मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अष्टक उवाच | अष्टकने पूछा— राजन्! इस मनुष्ययोनिमें आनेवाला जीव अपने इसी शरीरसे गर्भमें आता है या दूसरा शरीर धारण करता है? आप यह रहस्य मुझे बताइये। मैं संशय होनेके कारण पूछता हूँ। गर्भमें आनेपर वह भिन्न-भिन्न शरीररूपी आश्रयको, आँख और कान आदि इन्द्रियोंको तथा चेतनाको भी कैसे उपलब्ध करता है? मेरे पूछनेपर ये सब बातें आप बताइये। तात! हम सब लोग आपको क्षेत्रज्ञ (आत्मज्ञानी) मानते हैं॥ १२-१३॥ | | अन्यद्वपुर्विदधातीह गर्भे<br>उताहोस्वित् स्वेन कामेन याति।<br>आपद्यमानो नरयोनिमेता-<br>माचक्ष्व मे संशयात् पृच्छतस्त्वम्॥ १२<br>शरीरदेहादिसमुच्छ्रयं च<br>चक्षुः श्रोत्रे लभते केन संज्ञाम्।<br>एतत् सर्वं तात आचक्ष्व पृष्टः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां मन्यमाना हि सर्वे॥ १३ | | | ययातिरुवाच | ययाति बोले— ऋतुकालमें पुष्परससे संयुक्त वीर्यको वायु गर्भाशयमें खींच लेता है और वह वहाँ उसपर अधिकार जमाकर क्रमशः गर्भकी वृद्धि करता रहता है। वह गर्भ बढ़कर जब सम्पूर्ण अवयवोंसे सम्पन्न हो जाता है तब चेतनाका आश्रय ले योनिसे बाहर निकलकर मनुष्य कहलाता है। वह कानोंसे शब्द सुनता है, आँखोंसे रूप देखता है, नासिकासे गन्ध लेता है, जिह्वासे रसका आस्वादन करता है, त्वचासे स्पर्श और मनसे आन्तरिक भावोंका अनुभव करता है। अष्टक! इस प्रकार महान् आत्मबलसे सम्पन्न प्राणधारियोंके शरीरमें जीवकी स्थापना होती है॥ १४—१६॥ | | वायुः समुत्कर्षति गर्भयोनि-<br>मृतौ रेतः पुष्परसानुयुक्तम्।<br>स तत्र तन्मात्रकृताधिकारः<br>क्रमेण संवर्धयतीह गर्भम्॥ १४<br>स जायमानोऽथ गृहीतगात्रः<br>संज्ञामधिष्ठाय ततो मनुष्यः।<br>स श्रोत्राभ्यां वेदयतीह शब्दं<br>स वै रूपं पश्यति चक्षुषा च॥ १५<br>घ्राणेन गन्धं जिह्वयाथो रसं च<br>त्वचा स्पर्शं मनसा देवभावम्।<br>इत्यष्टकेहोपचितं हि विद्धि<br>महात्मनः प्राणभृतः शरीरे॥ १६ | | | अष्टक उवाच | अष्टकने पूछा— जो मनुष्य मर जाता है, वह जलाया जाता है या गाड़ दिया जाता है अथवा जलमें बहा दिया जाता है। इस प्रकार विनाश होकर स्थूल शरीरका अभाव हो जाता है। फिर वह चेतन जीवात्मा किस शरीरके आधारपर रहकर चैतन्ययुक्त व्यवहार करता है?॥ १७॥ | | यः संस्थितः पुरुषो दह्यते वा<br>निखन्यते वापि निकृष्यते वा।<br>अभावभूतः स विनाशमेत्य<br>केनात्मानं चेतयते पुरस्तात्॥ १७ | | | ययातिरुवाच | ययाति बोले— राजसिंह! जैसे मनुष्य श्वास लेते हुए प्राणयुक्त स्थूल शरीरको छोड़कर स्वप्नमें विचरण करता है, वैसे ही यह चेतन जीवात्मा अस्फुट शब्दोच्चारणके साथ इस मृतक स्थूल शरीरको त्यागकर सूक्ष्म शरीरसे संयुक्त होता है और फिर पुण्य अथवा पापको आगे रखकर उसी पुण्य-पापके अनुसार अन्य योनिको प्राप्त होता है। पुण्य करनेवाले मनुष्य पुण्य-योनिमें और पाप करनेवाले मनुष्य पाप-योनिमें जाते हैं। इस प्रकार पापी जीव कीट-पतङ्ग आदि होते हैं। महानुभाव! इन सब विषयोंको विस्तारके साथ कहनेकी इच्छा नहीं होती। | | हित्वा सोऽसून सुम्वन्निष्ठितत्वात्<br>पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं च।<br>अन्यां योनिं पुण्यपापानुसारां<br>हित्वा देहं भजते राजसिंह॥ १८<br>पुण्यां योनिं पुण्यकृतो विशन्ति<br>पापां योनिं पापकृतो व्रजन्ति।<br>कीटाः पतङ्गाश्च भवन्ति पापा-<br>न्र मे विवक्षास्ति महानुभाव॥ १९ | |