले—**अन्तरिक्षसे गिरा हुआ प्राणी असृक् (रक्त) होता है। फिर वही क्रमशः नूतन शरीरका बीजभूत वीर्य बन जाता है। (फिर) वह पुष्पके रससे संयुक्त होकर कर्मानुरूप योनिका अनुसरण करता है। गर्भाधान करनेवाले पुरुषके द्वारा स्त्रीसंसर्ग होनेपर वीर्यमें आविष्ट हुआ वह जीव उस स्त्रीके रजसे मिल जाता है। तदनन्तर वही गर्भरूपमें परिणत हो जाता है। जीव जलरूपसे गिरकर वनस्पतियों और ओषधियोंमें प्रवेश करते हैं तथा जल, वायु, पृथ्वी और अन्तरिक्ष आदिमें प्रवेश करते हुए कर्मानुसार पशु अथवा मनुष्य सब कुछ होते हैं। इस प्रकार वे भूमिपर आकर फिर पूर्वोक्त क्रमके अनुसार गर्भभावको प्राप्त होते हैं॥ १०-११॥ |

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