भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 152

१४२ * मत्स्यपुराण *


चालीसवाँ अध्याय

ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अष्टक उवाच<br>चरन् गृहस्थः कथमेति देवान्<br>कथं भिक्षुः कथमाचार्यकर्मा।<br>वानप्रस्थः सत्पथे सन्निविष्टो<br>बहून्यस्मिन् सम्प्रति वेदयन्ति॥ १अष्टकने पूछा— महाराज! वेदज्ञ विद्वान् इस धर्मके अन्तर्गत बहुत-से कर्मोंको उत्तम लोकोंकी प्राप्तिका द्वार बताते हैं, अतः मैं आपसे पूछता हूँ कि आचार्यकी सेवा करनेवाला ब्रह्मचारी, गृहस्थ, सन्मार्गमें स्थित वानप्रस्थ और संन्यासी किस प्रकार धर्माचरण करके उत्तम लोकमें जाते हैं?॥ १॥
ययातिरुवाच<br>आहूताध्यायी गुरुकर्मसु चोद्यतः<br>पूर्वोत्थायी चरमं चाथ शायी।<br>मृदुर्दान्तो धृतिमानप्रमत्तः<br>स्वाध्यायशीलः सिध्यति ब्रह्मचारी॥ २<br><br>धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत<br>दद्यात् सदैवातिथीन् भोजयेच्च।<br>अनाददानश्च परैरदत्तं<br>सैषा गृहस्थोपनिषत् पुराणी॥ ३<br><br>स्ववीर्यजीवी वृजिनान्निवृत्तो<br>दाता परेभ्यो न परोपतापी।<br>तादृङ्मुनिः सिद्धिमुपैति मुख्यां<br>वसन्मरण्ये नियताहारचेष्टः॥ ४<br><br>अशिल्पजीवी विगृहश्च नित्यं<br>जितेन्द्रियः सर्वतो विप्रमुक्तः।<br>अनोकशायी लघु लिप्समान-<br>श्चरन् देशानेकाम्बरः स भिक्षुः॥ ५<br><br>रात्र्या यया चाभिरताश्च लोका<br>भवन्ति कामाभिजिताः सुखेन च।<br>तामेव रात्रिं प्रयतेत विद्वा-<br>नरण्यसंस्थो भवितुं यतात्मा॥ ६<br><br>दशैव पूर्वान् दशचापरांस्तु<br>ज्ञातींस्तथात्मानमथैकविंशम्।<br>अरण्यवासी सुकृतं दधाति<br>मुक्त्वा त्वरण्ये स्वशरीरधातून्॥ ७ययाति बोले— शिष्यको उचित है कि गुरुके बुलानेपर उसके समीप जाकर पढ़े, गुरुकी सेवामें बिना कहे लगा रहे, रातमें गुरुजीके सो जानेके बाद सोवे और सबेरे उनसे पहले ही उठ जाय। वह मृदुल (विनम्र), जितेन्द्रिय, धैर्यवान्, सावधान और स्वाध्यायशील हो। इस नियमसे रहनेवाला ब्रह्मचारी सिद्धिको पाता है। गृहस्थ पुरुष न्यायसे प्राप्त हुए धनको पाकर उससे यज्ञ करे, दान दे और सदा अतिथियोंको भोजन करावे। दूसरोंकी वस्तु उनके दिये बिना ग्रहण न करे। यह गृहस्थधर्मका प्राचीन एवं रहस्यमय स्वरूप है। वानप्रस्थ मुनि वनमें निवास करे। आहार और विहारको नियमित रखे। अपने ही पराक्रम एवं परिश्रमसे जीवन-निर्वाह करे, पापसे दूर रहे। दूसरोंको दान दे और किसीको कष्ट न पहुँचाये। ऐसा मुनि परम मोक्ष (सिद्धि)-को प्राप्त होता है। संन्यासी शिल्पकलासे जीवन-निर्वाह न करे। वह शम, दम आदि श्रेष्ठ गुणोंसे सम्पन्न हो, सदा अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखे, सबसे अलग रहे, गृहस्थके घरमें न सोये, परिग्रहका भार न लेकर अपनेको हलका रखे, थोड़ा-थोड़ा चले और अकेला ही अनेक स्थानोंमें भ्रमण करता रहे। ऐसा संन्यासी ही वास्तवमें भिक्षु कहलाने योग्य है। जिस समय रूप, रस आदि विषय तुच्छ प्रतीत होने लगें, इच्छानुसार जीत लिये जायँ तथा उनके परित्यागमें ही सुख जान पड़े, उसी समय विद्वान् पुरुष मनको वशमें करके समस्त संग्रहोंका त्याग कर वनवासी होनेका प्रयत्न करे। जो वनवासी मुनि वनमें ही अपने पञ्चभूतात्मक शरीरका परित्याग करता है, वह दस पीढ़ी पूर्वके और दस पीढ़ी बादके जाति-भाइयोंको तथा इक्कीसवें अपनेको भी पुण्यलोकोंमें पहुँचा देता है॥ २—७॥