मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय ३९ * १४१
| चतुष्पदा द्विपदाः पक्षिणश्च<br>तथाभूता गर्भभूता भवन्ति।<br>आख्यातमेतन्निखिलं हि सर्वं<br>भूयस्तु किं पृच्छसि राजसिंह॥ २०॥ | नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार जीव गर्भमें आकर चार पैरवाले (चतुष्पाद), दो पैरवाले मनुष्यादि और पक्षियोंके रूपमें उत्पन्न होते हैं। यह सब मैंने पूरा-पूरा बतला दिया। अब और क्या पूछना चाहते हो?॥ १८–२०॥ |
| अष्टक उवाच<br>किंस्वित् कृत्वा लभते तात संज्ञां<br>मर्त्यः श्रेष्ठां तपसा विद्यया वा।<br>तन्मे पृष्टः शंस सर्वं यथाव-<br>च्छुभॉल्लोकान् येन गच्छेत् क्रमेण॥ २१॥ | अष्टकने पूछा— तात! मनुष्य कौन-सा कर्म करके उत्तम यश प्राप्त करता है? वह यश तपसे प्राप्त होता है या विद्यासे? मैं यही पूछता हूँ। जिस कर्मके द्वारा क्रमशः श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हो सके, वह सब यथार्थ-रूपसे बताइये॥ २१॥ |
| ययातिरुवाच<br>तपश्च दानं च शमो दमश्च<br>ह्रीरार्जवं सर्वभूतानुकम्पा।<br>स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो<br>द्वाराणि सप्तैव महान्ति पुंसाम्॥ २२॥<br>सर्वाणि चैतानि यथोदितानि<br>तपः प्रधानान्यभिमर्षकेण ।<br>नश्यन्ति मानेन तमोऽभिभूताः<br>पुंसः सदैवति वदन्ति सन्तः॥ २३॥<br>अधीयानः पण्डितम्मन्यमानो<br>यो विद्यया हन्ति यशः परस्य।<br>तस्यान्तवन्तः पुरुषस्य लोका<br>न चास्य तद् ब्रह्मफलं ददाति॥ २४॥<br>चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि<br>भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि।<br>पानाग्निहोत्रमुत मानमौनं<br>मानेनाधीतमुत मानयज्ञः॥ २५॥<br>न मान्यमानो मुदमाददीत<br>न संतापं प्राप्नुयाच्चावमानात्।<br>सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके<br>नासाधवः साधुबुद्धिं लभन्ते॥ २६॥<br>इति दद्यादिति यजेदित्यधीयीत मे श्रुतम्।<br>इत्येतान्यभयान्याहुस्तान्यवर्ज्यानि नित्यशः॥ २७॥<br>ये चाश्रयं वेदयन्ते पुराणं<br>मनीषिणो मानसमार्गरुद्धम्।<br>तन्निःश्रेयस्तेन संयोगमेत्य<br>परां शान्तिं प्राप्नुयुः प्रेत्य चेह॥ २८॥ | ययाति बोले— राजन्! साधु पुरुष स्वर्गलोकके सात महान् दरवाजे बतलाते हैं, जिनसे प्राणी उसमें प्रवेश करते हैं। उनके नाम ये हैं—तप, दान, शम, दम, लज्जा, सरलता और समस्त प्राणियोंके प्रति दया। वे तप आदि द्वार सदा ही पुरुषके अभिमानरूप तमसे आच्छादित होनेपर नष्ट हो जाते हैं, यह संत पुरुषोंका कथन है। जो वेदोंका अध्ययन करके अपनेको सबसे बड़ा पण्डित मानता और अपनी विद्याद्वारा दूसरोंके यशका नाश करता है, उसके पुण्यलोक अन्तवान् (विनाशशील) होते हैं और उसका पढ़ा हुआ वेद भी उसे फल नहीं देता। अग्निहोत्र, मौन, अध्ययन और यज्ञ—ये चार कर्म मनुष्यको भयसे मुक्त करनेवाले हैं; परंतु वे ही ठीकसे न किये जायँ, दूषित भावसे अनुष्ठित हों तो वे उलटे भय प्रदान करते हैं। विद्वान् पुरुष सम्मानित होनेपर अधिक आनन्दित न हो, अपमानित होनेपर संतस न हो। इस लोकमें संत पुरुष ही सत्पुरुषोंका आदर करते हैं। दुष्ट पुरुषोंको 'यह सत्पुरुष है' ऐसी बुद्धि प्राप्त ही नहीं होती। ऐसा दान देना चाहिये, इस प्रकार यजन करना चाहिये, इस तरह स्वाध्यायमें लगा रहना चाहिये—ये सभी वचन अभयदायक हैं, अतः नित्य पालनीय हैं—ऐसा मैंने सुना है। जो सबका आश्रय है, पुराण (कूटस्थ) है तथा जहाँ मनकी गति भी रुक जाती है, वह (परब्रह्म परमात्मा) तुम सब लोगोंके लिये कल्याणकारी हो। जो विद्वान् उसे जानते हैं वे उस परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होकर इहलोक और परलोकमें परम शान्तिको प्राप्त होते हैं॥ २२–२८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक उन्तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३९॥